सोमवार, 23 नवंबर 2009

अजब प्रेम की गजब कहानी




मेरे पडोस मे एक बुजुर्ग है अच्छी नौकरी से रिटायर हुए है मकान जमीन सम्पत्ति सभी कुछ है सरकार पूर्वजन्मो के अपने पापो का प्रायश्चित करने हेतु इन्हे पेन्शन दे कर अपने पाप धुल रही है रिटायर होने के बाद कुछ समय वे आज के दौर मे नैतिकता व इमानदारी की ऐसी चर्चा करते थे जैसे इन्होने अपने आफ़िस मे इन्ही सब वस्तुओ की खेती शुरू की थी और कोई इनकी फ़सल पर आँख लगाये हुए बैठा हुआ है तथा इन सब वस्तुओ का कापी्राईट इन्ही के पास है
इन दिनो इन्हे शौक चर्राया है मुहल्ले की बहू बेटियो के चरित्रों पर एफ़ बी आइ की तरह नजर गडा कर रखना | पवित्रता का मन्त्र पढ कर ये अपने को पूरे दिन के लिये शुध्द मान लेते है ये हमेशा दूसरे की अपवित्रता के मोश्चराईजर से अपना मुँह चमकाते रहते है धवल चेहरे के साथ पान घुलाते हुए ये जब भी मुंह उठा कर बोलते है तो लगता है कि चाँद पर ही थूक देंगे जब भी मिलेगे तो मुह्ल्ले की लडकियो के भागने की पूर्व कथाये स्त्रियो के विवाह पूर्व गर्भपात की चर्चा वर्तमान पतिव्रताओ के प्रणय प्रसंगों की चर्चा मुझसे जरूर करते है मै पहले बुजुर्ग होने के नाते उनका लिहाज करता था लेकिन अब वे अझेल व अप्रासन्गिक हो गये है वे प्रायः अपने दिनों को याद करते है कि पहले का जमाना कितना अच्छा था कितनी अच्छाइयाँ समाज मे थी मानो अच्छाइयाँ सड्क किनारे खोमचे पर बिकती रह्ती थी और लोग अनजाने मे उसे मांग मांग कर चखा करते थे जिससे उन्के खून जिगर मे अच्छाइयों के किटाणु पाये जाते थे लेकिन मै जानता हू कि जितना बुरा जमाना आयेगा उतना ही ये अपने को स्वस्थचित्त व सुखी मह्सूस करेगे तब इन्हे उसी प्रकार गर्व होगा जैसे जार्ज पन्चम के सिक्को को आज कल के सिक्को के आगे मह्सूस होता है कि देखो इतनी मुद्राओ व गाधी की फ़ोटो लगे नोटों के आगे भी लक्ष्मी के रूप मे मेरी ही पूजा होती है इसी प्रकार पतनोन्मुख समाज मे वे पुराने चावल की भान्ति सुवासित होने क ढोंग रचते है कि किस प्रकार से हमने अपनी अक्षत अच्छाइयों को बचा रखी है
वे आज कल इन्टरनेट के माध्यम से होने वाली शादियो रीति नीति विश्वास परम्परा के विरूद्ध व्यथित है मैने एक दिन उनसे कहा कि जब एक युवा व युवती 18 वर्ष की होने पर सरकार चुन सकते है तो मन्गेतर चुनने मे कौन सी आपत्तिजनक है आप इस बात पर क्यों दुःखी होते है तब से वे मुझसे ही दुःखित हो गये है
जब मैने तफ़्सील मे जाकर पता लगाया तो पता ये चला कि उनकी लड्की ने बहुत पहले एक विजातिय लड्के से प्रेम किया था बात जब शादी तक पहुँचती तब उन्होने जबर्दस्ती एक ऐसे लड्के से उसकी शादी करा दी जिसका कुल गोत्र तो उंचा था कमाई कम थी पत्नी को प्यार भले ही कम करता था लेकिन दहेज को लेकर पीटता अधिक था जहिर है पुत्री अक्सर इस शादी को लेकर ताने सुनाती थी लेकिन वो इस पर कोई बयान नही देते थे देते भी तो क्या देते उन्हे तो यह आत्मिक सन्तोष था कि चलो उंचे कुल गोत्र खानदानी लोगो से ही तो पिट रही है कोई विजातीय अधर्मी से तो नही कम से कम अगला जन्म तो सुधर जायेगा
मै यही सोच रहा हू कि क्या प्रेम करने से पहले युवकों व युवतियों को एक दूसरे का कुल गोत्र जाति विस्वा पूछ कर प्रेम की शुरूवात करनी चाहिये वैसे मै अपना अनुभव बताऊ कि इन सब चक्करो के कारण ही मै प्रेम की शुरूवात ही नही कर सका जिस कुल गोत्र से बान्धा गया उसी से मन्त्रविद्ध हू लेकिन एक शायर का शेर इनदिनो पढा पता नही पहले क्यो नही पढ्ने को मिला तो अब यह खयाल आता है कि आदर्शवाद मे काफ़ी कुछ खोना पड्ता है शेर कुछ यू है
सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर,
जमाने से लडना है तो जिगर पैदा कर |
कौन सी शय है जहाँ जज्बा माशूक नही ,
शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर |

तो मेरी सलाह ये है कि इन बुजुर्गो की बात पर ध्यान ना दे कर प्रेम आदि के मामले खुद ही निपटा लेना चाहिये ये बुजुर्ग तो प्रेम के नाम पर प्रेम चोपड़ा को ही जानते है जिन्दगी भर हनुमान चालीसा पढने का ढोंग करते हुए इन्होने बिना प्रेम किए ही परिवार में लाल तिकोन को ही वृत्त व अष्टभुजाकार ज्यामिति में बदल डाला तथा पूछने पर उसे हनुमान जी का आशीर्वाद व प्रसाद मान लिया


सोमवार, 9 नवंबर 2009

कौन कहता है गांधीवाद सामयिक नही है



कौन कहता है कि देश गांधी के दिखाए रास्तो से भटक गया हैजिधर देखो उधर ही महात्मा गाँधी मार्ग है और तो और ओबामा साहिब ने भी गांधी को आदर्श मान लिया ये अमेरिकी भी बड़े कौतुकी होते है वैसे ओबामा साहिब ने गांधी वाद को २००९ मेंआदर्श माना है जिसमे थोडा सा बदलाव आया है 1947 व 2009 के गांधी जी के बंदरो में भी जाहिर है प्रगति आई है ओबामा का इशारा प्रगतिशील भारत 2009 के बंदरो से था

राज तुम आगे बढो सब मराठी साथ है



आज़ पूरे विश्व मे बर्लिन की दीार को गिराने की 20 वी वर्ष गाठ मनाईं जा रही है वहीँ यह खबर भी आयी कि महाराष्ट्र विधानसभा मे अबू आजमी को हिन्दी मे शपथ लेने के कारण म न से के विधायक गणो ने हन्गामा किया तथा उन्हे हिंदी मे शपथ लेने पर टोकाटाकी हाथापाई की वैसे अबू आजमी ने भी उन्हे चप्पलें दिखाईं

वैसे मै इन सब नाट्क बाजियो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना समय की बर्बादी मानता हूँ जैसे वन्दे मातरम विवाद हम मे से अधिकाँश को वन्दे मातरम तो दूर सही तरी्के से जन गण मन भी गाने नही आता वे ऐसे लोगो से जिन्हे सद्दाम के कुवैत आक्रमण पर जश्न मनाते तथा सद्दाम की मौत पर शोक मनाते देखा है लेकिन तालिबानो के आक्र्मण पर कभी छाती पीट्ते नही देखा उनसे वन्दे मातरम गवा कर हम क्या हासिल करना चाहते है ? पता नही महाराष्ट्र का यह नाटक हिन्दी विरोध का था या अबू आज्मी का विरोध / सम्भव है वन्दे मातरम को ना गवाने की झुंझलाहट मे अबू आजमी को लपेट लिया गया हो वैसे इस पार्टी ने अपने नाम मे निर्माण व सेना जैसे हिन्दी शब्दों का प्रयोग क्योन कर रखा है यदि मराठी भाषा मे कोई अन्य शब्द हो तो उसका प्रयोग करना चाहिये क्योंकि इन शब्दबोधन से पार्टी ही दोगली लगने लगती है उसी प्रकार से विधायक राम कदम को भी अपना व अपने पूर्वजों का नाम शुद्धिकरण कर मराठी भाषा मे परिवर्तित कर लेनी चाहिये उत्तर भारतीय हिन्दी नामो के परित्याग से ही तन मन व सभी तंत्रिकाएं शुद्धरूप हो सकेगी वैसे भी हमे यह तो मानना ही पडेगा कि एक राष्ट्र के भीतर एक महाराष्ट्र है तो जहिर है कुछ विसंगतियों को तो देखना हमारी नियति ही है वैसे भी मुझे लगता है कि कुछ दिनो के बाद हम सम्विधान की कसम खाने पर भी विवाद देखेंगे तथा एक याचिका के फ़ैसले के बाद विधायको को यह छूट मिल जायेगी कि वह अपनी मनःसृष्ट भाषा मे किसी कहानी जैसे अलीबाबा और … या बाबा भंजक नाथ के नाम पर शपथ ले सकते है बर्लिन की दीवार भले टूट ज़ाये परंतु बोलीवुड की यह दीवार काफ़ी लम्बे समय तक महाराष्ट्र मे हाउस फ़ुल शो दिखाने वाली है जै महाराष्ट्र

हिंदुस्तान की सरजमीं पर हिंदी बोलने पर पीटने की घटना का जिक्र तो आज तक जम्मू-कश्मीर में भी सामने नहीं आया है।

जहाँ ३७० के कारण इतनी छूट मिलीहै महाराष्ट्र के विधायको ने अहिन्दीभाषी राज्यों के लिए पृथक आचारसंहिता का ही निर्माण कर डाला है

राज ठाकरे आगे बढ़ो, सब मराठी साथ है !
तुमच्य सर्व आमादारंचे अभिनंदन!!!!

नोट ऊपर के चित्र के रचनाकारों के आद्याक्षर कार्टूनों में अंकित है ऐसे चित्र उन्ही की संपत्ति है साभार प्रकाशित करना विवशता में हुआ है इनके चित्र को इनका महिमामंडन माना जाए


शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

कांग्रेस द्वारा जीत के बाद जनता को संदेश


जनता ने कांग्रेस को इस बार जिताया तो कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा चित्रों की जुबानी कुछ इस तरह से बयाँ हुआ अब पूरा हाथ आम आदमी के हाथ नहीं है मंहगाई बेरोजगारी से त्रस्त जनता को कांग्रेस ऐसा संदेश दे रही है

सेमीनार आदि को सफल बनाने के नुस्खे एक शोध

सभा को सफ़ल करने के लिये तीन चीजो की आवश्यकता होती है अध्यक्ष मुख्य अतिथि तथा संचालक जब तक इन तीनो की खोज कोई आयोजक नही करता तब तक उसका आयोजन सफ़ल नही माना जा सकता
अध्यक्ष – प्रत्येक शहर मे कुछ स्थाई तथा कुछ अस्थायी अध्यक्ष होते है जिन्हे जनता जानती है तथा पह्चानती है ऐसे अध्यक्ष शहर की जान होते है लोक सभा हो शोकसभा हो राज सभा हो या खाज सभा हो ये अध्यक्ष इस भार को उठाने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं
एक प्रोफेशनल अध्यक्ष वही होता है जो किसी आमन्त्रण को कुछ आनाकानी के बाद सन्कोच के साथ स्वीकारोक्ति दे जो नौसिखिये अध्यक्ष होते है वे आमन्त्रण पाते ही शेव बनाने मे लग जाते है तथा आयोजन स्थल पर पहुँचने के एक घंटे पूर्व तक शेव पर पाउडर सेंट से सुवासित हो कर लक्दक सफ़ेद कुर्ते शेरवानी मे तैयार हो कर आयोजकों की प्रतीक्षा करते है जिनकी दाढ़ी होती है वे अपनी दाढी मे उँगलियों को डाल डाल कर उसे उलझाऊँ बना देते है ताकि वे चिन्तक टाइप लगे यदि आयोजक वाहन के साथ आत है तो ये मूत्र विसर्जन आदि क्रिया करने के बाद वाहन मे बैठ जाते है अन्यथा की स्थिति मे ये किसी साधन से सभा मे पहुँच कर देरी से अग्रिम पन्क्ति मे तब पहुँचते है जब कोई देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मी गाना बज रहा हो अग्रिम पन्क्ति मे पहुँचने क फ़ायदा यह होता है कि आयोजकों की नजर उन पर पड जाये
मन्च पर अध्यक्ष के बैठते ही माहौल गम्भीर हो जाता है सन्चालक जो अभी तक सियार की तरह हुआ हुआ कर रह होता है वे अचानक अमीन सयानी कि तरह आवाज निकाल कर अध्यक्ष की प्रन्शसा मे कुछ इश्किया शायरी के बल पर ऐसा समा बान्धते है जैसे अध्यक्ष न हुआ कोई फ़रिश्ता जमीन पर आ कर आमीन कर रहा है
आयोजनों मे सन्चालक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है कुछ सन्चालक ऐसे कुचालक या कुपात्र होते है कि सम्वाद कि ऐसी तैसी कर डालते है इतिहास साक्षी है कि कई सन्चालको के चलते सभाओं मे जूते चप्पल चल जाते है आयोजन नही चल पाता
इस लिये आयोजको को कुशल सन्चालक की खोज ऐसे ही करना चाहिये जैसेकि लड्की का बाप इन दिनो वर ढूढ़ने निकलता है वैसे प्रत्येक शहर मे रेडीमेड सन्चालक आसानी से मिल जाते है जो प्राय: इश्क़ मे नाकाम शायर होते है जिन्हे कवि सम्मेलनों मे जगह नही मिलती
अब थोडी चर्चा मुख्य अतिथि की हो जाये वैसे इस प्रजाति के जीव हर नगर शहर मे बहुतायत मे होते है जैसे मन्डलायुक्त एस डी एम कुलपति कुलाधिपति ( राज्यपाल से इतर ) महपौर नगर पालिका अध्यक्ष आदि
मुख्य अतिथि जितना ही विषय से अनभिज्ञ हो उतना ही अच्छा होता है उसकी अनभिज्ञेय होना उसके भाषणबाजी मे जान डाल देता है श्रोता भावविभोर व भावशून्य दोनो स्थितियो के बीचोंबीच डोलता हुआ समझ नही पाता की वह किस लिये आया है तथा इस सभा से उसे कुछ लाभ होने वाला है कि नही यही तो आयोजन की सफ़लता का राज है कि श्रोता पूरीतरह से असमंजस मे पडा रहे तथा अन्त तक यह स्थिति बनी रहे इसमे मुख्य अतिथि के अज्ञानी होने से बडा लाभ होता है कभी कभी मुख्य अतिथि को बार बार बैनर देखना पड़ता है कि वे किस सभा मे आये हुए है सफ़ल मुख्य अतिथि वही है जो बार बार घडी देख कर एह्सास कराता रहे कि सन्चालक उसके अतिव्यस्त होने ka बखान कराके यह अहसास करात रहे कि सभी के सौभाग्य से वे आज हमे धन्य करने आ पधारे है वैसे मुख्य अतिथि व द्वार पूजा के हाथी मे कोई खास अन्तर नही होता दोनो शोभाकार ही होते है शान से धीरे धीरे आते है और काम हो जाने के बाद वन्दना पूजा कराने के बाद खिसक लेते है
आयोजक कभी कभी सरस्वती वन्दना करने वाली बालाओ को कनखी से देख कर अपने बालो पर हाथ फ़ेर लिया करते है जिस आयोजन मे सरस्वती वन्दना वाली बालाये नही होती वहाँ ये सन्स्कार की दुहाई देते है कि सन्स्कारो का पतन हो गया है दूसरे अर्थो मे आयोजक सन्स्कार विहीन है जो मुख्य अतिथि आयोजन व आतिथ्य से प्रसन्न हुआ रहता है वह आयोजकों को उनके समाज़ के प्रति उत्तरदायित्व की महत्ता बता कर सस्था की बडाई कर विशुद्ध आशीर्वाद दे कर फ़ूट लेते है लेकिन जो माइक देर तक पकड कर बोलना चाह्ते है उनकी विद्वता की पोल खुल ही जाती है लोकप्रिय अतिथि जल्दी से आशीष दे कर अगले कार्यक्रम की ओर बढ जाते है
रही बात अध्यक्षों की तो पूरे सभा मे सबसे निरीह प्राणी बन कर सबको सुनता है कभी विषयवस्तु तो कभी विषयासक्त होता रहता है बार बार गालो पर हाथ फ़ेर फ़ेर कर सोचता है शेव कैसी बनी है कभी फूल तो कभी फूलदान को देखता तकता है कभी उन मालाओ को देखता है फ़िर फ़ोटोग्राफ़रो को देख कर स्मित ओठ फ़ड्फ़डाता है
उसके भाषण की बारी नैराश्य पूर्ण होती है क्यो कि बोलने को कुछ बचता ही नही जो अनुभवी अध्यक्ष होते है वे तो पूर्व वक्ताओ मे से किसी से सहमत होते हुए सभा की सार्थकता का बखान करते हुए आने वाले किसी भी आयोजन मे बुलवाने पर अग्रिम स्वीकृति दे डालते है लेकिन कुछ अध्यक्ष पूरे सभा की विषय से अचानक असहमत हो जाते है ऐसा प्राय: नौसिखिये अध्यक्ष जो कब्ज के शिकार रहते है वही करते है वह असहज रूप से किसी वक्ता जिसने वाहवाही लूटी हो उससे असहमत हो कर कुछ भी कह जाते है जैसे वक्ता ने कहा हो कि आधी गिलास भरी है तथा आधी गिलास खाली है यह अपनी सोच है इस पर अध्यक्ष यह कहेगा “” जैसा कि पूर्व विद्वान वक्ता ने कहा कि आधी गिलास खाली है लेकिन जगत मे कुछ भी तो रिक्त नही जो रिक्तिमय है वह भी हवा से भरा है यदि आप हवा हटा कर निर्वात की बात करते है तो या तो उसमे प्रकाश होगा या अन्धेरा दोनो ही स्थितियाँ समाज के लिये चिन्तन की बात है इस पर हमे सोच-विचार करने की जरूरत है यदि समाज मे अन्धेरा बढ्ता है तो इस पर विचार करना होगा मै चाहूँगा कि इस दिशा मे संस्था और अधिक सोचे वैसे अन्धेरा बढ रहा है इस लिये मै अपनी वाणी को विराम दे कर आयोजको को धन्यवाद देता हू “ इस कथन पर सभा समाप्त होती है
भविष्य के आयोजकों के लिये यह लघु शोध पथप्रदर्शक बने यही कामना है
सेमीनार में सावधानी पूर्वक इन पात्रो के चयन से सेमीनार सभाए अवश्य सफल होंगी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मरदाना ताकत की दवा की जरूरत युवकों व बुजुर्गों को है


आज कल जिधर देखिये स्त्री विमर्श की चर्चा सुनाई देती है लेकिन मर्द विमर्श कि चर्चा कम हीसुनाई देती है स्त्री विमर्श मे स्त्रिया क्या करे क्या पहने कैसे चले आदि की चर्चा सामान्यतः होतीहै जिससे मर्द उन पर किसी नारी मूलक अत्याचार करने को मजबूर हो जाये. इस पर काफ़ीचर्चा हो चुकी है मै आज वोह मसला उठा रहा हूं जिस्के बारे मे अख्बारो मे खास तौर से हिन्दीअख्बारों में पन्ने भरे रह्ते है तथा लोग कभी ध्यान नही देते शायद ही कभी स्वास्थ्य मन्त्री ने इस पर बयान दियाहो यह बीमारी है मर्दाना कमजोरी की जो पढ्ने पर लगता है कि आबादी का बडा हिस्सा इससे पूरे साल बीमाररहता है
भला हो इन बी एम एस डाक्टरो का जो अर्हनिश सेवा कर रहे है यहां तक कि अपना वाहन रेलवे स्टॆशन परमरीजो को ढोने के लिये खडॆ किये रहते है वैसे इनकी इस समाज सेवा को देखते हुए कभी भी हमारे नेता अभिनेताने इनका सम्मान नही किया यह बडॆ ही दुःख की बात है इस मामले मे हमारा समाज क्र्तघ्न है जिसकी भर्तस्ना कीजानी चाहिये यह मर्दाना कमजोरी कब से शुरू हुइ इसका ठीक ठीक समय का अन्दाजा लगाना कठिन है लेकिनवीर गाथा काल के बाद इस रोग का प्रकोप शायद हुआ होगा जो बिहारी आदि कवियो ने समाज से छुपा कर रखाअपनी कविता मे कही भी नायिका से इसका जिक्र तक नहीं कराया कि नायक के इस रोग से ग्रस्त हो जाने केकारण नायिका असमय ही विरहणि हुई जा रही है वह वैद्यो के द्वारों पर जाते जाते कुम्हला गयी है पीली सरसो केफूल सी दिख रही है सहेलिया ताने मार रही है कि द्र्ग भी उल्झाया तो ऐसे कमजोर व्यक्ति से जो खुद बिस्तर कीसिल्वटे गिन गिन कर रात बिताता हो आदि--आदि
लेकिन रीति काल के कवियो ने सब कुछ गुडी गुडी सा लिख मारा भला आप ही सोचे, जिस बिहारी मतिरामघनानन्द को पढ कर आज कल के छात्र बौरा जाते है तथा क्लास मे ही कमजोर दिख्ने है उस काल के साहित्य जोसमाज का दर्पण था उसकी रचना करते समय क्या कोई कमजोर मर्द इन्हे नही दिखा मुझे तो लगता है कि शायदये कवि ही इन बीमारो का गुप्त इलाज करते होगे तथा ठीक होने के बाद उन्हे अपने पैम्प्लेट मे यह मुफ़्त कविताओकी सचित्र पुस्तिका देते होगे ताकि उन्हे कभी निराश ना होना पडे
मुगल काल मे भी इस रोग का कोई खास जिक्र नही मिलता हो सकता है खानदानी हकीमो को दरबार से फ़ुर्सत हीना मिलती हो कि वे आम लोगो की खास बीमारी के बारे मे ध्यान दे वे शाही इलाज करते रहे राज वैद्यो ने कभीजनता की ओर देखा तक नही और परिणाम सामने था लडाई मे जनता हारती रही रियासते गुलाम होती गयीलेकिन ना तो शाहो ने अपने शाही हकीमो को प्राईवेट प्रैक्टिस की छूट कभी नही दी सो उसका खामियाजा पूरे देश नेभुगता
अन्ग्रेज व्यापारी मुगल शासको को ताकत की दवा देने के नाम पर फ़ैक्ट्रिया खोलने की इजाजत पा कर क्या क्याकरते रहे वह इतिहास मे लिखा हुआ है लेकिन औरन्ग्जेब के बाद के मुगलो के बारे मे जो लिखा गया है कि वेअयोग्य कमजोर शासक सिध हुए इसके बारे मे इतिहासकारो की लेखनी चुप रहती है अन्ग्रेजो ने दवा के नामपर खडिया का पाउडर मुगलो तथा रियासतो को सप्लाई करते रहे मुफ़्त के सैम्पल की दवा सब खाते रहे देशगुलाम होता गया
आयुर्वेद मे इसका इलाज मुफ़ीद है वह किसी इतिहासकार ने नही बतायी यह लिख कर चुप हो गये कि फ़ला लडाईमे परास्त होने के बाद फ़ला राजा ने जन्गलो मे घास की रोटी खायी सेना को फ़िर इकठा किया तथा राजधानी परहमला कर दिया ये ताकत उन्हे जन्गलो मे असली शिलाजीत आदि से ही तो मिलती होगी यह अलग बात रही होगीकी मात्रा आदि गलत हो जाने के कारण इन राजाओ को सफ़लता नही मिली कारण था शाही हकीमो राज वैद्यो कीसलाह ना लेना उन्हे हार के बाद स्वर्ण भस्म युक्त दवा तथा गिजा लेना चाहिये था औषाधिया गर्म दूध या धारोष्णदूध से लेना चाहिये था जो उन्होने नही किया तो कम्जोरी के लिये आयुर्वेद को कैसे दोषयुक्त माना जाये सलाह मानीनही तथा पूरे देश को भुगतना पडा
आज़ादी मिलने के बाद कुछ गिने चुने खानदानी हकीमो डाक्टरो का समाज को शुक्र गुजार होना चाहिये जिन्होनेपूरे समाज को खास तौर से मर्दो को नया जोश ताकत दिलाने के अपने दादा परदादा लकड्दादा के दिखाये हुयेखानदानी नुस्खे के शाही इलाज को आम जनता के लिये सुलभ कर दिया है जिसका परिणाम है कि घर पर देश परकोइ एक आख से देखने की हिम्मत नही कर सकता हा ये अलग बात है कि इन मर्दो की सन्तान कमजोर हो रही हैलेकिन उसके लिये ये मर्द ही जिम्मेदार है वह अपनी घर वालियो को पिस्ता बादाम गिजा नही खिला पाते तोऔरते एनिमिया शिकार होगी तथा उनकी सन्ताने कमजोर होगी इसके लिये सरकार ने जननी सु जैसी योजनाचला रखी है मर्दो को उन्हे वहा भेजना चाहिये हम तो सिर्फ़ मर्द को ताकत देते है ताकि उन्हे कही निराश ना होनापडॆ
गत चुनाव में मनमोहन की कमजोरी का ऐसा बखान हुआ कि मुझे ऐसा लगा कि कहीं उन्हें भी इन दवाखानों मेंमर्दाना ताकत कि दवा लेनी पड़े तथा ताकत का प्रमाण पत्र भा पा के मुंह पर दे मारे पर नरेगा का टानिक हीउन्हें मजबूत कर शिलाजित की तरह कर दिया वाजीकरण इसे कहते हैं राजनीति में मरदाना ताकत वोटर छापअसली केशर भस्म से बनाती है इसे कौन नहीं जानता जब सत्ता में होते हैं तो शिलाजीत कि नहीं शीला जी कीजरूरत होती है वैसे भारत में मरदाना ताकत के क्षेत्र में जितना शोध कार्य हुआ है उतना परमाणु बम के परीक्षण मेंनहीं हुआ | मैं तो कभी यह सोच कर हरान हो जाता हूँ की यदि सभी मर्द ताक़तवर हो जायें तो बेचारी स्त्रियों को तोपड़ोसी देशो से इंपोर्ट करना पड़ जाएगा तथा तब जनसँख्या वृद्धि की दर क्या होगी भला है की काफी लोग अभीशाही इलाज करा रहे हैं नहीं तो हरम के लिए metromonial गे-tromonial के अलग से विज्ञापन छपते शुक्र हैकी अभी इस प्रकार का शाही इलाज से ताकतवर कोई शाह सामने नहीं आया अन्यथा स्त्रियों पर क्या क्या बीततीये अकल्पनीय है अभी तो कमजोर मर्द नपुंसक स्खलन्शील पतनशील तथाकथित मर्द ही स्त्रियों पर तरह तरह केअत्याचार बलात्कार कर रहे हैं जिससे नारिया आसानी से बाहं छुडा लेती हैं यदि ताकत के बाद भुजाओं में रावनका बल जाए तो क्या होगा
सरकार भले ही इस बीमारी पर ध्यान ना दे रही हो लेकिन हमारे हिन्दी अखबारो के सम्पादको का मै शुक्रिया अदाकरना चाह्ता हू जिन्होने तमाम फ़ार्मेसियो का प्रचार प्रसार कर अपने सामाजिक दायित्वो का निरन्तर परिचयदिया है यदि ये अखबार ना होते तो हमे कैसे पता चलता कि फ़ला फ़ला फ़ार्मेसी के गोल्ड मेद्लिस्ट डाक्टर साहब नेजापानी आर्गन डेव्लपर मशीन मगा ली है इस्के लिये लोगो को वीजा पास्पोर्ट के लिये भट्कना नही पडेगा इनतमाम वर्धक यन्त्रो के प्रचार प्रसार मे प्रिन्ट मीडिया के प्रचार प्रसारको का हम तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैकि सरकारी उदासीनता के बावजूद इन्होने इन खानदानी हकीमो को इज्जत बख्शी है वैसे तो इन हकिमो कोविदेशियो से ही सम्मान मिलता रहा है हमरे राजनेताओ मे अमर सिह मे भी इतना शऊर नही है कि वे इनचिकित्सको को अपने हाथो से सम्मानित कर सके इस राजनीतिक उपेक्षा के शिकार सम्म्मान के हक्दारो कोसम्पादको से सम्मनित कराने की मुहीम मे आप सभी शामिल हो यही गुजारिश सबसे है
जब हम पढा करते थे तो एक कहावत कहते थे कि MATH IS LIKE A HUMAN ANTI FERTILITY DRUG इस सूत्र से तो ऐसे सभी छात्र जो डाक्टर बने उन्हें मरदाना कमजोरी का मरीज स्वयं हो जन चाहिए यह शोध काविषय है गुलाम नबी साहब आप इन शिफा खानों का बारे में कोई प्रतिक्रिया देंगे जो आपके परिवार नियंत्रणकार्यक्रम को कबाड़ खाने में पंहुचा रहे हैं
जय हो क्लिनिक व शिफाखाने जो बचपन की गलतियों को जवानी में सुधारने का दावा करते हो जवानी की गलतियों को बुढापे तक सुधारते चलते हो काश बोर्ड परीक्षाओं के एक्जामिनर भी आप लोगो जैसे होते तो वाकई कई लोगो की नादानिया व परेशानियाँ आज खुशियों में तब्दील हो जाती | खुदा ऐसी हिकमत बोर्ड एक्ज़मिनरों को दे देता तो बहुत से पापाओं को अच्छी नौकरी मिल जाती तथा वे सुखी रोटी बगैर दाल के ही वो ताकत रखते की जमाना देखता काश ऐसा हो जाता

रविवार, 27 सितंबर 2009

राखी सावंत से समाजशास्त्रीय सवाल जबाब

साधो एक दिन रात में टी वी का कार्यक्रम देखते देखते सो गया तो मुझे ऐसा आभास हुआ कीमैं राखी जी से सामाजिक मूल्यों पर उनका साक्षात्कार ले रहा हूँ इस साक्षात्कार से मेरे शरीर केहर ज्ञान चक्षु मानो खुल गए तथा सारी थकावट दूर हो गई उस सवाल जबाब का सिलसिला शुरूकरते हैं ( राखी जी से क्षमा याचना सहित कि इनकी यह फोटो फोटो राखी जी के सामाजिकप्रतिमानों के विपरीत लगे हैं )
प्रश्न --- क्या आप यह मानेंगी कि आपका अंग प्रदशन नई पीढ़ी पर दूषित प्रभाव डाल रहा है ?
राखी- (खिलखिलाते हुए) देखिए हमारे अंग प्रदर्शन का समाज के सभी वर्गों पर बडासकारात्मक असर डाल रहा है पहले बच्चों को लेते हैं- बच्चे पेड़ पर नहीं उगाए जाते, फैक्ट्री मेंनहीं ढाले जाते, बिस्तर पर बनाए जाते हैं, भोले बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासाएं होती हैं, वे छोटेक्यों हैं, बड़े बड़े क्यों हैं, वे इस दुनिया में कहां से आए, मां बाप , कुटुम्बी, टीचर उन्हें सही उत्तरदेना गन्दी बात समझते हैं-हमारे अंग प्रदर्शन से उन्हें काफी जानकारी मिल जाती है, जो उनके मानसिक विकासमें बहुत काम आती है। जहां तक यंग लड़के लड़कियों का प्रश्न है तो उनके लिए हमारा अंग प्रदर्शन एक वरदान है।इससे उनमें साहस और आत्मविश्वास, खासतौर से लड़कियों को तो अपनी बाडी की ताकत और कीमत का अन्दाजलग जाता है।

अब लीजिए काम धंधे में फंसे और पिसते वर्ग को तो हमारा अंग प्रदर्शन पल-भर की चैन देता है प्रदर्शन उनकेघुटन भरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका है, तपते रेगिस्तान में शीतल छांव है। मैं एक ट्रेड सीक्रेट बताती हूं, खर्चकरने की पावर के चलते यह वर्ग हमारी इंडस्ट्री का मेन टारगेट है। मुझे इस वर्ग से बहुत ही उम्मीद रहती है जबएक मध्य वर्ग का व्यक्ति मेरे शो को ऐसे ध्यान से देखता है जैसे सत्य नारायण की व्रत कथा मे सन्कलप ले करकथा सुन रहा हो तो मुझे लगता है कि मेरा जीवन कला के प्रति समर्पण सफ़ल हो गया

अब बात करें स्त्री की, हम उन्हें पुरुष की गुलामी से छुटकारा पाने का आसान मंत्र दे रहे हैं, शरीर के सटीक प्रयोगसे, वे जो चाहें जहां चाहें, हर चीज़ हासिल कर सकती हैं। आशिकी से लेकर नौकरी तक , ग्लैमर की दुनिया से लेकरपालिटिक्स हर जगह यह मन्त्र अमोघ बाण का काम करता है।

रही बात बुजुर्ग पीढ़ी की, उनकी छोड़िए। जब से दुनिया बनी है तभी से नई पीढ़ी के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, चलने-फिरने हर बात में माथा पीटते हैं। खुद अपने टाइम में मजे मार लिए और हमें उस मजे सेरोकते हैं। हम जानते हैं कि उम्र के चलते अंगूर खट्टे हैं वरना क्या-क्या नहीं करते। दरअसल यह जनरेशन गैप है, इसलिए हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। तरस आती है उनकी सोच पर

प्र्श्न------ लेकिन आप यह जरूर मानेंगी कि सेक्स के भौंडे प्रदर्शन से समाज में सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिकमूल्यों में गिरावट रही है।
राखी -- प्लीज माइंड योर लैंगवेज। अंग प्रदर्शन एक कला है, भौंडा वह होता है जिसके मूल में मूर्खता हो, फूहड़ताहो, अव्यवस्था हो। हमारा हर मिनि प्रदर्शन योजनानुसार आकर्षक और शानदार होता है। उसको भौंडा कहनाअपनी नासमझी ज़ाहिर करना है। मैने अभी आपको अँग प्रदर्शन के लाभ गिनाए हैं।
जहां तक आपके इन सोकाल्ड मूल्यों का सवाल है तो मेरी राय है कि आप लोग पहले अपने इन मूल्यों को मजबूतबनाइये। एक आँख मिचकाने या जरा सा बाडी हिला देने से जो मूल्य भरभरा कर गिर पड़ें, उन्हें कोई नहीं बचासकता। आप धर्म की बात कर रहे हैं, लाखों की भीड़ के बीच से नागा साधु त्रिवेणी नहाने जाते हैं। नैतिकता कादोहरापन देखिए, खजुराहो और कोणार्क की मिथुनरत मूर्तियां और पैरिस के चित्रों की तारीफ में जिनकी जुबाननहीं थकती, वही हमारी अर्धनग्नता पर नाक भौं सिकोड़ते हैं। पतन-पतन कर छाती पीटते हैं। अरे नग्नता तोनग्नता है, चाहे पत्थर में हो, कागज पर हो या सशरीर सामने हो! यदि उन्हें आपने कला का दर्जा दिया है तोआपको हमारे अंग प्रदर्शन को कला मानना ही होगा जीवित कला हा हा हा -----
प्रश्न.- मैडम बुरा मानें आप लोगों पर नंगई इतना हाबी है कि कला जैसे पवित्र शब्द को गन्दगी में घसीट रही हैं?
राखी-(टोकते हुए) ...मैं कला में गन्दगी नहीं घसीट रही हूं, थोथी कूपमंडूकता को झिंझोड़ रही हूं। दोहरेपन कीनकाब उघाड़ रही हूं जो औरत को देखते ही बिस्तर पर बिछाने की कल्पना में डूबने उतराने लगते हैं। और ऊपर सेकला पारखी, समाज सुधारक जैसे मुखौटे लगा लेते हैं। यह दोहरा माप दन्ड नही चलेगा
प्रश्न.- आप अंग प्रदर्शन को आप किस सीमातक जायज समझती हैं ?
राखी.- जिस सीमा तक लोगों को अच्छा लगे...आप अपनी सीमा बताइये
प्रश्न. -यानी लोगों के चाहने पर आप और छोटी साईज के कपडे पहनने मे विश्वास करती है ?.
राखी- मैं समझ गयी आप अंग प्रदर्शन की सीमा को क्वांटिफाई करना चाहते हैं। देखिए यह तो आप जानते ही होंगेकि वेश्या की नग्नता कौड़ियों में बिक जाती है, जबकि हमारी अर्धनग्नता हमें लाखों-करोड़ों दिला देती है।लुकाछिपी के इस खेल में कपड़ों की सीमा जरूरत के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। दरअसल यह अर्थशास्त्र काप्रश्न है, आप जितना इसको समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझते जाएंगे। चलिए एक सूत्र देती हूं विश्व भर कीविग्यापन-दुनिया का बजट करोड़ों नहीं अरबों में है और वह समूची दुनिया औरत के कपड़े पहनने, उतारने कीबैसाखी पर टिकी है, ड्रेस का साइज उसी के मुताबिक तय होता है।
प्रश्न- लोग आपकी आलोचना करते हैं आपको इसका बुरा नहीं लगता ?
राखी- (हल्की मुस्कुराहट) बुरा लगने का तो प्रश्न ही नहीं होता, बल्कि यह तो हमारी सफलता की निशानी है।जितनी अधिक चर्चा होगी, उतनी पब्लिसिटी मिलेगी। नाम ना हुआ तो क्या बदनाम तो हुए पब्लिसिटी आगे बड़ेबड़े काम दिलाती है और फिर तरक्की की राह में रोड़े अटकाना, बढ़ते की टांग खींचना लोगों की
कठमुल्लों की पूछिए, हर चेंज और तरक्की पर हाय-तौबा मचाना उनकी फ़ितरत है, उनका बस चलता तोइन्सान को गुफा-युग से बाहर नहीं निकलने देते, उनकी बकवास का हम कतई परवाह नहीं करते
सवाल जबाब की यह कडी बीच मे ही रह गयी क्यो कि मेरी नीद टूट गयी थी सवेरा हो चुका था और बर्तन मान्जनेवाली राखी (राख) चहिये थी सो वह राखी कहा है चिल्ला रही थी मै उस राखी की तलाश मे बाहर निकल गया था