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सोमवार, 9 नवंबर 2009

राज तुम आगे बढो सब मराठी साथ है



आज़ पूरे विश्व मे बर्लिन की दीार को गिराने की 20 वी वर्ष गाठ मनाईं जा रही है वहीँ यह खबर भी आयी कि महाराष्ट्र विधानसभा मे अबू आजमी को हिन्दी मे शपथ लेने के कारण म न से के विधायक गणो ने हन्गामा किया तथा उन्हे हिंदी मे शपथ लेने पर टोकाटाकी हाथापाई की वैसे अबू आजमी ने भी उन्हे चप्पलें दिखाईं

वैसे मै इन सब नाट्क बाजियो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना समय की बर्बादी मानता हूँ जैसे वन्दे मातरम विवाद हम मे से अधिकाँश को वन्दे मातरम तो दूर सही तरी्के से जन गण मन भी गाने नही आता वे ऐसे लोगो से जिन्हे सद्दाम के कुवैत आक्रमण पर जश्न मनाते तथा सद्दाम की मौत पर शोक मनाते देखा है लेकिन तालिबानो के आक्र्मण पर कभी छाती पीट्ते नही देखा उनसे वन्दे मातरम गवा कर हम क्या हासिल करना चाहते है ? पता नही महाराष्ट्र का यह नाटक हिन्दी विरोध का था या अबू आज्मी का विरोध / सम्भव है वन्दे मातरम को ना गवाने की झुंझलाहट मे अबू आजमी को लपेट लिया गया हो वैसे इस पार्टी ने अपने नाम मे निर्माण व सेना जैसे हिन्दी शब्दों का प्रयोग क्योन कर रखा है यदि मराठी भाषा मे कोई अन्य शब्द हो तो उसका प्रयोग करना चाहिये क्योंकि इन शब्दबोधन से पार्टी ही दोगली लगने लगती है उसी प्रकार से विधायक राम कदम को भी अपना व अपने पूर्वजों का नाम शुद्धिकरण कर मराठी भाषा मे परिवर्तित कर लेनी चाहिये उत्तर भारतीय हिन्दी नामो के परित्याग से ही तन मन व सभी तंत्रिकाएं शुद्धरूप हो सकेगी वैसे भी हमे यह तो मानना ही पडेगा कि एक राष्ट्र के भीतर एक महाराष्ट्र है तो जहिर है कुछ विसंगतियों को तो देखना हमारी नियति ही है वैसे भी मुझे लगता है कि कुछ दिनो के बाद हम सम्विधान की कसम खाने पर भी विवाद देखेंगे तथा एक याचिका के फ़ैसले के बाद विधायको को यह छूट मिल जायेगी कि वह अपनी मनःसृष्ट भाषा मे किसी कहानी जैसे अलीबाबा और … या बाबा भंजक नाथ के नाम पर शपथ ले सकते है बर्लिन की दीवार भले टूट ज़ाये परंतु बोलीवुड की यह दीवार काफ़ी लम्बे समय तक महाराष्ट्र मे हाउस फ़ुल शो दिखाने वाली है जै महाराष्ट्र

हिंदुस्तान की सरजमीं पर हिंदी बोलने पर पीटने की घटना का जिक्र तो आज तक जम्मू-कश्मीर में भी सामने नहीं आया है।

जहाँ ३७० के कारण इतनी छूट मिलीहै महाराष्ट्र के विधायको ने अहिन्दीभाषी राज्यों के लिए पृथक आचारसंहिता का ही निर्माण कर डाला है

राज ठाकरे आगे बढ़ो, सब मराठी साथ है !
तुमच्य सर्व आमादारंचे अभिनंदन!!!!

नोट ऊपर के चित्र के रचनाकारों के आद्याक्षर कार्टूनों में अंकित है ऐसे चित्र उन्ही की संपत्ति है साभार प्रकाशित करना विवशता में हुआ है इनके चित्र को इनका महिमामंडन माना जाए


शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

हस्तिनापुर में बूटा सिंह की जय हो

सत्ता व सुंदरी का सुख उठाने की कला कोई बूटा सिंह जी से सीखे वैसे मई उनके पूरे जीवन की घटनाओ को जब देखता हूँ तो यही पता हूँ कि उन्होंने अपने सत्य को कभी नहीं छोड़ा उनका सत्य था कुर्सी चाहे वो राज्यपाल की हो गृह मंत्री की , या वर्तमान संबैधानिक पद की | इस सत्य के लिए आपने सब कुछ का त्याग किया इमान ,धर्म शर्म सभी का | सत्य का रास्ता कठिन अवश्य होता है किंतु बड़ा ही फलदाई होता है सत्य को ऐसे ही पकड़ा जाता है आज की युवा पीढी को आपके आदर्शो पर चलना चाहिए वर्तमान में जार्ज भाई साहिब भी इसी प्रकार सत्य को पकड़ कर राज्य सभा में पहुँच गए है भले ही वहां शपथ भी नहीं बोल पाए लेकिन मरते मरते भी देश की सेवा का जो व्रत लिया है उसे वो छोडेगे नहीं दोनों बुजुर्गों में सत्य को पकड़ने का फेविकोल बहुत ही मजबूत है बूटा सिंह उम्र से बुजुर्ग हो गए तो क्या हुआ, दिल से वह जवान हैं, तभी तो वह भरपूर सत्ता सुख प्राप्त करना चाहते हैं। सत्ता और सुविधा से उन्हें इतना लगाव है कि उनके बगैर जीवन को ही व्यर्थ मानते हैं। वैसे भी पद और सुविधाओं के बगैर जीने का मतलब ही क्या है।

भइया उमर अब्दुल्लाह को देखो जरा सा आरोप क्या लगा, तुरंत पद छोड़कर जाने लगे। वह तो गनीमत रही कि राज्यपाल ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया वरना बेवजह सत्ता और सुविधाओं से वंचित हो जाते। बूटा सिंह इस उम्र में भी नैतिक जिम्मेदारी वगैरह के थोथे आदर्शों में नहीं पड़ते, फिर क्या जरूरत थी उमर को यह सब सिर पर लादने की। पीडीपी के मुजफ्फर बेग चिल्लाते रहते, उमर को भी कहना चाहिए था कि कुछ भी हो जाए, पर इस्तीफा नहीं दूंगा। खैर अब तो जो हो गया सो हो गया।

बूटा सिंह कांग्रेस के युवा नेताओं को बहुत कुछ सिखा सकते हैं। वह उन्हें बता सकते हैं कि कुर्सी से लगन कैसे लगाई जाए। पद और सुविधा के लिए मर-मिटने का जज्बा कैसे पैदा किया जाए। कैसे आरोपों की बौछारों के बीच भी अविचल रहा जाए। बूटा सिंह ने कुर्सी के लिए जान देने की बात कहकर कुर्सी की गरिमा बढाई है हस्तिनापुर की परम्परा अभी भी जीवित है मुझे तो इसी बात पर गर्व है कि कांग्रेसी होने के बावजूद उन्हें देश की प्राचीन सत्ता - संस्कृति का इतना ख्याल है जय हो बूटा सिंह जी