बुधवार, 30 जून 2010
क्या यही नारी की आधुनिकता है
एक दिन ऐसा वाकया हुआ कि मैं अपने मित्र के साथ ऑटो से कहीं जा रहा था मेरे मित्र जो पेशे से वकील है तथा काफी दुबले पतले जीरो
साइज के है वह पीछे बैठे हुए थे मैं उनके सामने वाली सीट पर बैठा गुफ्तगू कर रहा था तब तक एक अधेड़ महिला जो स्वयं तो सलवार समीज में थी अपनी किशोर वय की कन्या के साथ बैठ गयी ऑटो में बैठते ही उन्होंने वकील साहब कों एक गंभीर किस्म का धक्का दिया जिससे वकील साहब का कृशकाय शरीर लैपटॉप से नोट बुक टाइप में बदल गया तथा वे अपनी इज्जत बचाते हुए ऑटो के किनारे दुबक कर रह गए
कुछ देर के बाद पुनः महिला ने दीर्घ स्वास ले कर एक हलका सा धक्का इस अंदाज में दिया मानो उसको बैठने में परेशानी हो रही है तथा कहा कि और खिसकिये इस पर बेचारे वकील साहब ने मिमियाते हुए कहा कि अब कितना पतला हो जाऊं दीवार से सटा हुआ हू आप कहे तो उतर जाऊं इस पर उस महोदया ने अंग्रेजी में गाली देते हुए कहा कि ना जाने कैसे कैसे लोग ऑटो में बैठ जाते है सिविक सेन्स नहीं है इन अनकल्चर्ड लोगो कों अभी मैं कुछ समझ ही पाता तब तक वकील साहब ने कहा कि मैडम कल्चर की बात ना करे तो अच्छा है यदि सार्वजनिक वाहनों से इतनी ही एलर्जी है तो ऑटो रिजर्व कर लेना चाहिए था ताकि अनकल्चर्ड लोगो से पाला ना पड़ता इस पर वे महिला ऑटो वाले कों बुरा भला कहते हुए कि कैसी जाहिल गंवार लोगो कों बैठा लेते हो रोको मुझे उतरना है
ऑटो वाला जब तक रोकता तब तक वकील साहिब भी आपे से बाहर हो चुके थे उनका पतला शरीर नाग के समान बल खा रहा था उन्होंने ऑटो वाले से कहा कि उतार दो मैं यह दोनों सीट रिजर्व कर लेता हूँ तुम्हे पैसे मिल जायेंगे अगले मोड़ पर वकील साहिब ने कह दिया कि मैडम आप का क्या कल्चर है वह आपके और आपकी कन्या के परिधानों से साफ़ झलक रहा है यदि बाहर आपका यह पहनावा और यह कल्चर दिख रहा है तो आपके परिवार का क्या संस्कार होगा सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है वकील साहब के इस तर्क से महिला पर तो कोई ख़ास प्रतिक्रिया नही हुई लेकी वह आधुनिका कन्या का चेहरा शर्म से लाल हुआ
दर असल जब वे दोनों भद्र स्त्रिया ऑटो से उतरी तो लड़की जो तंग जींस व टी शर्ट में थी शर्ट जो कुछ कुछ आधी सी थी तथा नाभि कों ढकने का प्रयास कर रही थी उस शर्ट पर एक स्लोगन लिखा था
virginity is not a dignity it is just a lack of opportunity
पहले तो मैंने इस पर ध्यान नही दिया केकिन बाद में घर आकर मैंने अपनी आधुनिका रिश्तेदार से इस सारी घटना की चर्चा करते हुए शर्ट पर लिखे आप्त वाक्य और उसके खरीदने वाले पिता माता या स्वयं उस लड़की की भर्त्सना करता उससे पहले ही उन्होंने मुझे यह कह कर चुप करा दिया कि बड़े किस्मत वाले हो तुम्हारे कोई लड़की नही है अन्यथा तुम ऎसी बात की चर्चा नही करते चुप चाप देख कर भी अनदेखा कर देते उनके इस उत्तर से हतप्रभ हो कर मैं उस दिन से यही सोच रहा हू कि क्या खुशबू जैसे लोग घर घर में नही है तब उसके एक बयान पर इतना बवाल क्यों ?
क्या लड़की के अभिभावक इतने निरीह हो गए है कि वे आधुनिकता के नाम पर ऐसे स्लोगन वाले वस्त्र खरीद कर पहनाते है क्या हमारी संस्कृति व मानसिकता में इतना परिवर्तन आ चुका है यदि वास्तव में ऐसा ही है तो वाकई मैं भाग्यशाली हू कि मेरी कोई लड़की नही है जैसा कि मेरी महिला रिश्तेदार ने मुझे बताया था
आप भी क्या ऐसा ही सोचते है वैसे मैं एक बात स्पष्ट करता दू कि मैं नारी समानता और स्वतंत्रता का समर्थक हू पर........
क्या आधुनिकता ने हमें इस कदर गुलाम बना रखा है
गुरुवार, 24 जून 2010
पत्नी पूजा पद्धति साकार ब्रह्म उपासना
आज कल कुछ ब्लागर मित्र नारी कों कौन सी देवी माने इसी चिंता में डूबे हुए हैं ,ऐसा लगता है की देवी रूप काआभास होते ही वे नारी कों उसी रूप में पूजना शुरू कर देंगे वैसे मेरा मत उनसे अलग है पहले हम सभी कों पत्नीपूजा की सही पद्धति कविवर गोपाल जी व्यास की इस कविता का प्रातः सस्वर पाठ कर सीखना चाहिए प्रस्तुत हैइस स्तोत्र के अंश रही बात नारी के लक्ष्मी या सरस्वती के होने के तो इस पर अलग से एक पूरक लेख प्रस्तुतकरने का प्रयास करूंगा भाई अरविन्द जी के लेख से प्रेरित हो कर मैंने सोचा की जन कल्याणार्थ पहले इस पूजापद्धति कों प्रकाशित कर दिया जाय , लेकिन एक बात समझ में नही आती की इतने वरिष्ठ चिट्ठाकार कों प्रातःकाल स्त्री कों कौन सी देवी माना जाय यह पोस्ट लिखने के पीछे आखिर कौन सी विषम परिस्थितिया कारक रही होगी
खैर इसके बारे में बाद में ,पहले पत्नी पूजा पद्धति का पाठ करते है इसके पाठ मात्र से स्त्री के देवी रूप रहस्यों के सम्बन्ध में पति के सभी जन्म जन्मान्तरो के भ्रम का निवारण हो जाता है तथा वह देह त्यागने के पश्चात स्त्री लोक वासी बन कर अनंत काल तक सुखो का भोग करता है लेकिन इसके लिए इह लोक में पत्नी चर्या का कठोर व्रत करना होता है
सर्व प्रथम प्रातः उठ कर नित्य क्रिया से फारिग हो कर विवाह कराने वाले अगुवा ( मध्यस्थ ) कों स्मरण कर ले उन्हें मानसिक रूप से अभिनन्दन करने के पश्चात
अपने स्वसुर व सास जी कों नमस्कार कर के ही इसका पाठ करना श्रेयस्कर है
अथ पत्नी पूजा स्तोत्र
अगर ईश्वर पर विश्वास ना हो,
और उससे फ़ल की आस ना हो |
तो अरे नास्तिको घर बैठे ,
साकार ब्रह्म को पहचानो |
पत्नी को परमेश्वर मानो|
ये अन्नपूर्णा जगजननी,
माया है इनको अपनाओ |
ये शिवा भवानी चन्डी है ,
तुम भक्ति करो कुछ भय खाओ |
सीख़ो पत्नी - पूजन पद्धति
पत्नी-चर्या पत्नी अर्चन
पत्नी व्रत पालन करे जाओ
पत्नीवत शास्त्र पढे जाओ |
अब कृष्णचन्द्र के युग बीते
राधा के दिन बढ्ती के है |
यह सदी इक्कीसवी है भाई,
नारी के ग्रह चढती के है |
तुम उनसे पहले उठा करो
उठते ही चाय तैयार करो
उनके कमरे के कभी अचानक ,
खोला नही किवाड करो
उनकी पसन्द के कार्य करो
उनकी रूचियो को पहचानो
पत्नी को …………………।
तुन उनके प्यारे कुत्ते को
बस चूमो चाटो, प्यार करो
तुम उनको टी वी देखने दो
आओ कुछ घर का काम करो
वे अगर इधर आ जाये कही
तो कहो – प्रिये आराम करो |
उनकी भौंहे सिग्नल समझो ,
वे चढी कही तो खैर नही |
तुम उन्हे नही डिस्टर्व करो ,
यू हटो बजाने दो प्यानो,|
पत्नी को परमेश्वर मानो |
तुम आफ़िस से आ गये ठीक ,
उनको क्लब मे जाने दो |
वे अगर देर से आती है ,
तो मत शन्का को आने दो |
तुम समझो एटीकेट सदा
उनके मित्रो से प्रेम करो
वे कहाँ , किस लिये जाती है
कुछ मत पूछो शेम करो ,
पत्नी को परमेश्वर मानो |
तुम समझ उन्हे स्टीम गैस
अपने डिब्बों को जोड चलो
जो छोटे स्टेशन आये तुम
उन सबको पीछे छोड चलो |
जो सम्भल कदम तुम चले चलो ,
तो हिन्दू सदगति पाओगे |
मरते ही हूरे घेरेंगी ,
तुम चूको नही मुसलमानों
पत्नी को परमेश्वर मानो |
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010
सन्त काशी छोड़ चित्रकूट पहुंचे

मै कुछ दिनो से ब्लाग की दुनिया से कटा रहा देर से आने के लिये खेद है आप सब भी यही सोचते होगे कि बाबा के रूप मे आने की कसमसाहट से कही मै वाकई कही आश्रम तो नही खोल लिया कहते है कि कभी ना कभी जीभ पर सरस्वती बस जाती है ऐसा ही कुछ हादसा मेरे साथ हुआ पता नही कैसे यह बात सरकार तक यह बात पहुच गई तथा सरकार या कहे प्रभु की माया के प्रकोपवश मुझे जनहित मे जाडे मे ही चित्रकूट भेज दिया गया हरिद्वार उत्तरखन्ड मे है सो वहाँ भेज नही सकते थे नही तो लगे हाथो आश्रम के बारे टेंडर आदि डाल कर कुछ सोचता
चित्रकूट के बारे मे मै क्या कहूँ कहा तो रहीम दास ने है जब वे जहॉगीर के दरबार से निर्वासित हो कर चित्रकूट मे एक भड्भूजे के यहॉ भाड़ झोक रहे थे तो महाराजा रीवा ने उन्हे अपने राज्य मे बुला कर आश्रय देने की पेशकस की तो रहीम जी का उत्तर था
चित्रकूट मे बस रहे रहिमन अवध नरेश
जा पर विपदा परत है सो आवत यहि देश
वस्तुतः भगवान राम ने अपने वनवास का बारह वर्ष यही चित्रकूट मे बिताया था इसे चित्रकूट धाम का नाम दिया गया है इसी के नाम पर यहा मन्डल बना दिया गया है नाम के विपरीत धाम के स्थान पर यहाँ झाम ज्यादा है धाम कम ऐसी पावन धरती पर विपदा के मारे लोग ही दूर से नौकरी कर रहे है बुन्देलखन्ड की विवशता विभीषिका तथा विपत्ति का अन्तहीन दौर देखने को मिल रहा है
मै जब चित्र्कूट पहुचा तो दो प्रमुख घटनायें घटी एक नाना देशमुख का निधन और दूसरी इच्छधारी बाबा का पुलिस द्वारा चित्रकूट लाया जाना इच्छाधारी बाबा के साथ कतिपय उच्च अधिकारी की फ़ोटो और उनके प्रभावपूर्ण क्रियाओ की मीमांसा हो रही थी
मैने तो सोचा था कि बी बी से दूर रह कर यानी पत्नि और ब्राडबैण्ड (बी बी ) दोनो नशे से दूर रह कर यही कुछ चेले चेलनियो के साथ आश्रम खोल दूँगा पर सत्यानाश हो इच्छाधारी सन्त का जो अपने ही गोत्र का निकला यदि मै अपना सरनेम द्विवेदी बता दूँ तो क्या होगा यही सोच कर सन्त बन कर आश्रम खोलने का विचार त्याग कर त्यागी बना हुआ बैठा हू मौके की तलाश मे हू जब यहा तक पहुच ही गया तो आश्रम कभी ना कभी तो खुल कर ही रहेगा यही कामना है
चून्कि अब यहा वैकल्पिक ब्राडबैण्ड बी बी की व्यवस्था हो गई है तो आप सब से फ़िर जुदा ना होगे, त्यागी हो गया हू इस लिये परिवार के विकल्पो की बात गुप्त रहेगी अब तो सारा समाज ही मेरा परिवार है हरि ओम
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
संत महात्मा बनने का घोषणा पत्र
सन्त बनने की बात मैने अपने पुराने लेख मे कही थी यह व्यवसाय लाभप्रद भी है, इसमे भारत की जनसंख्या को देखते हुए संतो की बडी डिमाण्ड है यदि 10 लाख के औसत पीछे एक संत हो जाय तो भी डिंमान्ड व सप्लाई का गैप बना रहेगा समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के कारण मेरा फ़र्ज बनता है कि इस सन्तस्फ़िति को कम करने का उपाय ढूढा जाय इधर कोई महान अवतार भी नही पैदा हुआ है जिसे उल्लेख्ननीय कहा जाय जो देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है
गत दशकों मे कई भगवान परमेश्वर परमात्मा इस धरती पर पैदा हुए जिससे पाप पुण्य का लेखा धनात्मक बना रहा इन सन्तो का भी नश्वर लेखा जोखा भी धनागम से धनात्मक मे बना रहा वैसे इसमे बुराई भी कुछ नही है लोक कल्याण की भावना से यदि बाबा जी ने कई आश्रम बना लिये तो क्या हुआ बाबा जी रहते तो सादगी से एक साधारण धोती ही तो पहनते है एक 50 रूपये की खन्डाऊ जो पाँच वर्ष आसानी से चलती है आश्रम तो समाज का है
इन महापुरूषो के होने से समाज का बडा फ़ायदा है आम जन , अज्ञानी लोग पागलो के पीछे ऐसे भाग रही है जैसे शहर मे प्लेग फ़ैला हुआ हो |बाबा जी जो बोल दिये सो पत्थर की लकीर| यदि बाबा जी ने पागलपन मे कुछ हरकत कर दी तो लोग कहेंगे कि कितना पहुँचा हुआ फ़कीर है| बाबा जी आउटसोर्सिंग के स्रोत होते है चलता फ़िरता फ़ि्क्स डिपाजिट होते है कितने लोगो के परोक्ष अपरोक्ष रोजगार सर्जक होते है देश की जी एन पी बढाने मे इनके योगदान को धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने कभी महत्वपूर्ण नही माना सो जब सरकारे सन्कट मे आती है तो ये भी निरपेक्षिक हो जाते है
महापुरूष समाज के पथ प्रदर्शक है यदि आज दन्गे फ़साद कम होते है तो इसका श्रेय सन्तो को ही है यदि यह बोले कि कोई भी धर्म हमे हिन्सा नही सिखाता तो लोग मान जाते है मौलवी लोग भी इसी प्रकार की तकरीरे देते है लेकिन ये आतन्कवादी पता नही किस एडिशन की धार्मिक किताब पढ्ते है यदि ये प्रकाशक व मुद्रक का पता भी दह्शतगर्दो को बता दे तो सभी प्रकार की मार काट तुरन्त बन्द हो जाय लेकिन मुझे शिकायत इन सन्तो से है कि ये धार्मिक पुस्तकों के मुद्रक का नाम नही बताते यदि मै सन्त हो गया तो यह जरूर बताउगा कि पुस्तक मिलने का पता कचौडी गली वाराणसी ही है
यदि मै सन्त हो गया तो महंगाई बढने की धार्मिक विवेचना शास्त्रोक्त विधि से कर सरकार की चिन्ता दूर करूँगा मै लोगो को बताऊँगा कि महँगाई इस लिये बढ रही है कि मेरे भक्तो के धार्मिक हो जाने के कारण अधर्मता नही बढ रही है इसलिये प्रभु अवतार लेने के लिये जमाखोरो को माया के वशीभूत करके उन्हे पापिष्ट बना रहे है ताकि अराजकता फ़ैले व लोग धर्मविमुख हो जाये लेकिन सच्चा गुरू होने के कारण इन सब बातो से घबराने की आवश्यकता नही है त्याग करने की बात हमारे धार्मिकता मे है ये महँगाई ससुरी क्या कर लेगी वैसे भी इसकी संज्ञा सुरसा से दी जाती है तो क्या हम राम भक्त हनुमान भक्त इस आसुरी शक्ति के आगे घुटने टेक देंगे लोग बोलेगे कदापि नही
शरद पवार भी कहेगे कदापि नही सभी धर्मभीरू लोगो का समर्थन सरकार को मिलेगा ।
वैसे सन्तो की सारी बात मानने मे कुछ कठिनाइयाँ भी है जैसे मैने सन्त बन कर औरो को यह उपदेश दे दिया कि ‘भक्तो सदा सत्य बोलो और प्रेम करो “ अब जरा आप जैसे विचारशील ब्लागर लोगो ने उसको अपना लिया तो मुसीबत होगी ना इस लिये थोडा स झूठ बोलना पडेगा विचार करे क्या सच सच बोल कर किसी से प्यार हो सकता है नही ना अरे प्रेम करने के लिये कुछ कुछ तो झूठ बोलना ही पडेगा आप हिम्मत वाले है तो जिस पत्नी से प्रेम करने का दावा करते है उससे से यह सच बोल कर दिखादे कि ब्यूटी पार्लर मे मेकअप करा कर तुम अपने सौन्दर्य व मेरे धन दोनो का कबाडा ख़ाड़ आई हो तो क्या इस सच पर आपकी पत्नी आपको अपना प्रेमी मानेगी
मित्रो मै तो इन ब्यूटी पार्लर की मालकिनो को भी देख कर यह बात नही कह सका कि हे शूपर्णाख़ाओ मै राम नही हू सो किस जन्म का बदला मेरी अर्धांश से इसे कुरूप बना कर ले रही हो वैसे मुझे इन ब्यूटी पार्लरो की स्वामिनियो की तलाश रहती है जो ब्यूटीफ़ुल हो लेकिन हा हत मुझे आज तक ऐसी कोई नही मिली वरना मै स्वंय ऐसे महिला को भाभीवत बना चुका होता
बहरहाल ये ट्रेंड सीक्रेट है जब लोग असमन्जस मे रहेंगें तभी तो मेरे आश्रम मे भीड़भाड़ होगी क्योकि जितने ग्लानि मे डूबे लोग रहेगे उतना ही मुझे उन्हे कोसने मे आनन्द आयेगा एक बार सन्त हो जाये तो रोब दाब से जीवन चलेगा मै एक तथाकथित सन्त मर्मज्ञ का प्रवचन सुन रहा था तो वे राम की कथा सुनाते हुए इन्ही लोगो ने ले लीना दुपट्टा मेरा गुनगुनाने लगे भक्त झूमने लगे एक बार लगा कि लाइन गड्बडा गई लेकिन सन्त तो सन्त थे तो उन्होने इन पन्क्तियो के भाव को इस तरह समझाया आत्मा व जीव को पन्च मकार लोभ मोह रूपी तत्वो ने भक्तिसूचक दुपट्टा को छीन रहे है लेकिन जिस भक्त को हनु्मान जी का आशीर्वाद मिला हो व इस सन्सार रूपी बाजार मे भक्ति रूपी दुपट्टा को अक्षुण्ण रख लेगा सो फ़िल्मी गानो की भी आत्मा ब्रह्म जीव सनकादिक जन्म मरण कर्म सुकर्म अकर्म आदि गूढार्थ तथ्यो से व्याख्यायित किया जा सकता है
सोमवार, 11 जनवरी 2010
कलेक्टर के सीने पर पत्थर और निर्देश का पालन
इस समानता का भाव आफ़िसो मे भी प्रतीकात्मक तरीके से दर्शाने हेतु अमुक नेता की पुण्य तिथि पर सभीआफ़िसो मे नीले पर्दे लगा कर सूचित करे यदि किसी विभाग मे बजट की समस्या हो तो वह वित्त विभाग को अपनीमांग बता कर बजट ले सकता है जिलाधिकारी प्रत्येक विभाग की जरूरतो के अनुसार आकस्मिक निधि ( दैवीआपदा फ़न्ड ) से धन आहरित कर सकते है
पर्दे सप्लाई करने के लिये राजधानी की कुछ फ़र्मो के नाम सुझाये गये थे जो एप्रूव्ड रेट पर सप्लाई कर सकते थेवैसे जिलाधिकारियो को यह भी सलाह दी गइ थी कि वे चाहे तो स्थानीय बाजार से भी इन्ही दर पर सप्लाई लेसकते है पेमेन्ट के पूर्व फ़र्मो को मुख्यालय से स्वीकृति लेनी होगी
जिलाधीश युवा थे उनका मन बार बार भडासी हो रहा था नीतिया पारदर्शी होनी चाहिये और जनता से पर्दा भी होनाचाहिये खाक हो मुए नेता जी कि पता नही क्यो इनकी म्रृत्यु तिथि पुण्य तिथि मे कैसे बदल जाती है जिन्दगी भरपाप किये और मरे तो पुण्य तिथि मे कन्वर्ट कर दिये यदि इनकी म्रृत्यु तिथि पुण्यपरक थी तो जन्म तिथि तो जरूरपाप तिथि मे गिनी जानी चाहिये
तभी फ़ैक्स की शू शू और उसके बाद हाई कमान की कड्कती आवाज ने जिलाधीश को इतना विक्षिप्त सा कर दियाकि उन्होने अर्दली को बुला कर कहा जाओ एक बडा सा पत्थर ले आओ
“हुजूर पत्थर” अर्दली ने फ़र्शी सलाम ठोंकते हुए पूछा
“क्यो सुनाई नही दिया क्या बेवकूफ़”?
जी हुजूर अभी लाया भागते हुए स्टेनो बाबू से कहा हाकिम बडा सा पत्थर माँग रहे है स्टेनो ने पहले तो दिमागलगाया फ़िर जब कुछ नही समझ मे आया तो कागज खोजने के बहाने पता लगाया कि साहब कौन सी फ़ाइल देखरहे थे मामला वही पर्दे की आपूर्ति का था | स्टेनो ने अपनी लियाकत का फ़ायदा उठाते हुए फ़ौरन सप्लायर को फ़ोनलगाया साहब से जल्द आकर मिल लो वर्ना देख़ते रह जाओगे मामला बिगड़ रहा है
सेठ मुकुन्दी लाल जिन्हे सप्लाई का ठेका मिला था वे ए डी एम वित्त को साथ लेते हुए बन्गले पर पहुँचने ही वालाथा कि कलेक्टर साहब कोर्ट चले गये वैसे कोर्ट मे बैठ्ना इन्हे रास नही आता था क्योकि यहाँ तो वही होता जोवकील चाहते थे
ए डी एम साहब ने जासूसी पूछ ताछ करनी शुरू कर दी यदि साहब को पत्थर चाहिये तो कितना बडा चाहियेंसरकारी चाहिये कि गैर सरकारी कितनी मात्रा मे चाहिये आदि आदि
प्रश्न मन मे गून्ज रहे थे जिलाधीशो को पत्थर देनेयोग्य कोई शासनपत्र तो जारी नही हुआ है यदि साहब ने पूछ हीलिया कि केवट राम आप बताओ शासनादेश क्या कहता है तो वे तो निरुत्तर हो जायेंगे आज तक डीएम साहिब नेकभी के राम कह कर नही पुकारा था पूरा नाम या तो उनके बाबू जी लेते थे या फ़िर डी एम साहब
कोई भी मसला होता था तो वे ही बुलाये जाते और डीएम साहब के द्वारा कोई व्यवस्था दी जाती तो वे तपाक सेबोलते “सर आप जो कह रहे है उसके लिये तो 1959 ,60 या (कोई भी वर्ष जो डीएम के जन्मवर्ष से पहले का होताउसी का ) से ही गवर्नर्मेन्ट के स्टैन्डिन्ग आर्डर है बात बन जाती डीएम साहब का आत्मविश्वास बढ जाता
लेकिन ये पत्थर का क्या चक्कर है ?
फ़िर उन्होने सिर खुजाते हुए अर्दली से पूछा कि जब साहब पत्थर मँगवाए थे तो उनकी मुखमुद्रा कैसी थी वे क्याकर रहे थे ?
अर्दली बोला “हुजूर उन्गलिया चट्का रहे थे उसे खुजा रहे थे “
अरे मिल गया क्लू ऐसी खुशी तो आर्कमीडीज को भी नही हुई थी यूरेका बुदबुदाते हुए वे सप्लायर से बोले ये सबक्या खा कर समझेंगे साहब लोगो की भाषा “ रत्नो को साहब लोग पत्थर बोलते है
आप फ़ौरन खुनखुन जी जौहरी को बुलवा लीजिये साहब को कोई कीमती रत्नजटित अंग़ूठी चाहिये गिफ़्ट करदीजीये
“अभी बुलवा लेते है “
डीएम साहब की गाडी आते ही के राम ए डी एम साहब से मिलने चले गये
“ सर आपने पत्थर मँगवाया था मैने कह दिया है अभी खुनखुन जी आता होगा हुजूर को कौन सा पथ्थर चाहियेहीरा या पन्ना वैसे आपसे पहले वाले साहब को हीरा बडा ही सूट किया लगातार फ़ील्ड मे ही पोस्टिंग रही है “
“अरे केवट राम मैने तो सर्कुलर के खिलाफ़ कहा था कि लाओ बडा सा पत्थर सीने पर रख लिया जाय फ़िर ये पर्देवाला आर्डर को ना कह दिया जाय कि ये आदेश फ़िज़ूलखर्ची है फ़िर जो होगा देखा जायेगा पत्थरयुक्त सीने से सहलिया जायेगा लेकिन इतना अपव्यय मै नही देख सकता
अरे साहब ऐसा कैसे सोच लिया ए डी एम साहब बोले “ सरकार हम लोग तो पर्दे टांगने दरी बिछाने का ढोल बजानेमुनादी करने की ही तो तनख्वाह लेते है सरकारी पर्दे बहरे होते है गोपनीयताओं का खुलासा कभी नही करेंगे दीवालेदोगली होती है पर्दे नही पर्दो के कान नही होते और सर नीला रंग तो गहराई का द्योतक है
सर एक बात मान ले जौहरी को बुला लिया है तो कोई कीमती पत्थर ले लीजिये पता नही सरकार के ग्रह दशा वदिशा बदल ले
“ठीक कह रहे हो ए डी एम साहब” डी एम् साहिब ने कुछ देर सोचा इतनी संवेदना भी ठीक नही
पैसा सरकारी ,
आदेश सरकारी
तब क्या हमारी तुम्हारी ,
हम तो रहेगे अधिकारी
“सर पर्दो के आर्डर का क्या होगा “ मिमियाते हुए ए डी एम ने कहा
आज ही आदेश कर दिया जाये एक समीक्षा बैठक रविवार को बुला कर सभी को टाईट करे साहब ने मुस्कुराते हुएआदेश किया
बैठके हुई पर्दे आये दरवाजे फ़ीटो मे मापे गये सप्लाई मीटरों मे हुई वैसे भी यही होना
था सरकारी पर्दे इतनी लम्बाई चौड़ाई मे लगे कि जैसे आफ़िसो मे आम आदमी को नही हाथियों को गुजरना हो हाथी गुजरने भी लगे चहु दिशा नीलवर्ण नीलमणि की तरह कान्तिमान हो गई मुख्यसचिव से लोग कहते “व्हाट एन आइडिया सर जी “
खैर हाथी चलता जाये कुत्ते भूकते रहे ये तो पुरानी राजधर्म नीति भी कहती है कलेक्टरसाहब को पत्थर बडा सूट किया अब तो वह कोई बडा आर्डर देने के पहले पत्थरो की ही मांग करते है उन्हे नुस्खा जो मिल गया है
रविवार, 10 जनवरी 2010
उन्नतशील अधिकारी बनाने का आसान नुस्खा
आज बीस साल के बाद ये राज खोल रहा हू ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ यह ना कह सके कि उनके पूर्वजो ने कोई अधिकारी शरीर संहिता नही बनाइ वैसे तो बाजार मे बडी आचार संहिताये मिल जाएगी लेकिन अधिकारी को सिस्ट्म मे कैसे अपने उच्च अधिकारी को प्रसन्नचित्त रखते हुए सफ़लता की सीढिया चढनी चाहिये ? यह ना तो किसी ट्रेनिंग मे सिखाया जाता है और ना ही गुणी ज़न ही इसे बताते है मैने यह गुप्त ज्ञान बडे यत्न से गुह्यातिगुह्य कर रखा था जिसका खुलासा परोपकरार्थ प्रकाशित कर रहा हूं वैसे हमारे देश की परम्परा मे जब तक योग़्य शिष्य ना मिले तब तक ज्ञान बाँटने की मनाही रही है लेकिन पता नही कोई गुरूघन्टाल शिष्य मिले ना मिले सो आज ब्लाग के माध्यम से एक राज की बात का खुलासा कर रहा हू वैसे इसी ब्लाग के माध्यम से सफ़ल अधिकारी होने के शार्ट कट सुझाव आपको देने का प्रयास किया जायेगा
एक सफ़ल अधिकारी बनने के लिये उसका पूंछदार होना जरूरी है मूंछ ना हो कोई बात नही लेकिन पूंछ बिना अधिकारी ऐसा लगता है जैसे कच्ची उम्र की विधवा जिसे सभी सहानुभूति की नजर से देखते है लेकिन मदद करना कोई नही चाहता शोषण करने के लिए सभी बैठे रहते है ऐसी ही हालत एक नये रंगरूट पूंछ बिहीन अधिकारी की होती है शुरू शुरू मे बडी उल्झन होती है पूंछ विहीन हो कर अधिकारियो के सामने जाने मे क्योंकि उच्च अधिकारी शन्का की नजरो से देखते थे एक दिन मैने अपने वरिष्ठ सहकर्मी से बास के नाराजगी का कारण की जानकारी पूछी तो उन्होने बेफ़िक्री से कहा दुम उगा लो सब समस्या हल हो जाएगी चुटकियों मे
मैने कहा व्हाट एन आईडिया सर जी लेकिन पहले अपनी पूंछ तो दिखाइये उन्होने जो अपनी पूंछ दिखाई तो राज समझ मे आ गया बास के सामने जब यह गुच्छकेशीं पूंछ हर बात पर दाएँ बायें हिलती होगी तो कौनसा अधिकारी इन्हे लायक नही समझेगा
मै पूछ उगाने का तरीका पूछने ही वाला था कि उन्होने मेरी रीढ़ की हड्डी दबा कर देखी और बोला बडी कडी हड्डी है उगाने मे समय लगेगा तब तक तो काफ़ी नुक्सान उठा लोगे |मैने ग़िडगिडाते हुए कहा प्रभु शीघ्र कोई उपाय करे मै घाटा नही उठाना चाहता उन्होने कहा रीढ़ की हड्डी पर ब्रेक आयल लगा लगा कर शाकप्रूफ़ करो इसे कभी भी अधिकारियों के सामने सीधी मत होने दो फ़िर जब हड्डी लोचदार हो जाये तो इसके निम्न भाग पर
चाकरी व चापलूसी छाप एडहेसिव लगाते हुए यस सर ,जी सर, अछ्छा सर मन्त्रो का जाप करो जब मन्त्र सिध्दि हो जायेगी तो पूछ उगेगी और झब्बेदार होगी जिस पर हर बास खुश हो जाएगा आउट आफ़ टर्न प्रोमोशन भी मिल सकता है गुड इन्ट्री की बाढ सी आ जायेगी मैने बडा प्रयास किया लेकिन यह मुइ रीढ की हड्डी हर बार दगा दे जाती है यस सर जी सर का मन्त्र तो जपता हू लेकिन एन मौके पर जब जब पूछ थोडी सी उगने को नोक्दार सी दिखने लगती है तब तब रीढ की हड्डी कडी जाती है तथा पूछ का अल्ट्रासाउंड होने से पहले ही भ्रूणपात हो जाता है कई अफ़्सरो ने मुझे चेतावनी देते हुए दो महीने या तीन महीने मे पूछ उगा कर दिखाने की मोहलत दी पर मै उसका फ़ायदा नही उठा पाया मेरे ही सह्कर्मी दुम लगा कर उगा कर मेरे ही बास बन गये और मै एक अदद प्लास्टिक की पूछ भी नही चिपका सका कारण वही आखिर नकली हो या असली आखिर दुम टिकाएँगे कहाँ मेरुदण्ड पर ही ना वही तो लोचा है इस लोचहीन मेरूदण्डीय काया के चलते मैने बडा नुक्सान उठाया
अचानक आज मेरे गुरूदेव मिल गये जिन्होने पूंछ का रहस्योद्घाटन किया था बडे ओहदे पर प्रदेश के सचिवालय मे इन दिनो है मेरे निराशाजनक खबर की मै पूंछ विहीन हो कर नौकरी कर रहा हूं वे बडे चिन्तनमग्न हो कर बोले अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता मैने कहा कोई नयी तक्नीक लगा कर भी यदि दुम उगा लिया जाय तो शायद अफ़्सर का जीवन सफ़ल हो जाये मेरी दशा तो पेड से गिरे कपि की हो गयी है जो समूह से अलग थलग दिखता है यहा तक कि मेरी बीबी और बच्चे भी हिकारत से देख कर कोसते है इतने दिनो से नौकरी कर रहे है एक दुम तो उगा नही सके पता नही जिन्दगी मे क्या करेगे मेरी दशा बान्झ धरती की हो गयी है कोई तो जिप्सम होगा जिससे इस बान्झ भरी अफ़्सरी मे हरितिमा दिखाई दे शन्टिग के डिब्बे की तरह पोस्टिंग मिल रही है प्रोमोशन के लाले पडे हुए है अभी तक ना तो बन्गला बना सका और ना तो गाडी ही ले सका गुरूवर खाली ज़ी पी एफ़ ,पी पी एफ़ को देख कर कितना हौसला रखा जाय|
मेरे इस लम्बे चौड़े प्रश्न का सन्क्षिप्त उत्तर था”अब कुछ नही हो सकता’ क्यो कुछ नही हो सकता ? गुरूजी
अब तुम मैनोपाज मे जा चुके हो
क्या कहा गुरू जी मैनोपाज तो महिलाओ को होता है
ठीक कहे वत्स लेकिन अफ़सरो को जिनकी मेरू लोचहीनता के कारण झुकती नही उनके मैनहुड के कारण दुम ना तो उगती है ना नकली चिपकती है इसी मैनड्म के कारण ही मैनोपाज हो जाता है अब हमे देख लो इतनी उम्र हो गई आफ़िस मे महिला बास है यस मैम ,मैम कहते जबान नही थकती घर पर भी इन्ही अच्छे संस्कारो के कारण पत्नीवल्लभा बना हुआ हू यदि मैनहुड को मेरू से लगा कर चलता तो किसी मैनहोल मे फ़ेक दिया गया होता जानते नही सरकार भी महिलाए ही चला रही है सीखना है तो सतीश से सीखो ये लोग कभी भी दुमविहीन नही हो सकते और ना कभी इन्हे मैनोपाज का ही खतरा है
तो मित्रो मेरी नेक सलाह है कि यदि सिस्ट्म मे काम कर तरक्की पानी हो तो मेरूदण्डीय तन्त्र का आप्रेशन करा कर उसके सिरे पर एक अच्छी सी गुच्छकेशीं पूछ लगा लीजिएगा या उगा लीजिएगा जो आपके सर कहते ही आपके सिर के साथ ही हिल सके दुम ऐसी होनी चाहिये जो मौके की नजाकत को देख कर अनेक कार्य कर सके
नीचे के अफ़्सरो पर इसी दुम को प्रहारित कर उन्हे दन्डित भी किया जा सके ऐसी विविधकार्य साधक दुम यदि आपने उगा ली या नौकरी के शुरूआती दिनो मे लगा ली तो इन्शाअल्लाह आपको आगे बढने से कोई फ़रिश्ता भी नही रोक सकेगा
रविवार, 27 दिसंबर 2009
त्यागपत्र के अवसर पर अध्यक्षीय भाषण
“आज समाचारपत्रों के माध्यम से पता चला कि आन्ध्र प्रदेश के महामहिम राज्यपाल महोदय ने स्वास्थ्य कारणों से अपने पद से त्यागपत्र दे दिया बडे दुःखित मन से ये पोस्ट लिख रहा हूं जो राज्य अपने राज्यपाल को स्वास्थ्यकर दवायें ना उपलब्ध करा सके उस राज्य सरकार को भंग कर देना चाहिये
वैसे नारायणदत्त ज़ी वस्तुतः नारायणमूर्ति थे मोहिनी माया की जिसे योग माया भी कहा जाता है उसे पहचानने के बाद मान्यवर ने उस विषयगामी मायाविनी को समाप्त करने का मन बना ही लिया था लेकिन सत्यानाश हो स्टिन्ग आपरेशन चलाने वालो की जिसने इस पुण्यार्थ कार्य को इतना घिनौना प्रचार कर दिया
हमे कान्ग्रेस के प्रवक्ता के आज के वक्तव्य को नही भूलना चाहिये जिन्होने इस अवसर को राजनीतिक परंपरा का उच्च आदर्श बताया है कल जो घटनाचक्र घटा वह भी राजनीति का उच्च आदर्श था यह अवश्य है कि इस पर किसी पार्टी ने मुँह नही खोला
हमारे यहाँ आदि काल से राज प्रसादो मे कोई हवन व आध्यात्मविद्या का कार्यक्रम नही चलता रहा था इतिहास गवाह है कि राजभवनो मे रनिवास और भोगविलास की समानान्तर गौरवशाली परंपरा रही है मुझे इसमे तनिक भी सन्देह नही है कि यदि स्वास्थ्य ठीक ठाक रहता तो महोदय राजकाज के और उच्च प्रतिमान स्थापित करने मे सफ़ल होते
वैसे विषकन्याओ ने कइ राज्यो का विनाशन किया था इसी का शिकार आप भी हुए है विषकन्याओ के विष की काट के लिये आन्ध्र प्रदेश सरकार ने कोई उपाय नही किया था यह बडी खतरनाक बात है वास्तव मे यह सरकार अक्षम व कमजोर है नारायणी कोप व शाप तुम्हे खा जायेगा रोस्सैया !!!
भारतीय राजनीतिज्ञों की परंपराओं के वाहक नर शार्दूल पन्डित जी आपने सभी बुजुर्गो को सर उठा कर जीनेवाला बना दिया है केशरी व मकरध्वज खाने-पीने के शौकीनों को आपने हरा भरा कर डाला है बुजुर्गो मे एक नया कान्फ़िडेन्स जगा है लोग बाग इन जाडो के दिन मे भी उत्तराँचल की पहाड़ियॉ मे जा कर जडी बूटी सन्जीवनी की तलाश मे जाने की कामना कर रहे है कुछ लोग तो तत्काल आरक्षण भी करा लिये है इससे उत्तरान्चल मे पर्यटन को भी बढावा मिलेगा आम लोगो के चेहरे खिल रहे है
त्यागपत्र जेब मे लेकर राजभवनों मे घुटन व अस्वस्थकर माहौल मे बने रहना भी प्रजातन्त्र का गौरवशाली क्षण है आपका त्यागपत्र सभी नेताओं के लिये आदर्श व अनुकरणीय है विश्वसनीय साथियों की आवश्यकता , छोटी छोटी भूलो के प्रति गहरी सावधानी असत्य कथन पर अन्त तक टिके रहना फ़िर अपने स्वास्थ्य को पद से ऊपर मान कर अन्ततः पदत्याग व सन्यास का आत्मबल एक राजनेता के अनिवार्य गुण है आप इसके मूर्तिमान उदाहरणस्वरूप है आप दीर्घायु हो शतायु हो तथा स्वास्थ्यलाभ करके समाजसेवा तथा समाजोद्धार का कार्य पूर्व की ही भान्ति करते रहे यही भगवान से प्रार्थना है “
रविवार, 20 दिसंबर 2009
एक चिठ्ठी मैंने भी लिखी है यूं पी कों बाटने के लिए पी एम् कों
1 राज्य समाप्त हो कर जब जिलो की इकाइयो मे प्रशासित होगा तो प्रान्तीय अस्मिता व व्यक्तित्व की लडाई स्वतः समाप्त हो जायेगी जब मराठी पन्जाबी बिहारी हैदराबादी मद्रासी का बिल्ला ही खत्म हो जायेगा तो रोज रोज के झगडे ट्न्टे स्वतः समाप्त ही हो जाने है
2- वैसे भी राज्य या राजधानी के नाम होने से किसी गाँववासी तह्सीलवासी या जिले के व्यक्ति के व्यक्तित्व भाषा संसकार विकास से कोई सीधा सादा संबन्ध कभी भी नही रहा है राज्यो के बनने से छात्रो का सामान्य ज्ञान जरूर प्रभावित हुआ है पिछड़ो व दलितों को कई बार ऐसे प्रश्नो मे उलझा कर कि फ़ला राज्य कब बना किसने अनशन किया कौन पहला सी एम या गवर्नर रहा राज्य बनने के बाद कौन सी सन्ख्या बडी है राज्य की वर्षगाँठ की सन्ख्या या मुख्य मन्त्रियो या आम चुनाव की अब भला बताईये गणित के प्रश्न इन्टरव्यू मे पूछने पर बच्चे क्या उस राज्य के प्रश्न से बर्बाद होने पर ये असफ़ल छात्र इस देश या उस राज्य के हितैषी कभी हो सकेगे ? यह यक्ष प्रश्न है जिसका हल सिर्फ़ मेरे पास है इन राज्यों को ही समाप्त कर देना
3 राज्यों को समाप्त कर जिलो को सीधे राज्येतर शक्ति देने से कई लाभ होंगे जो निम्न है
क – प्रान्तीय पार्टियाँ अपने औकात मे आ जायेन्गी जब इनकी जिला स्तर की इकाइया हो जायेन्गी तब राज्य के कद्दावर व सुप्रीमो नेता लोग जिले मे जा कर म्याउ म्यौउ करेगे
ख- राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा जब राज्य ही नही रहेगा तो राज्यस्तर का कैसा भ्रष्टाचार ? देश के भ्रष्टाचार का सेन्सेक्स भी गिरेगा क्योकि केवल सान्सदो के भ्रष्टाचार पर ही सबकी निगाहे लगी रहेगी
ग- जिलो के भ्रष्टाचारी क्या खा कर राज्य के या देश के नेताओ की भ्रष्टता का मुकाबला करेंगे
घ—जिलो मे इमानदारी के पौधे उगेगे अब जब ट्रान्सफ़र पोस्टिंग का खेल ही नही होगा तो चन्दौली क्या खा कर गजियाबाद का मुकाबला भ्रष्टाचार मे करेगा हा वन विभाग के मामले मे तो चन्दौली ही टाप रहेगा खैर जब लखनऊ की डिमान्ड नही होगी तो बाल बच्चो की मिठाई के लिये कोई अधिकारी वह भी जिले की नई व्यवस्था मे टाप पर बैठ कर इत्ती सी बेइमानी क्यो करने लगा अब तक तो ये सब सचिवों मन्त्रियो निदेशकों के लिए ये पाप करते थे अब किनके लिये ये सब करेंगे
ग—इससे सभी अधिकारी सन्त की कोटि मे आ जायेंगे क्योकि सभी वाल्मिकी की श्रेणी मे हो जायेंगे
घ -- जिलो को राज्य का दर्जा दिये जाने पर केन्द्र को कोई खास वित्तीय बोझ नही पडेगा जो जैसा है जहॉ है की तर्ज पर घोषणा कर दी जाय सन्साधनो का वही उपयोग हो जो उपलब्ध हो मानव श्रम का विभाजन नही होगा ऐसी दशा मे विभागो के ईमानदार निदेशको सचिवो प्रमुखो को सरप्लस अधिकारी कर्मचारी घोषित होगे लेकिन वे आसानी से अपने विशेषज्ञताओं वाले विभागो के खोमचे लखनऊ मे लगा कर जीविका चला सकते है जैसे दुग्ध सचिव डेयरी की दूकान फ़िशरी वाले सचिव तसले मे मत्स्य अन्गुलिका उद्यान सचिव मलिहाबादी आम का व्यापार कर सकते है भाषा सचिव प्रिन्टरों पर प्रूफ़ रीडिग का काम कर सकते है इसके अलावा अधिकाश सचिव प्रमुख सचिव किचेन गार्डेन मे सब्जिया उगा सकते है जो ये प्राय: गोष्ठियो मे बताया करते है इससे राजधानी लखनऊ जो तब मात्र लखनऊ राज्य कहा जायेगा उसकी आय बढाने मे सहायक होगे तथा वैराग्य व धर्म की स्थापना मे भी ये सभी वाल्मिकि तुल्य अधिकारी मन्त्री सचिव यू डी ए आदि सन्त हो जायेन्गे इसमे से कुछ लोग अपने प्लाटो पर आश्रम भी खोल सकते है
लखनऊ की धौन्स पहले से कम नही होगी क्योन्कि सचिवालव विधानसभा आदि को सहारा आदि कम्पनियो को लीज पर दे कर उससे अच्छी आय बनाई जा सकती है जो इस जिले के विकास मे सहायक होगी
च --जिले का गवर्नर जिला कलेक्टर होगा वैसे भी आज कल कलेक्टर कलेक्ट कम रिफ़्लेक्ट ज्यादा कर रहे है गवर्नरी भी इसी तरह हो जायेगी फ़र्क केवल केन्द्र का होगा वैसे भी यू पी के आई ए एस इतने गरीब हो गये है कि बेचारो को अपनी आय घोषित करने मे भी शर्म आ रही है आखिर अन्गोछा व कछ्छा तो नही दिखा सकते जो तह्सीलो से उन्हे गिफ़्ट मिले थे इसी पशोपेश मे ये दिन काट रहे है गवर्नरों की तरह काम करने मे कम से कम बच्चो की फ़्यूचर तो बन जायेगी इसी बहाने गाव गाव घूमना तो नही पडेगा लाट साह्ब बन कर नौकरी होगी जिलाधिकारी के रूप मे पार्टी के जिलाअध्य्क्षो की जी हजूरी करने की आदत तो छूट जायेगी
छ –इसमे कोई अधिक खर्च नही आने वाला केन्द्रीय विभागों का काम पूर्ववत उनके कार्यलयाध्यक्ष देखते रहेंगें कलेक्रेट सचिवालय बन जायेगा क्लर्को का नाम बदल कर सचिवालय सहायक हो जायेगा कमिश्नर का पद सरप्लस हो जायेगा गवर्नर के रूप मे कलेक्टर चाहेगा तो ऐसे लोगो को मानद पदो पर मानदेय पर नियुक्त कर सकेगा
ज-राजधानी से फ़ोन आदि न आने के कारण खर्चा बचेगा साथ ही दबाब ना पड्ने से जनता का काम भी हो सकेगा प्रशासन दुःशासन की भाँति अब काम नही कर सकेगा लखनऊ आने जाने के टी ए डी ए के ख़र्चे भी बचेगे
झ –केन्द्रीय बजट सीधे जिलो तक आने के कारण अब बीच का लास 15% रहेगा इससे 85 पैसे जनता के विकास मे खर्च होने लगेगे इससे विकास की गंगा नाली के रूप मे अपने प्रदूषित हो कर बहने लगेगी जिससे विकास का हैजा गावो मे ना फ़ैल जाये इस के लिये खन्ड विकास अधिकारी होगे जिन्हे नयी व्यवस्थाओं मे पाख्नड विकास अधिकारीवर्ग कहा जायेगा इनका काम कुछ दिनो तक विकास की बाढ से जनता को उसी प्रकारों से बचाना है जैसे कि आज कल ये करते आ रहे है म्रृत्यु उपरान्त मुर्दो के पेन्शन भी जारी करने का वितरण करने का सम्वेदनशील काम भी ये करते रहेगे
आखिरी समस्या बिजली की होगी चूँकि प्रत्येक जिलो मे पावर प्लांट नही है इसका हल भी कलुआ के फ़ार्मूले से हल हो जायेगा कलुआ कहता है कि अन्ग्रेजो व रायबहादुरो के पेशाब से दिये जलने की कहानियां उसने अपने दादा जी से सुनी है इसी तर्ज पर इन नये गवर्नरों के बाथरूमो से निकलने वाले मूत्राशयों को पावरप्वाइंट बना कर पचास तथा अन्य अधिकारियो के द्वारा इसी प्रकार पचास मेगावाट के पावर प्लान्ट लगाये जायेंगे यदि कोई कमी पडेगी तो ये भूतपूर्व मन्त्री मुख्यमंत्रियों की सेवाये जिले ले सकेगे इनका समय समय पर मूत्रदान के द्वारा बिजली पैदा कर के वैसे भी इन्होने समाज व अपने राज्य को मल मूत्र के सिवा कुछ तो नही दिया है इस लिए यह सेवा तो ये आसानी से कम से कम अपने जिलो के विकास के लिये बिजली के लिये तो दे सकते है धरती पुत्र ,जाट पुत्र हो चाहे दलित पुत्र इतनी सेवा तो करनी होगी नही तो इनकी पेन्शन बन्द कर दी जायेगी |
मैने एक पत्र प्रधानमन्त्री को लिख दिया है इस योजना के बारे मे पत्र पर सही पता व टिकट भी लगा दिया है अब गेन्द केन्द्र के पाले मे है क्यो मै चिट्ठी नही लिख सकता ???
मेरे एक अभिन्न मित्र ने इस योजना का विरोध किया और कहा कि आपके सोचते रहने से कुछ नही होनेवाला मैने उत्तर दिया कि यदि जनता के सोचने से कुछ नही होने वाला तो जनता के इस दिशा मे ना सोचने से कौन सा अभिनव होने वाला इस पालिटिक्स से तो क्या सोचना छोड दिया जाये अब फ़ैसला आप पर है मै सही हू या मित्र
रविवार, 13 दिसंबर 2009
अनशन की राजनीति में भेद क्यों ????

क्या अनशनो पर राजनीति करना ठीक है अभी 11 दिनो के अनशन पर भारत सरकार आन्ध्र सरकार तथा सम्पूर्ण विप्क्ष इस अनशन को समाप्त करने तथा एक अलग राज्य बनाने पर एकमत दिखाई दिये आड्वाणी जी की ्सदन मे चिन्तातुर मुख मुद्रा को देख कर मै खुद बडी चिन्ता मे पड गया इस उम्र मे इतनी चिन्ता ठीक नही है लेकिन एक अनशन जो गत गत दस वर्षो से एक महिला एक कानून के खिलाफ़ कर रही है उसके लिये कोई चिन्ता नही है और ना ही उस कानून मे आवश्यक सन्शोधन का ही आश्वासन ही सरकार कर रही है क्या व्यक्ति पर एक कानून इतना अधिक मह्त्वपूर्ण हो गया है कि सरकार इसे बद्लना नही चाह्ती
विगत दिनो मानवाधिकार दिवस , नोबल पुरस्कार तथा तेलन्गाना के लिये अनशन ये तीन घट्नाये हुई है लेकिन मणिपुर के इस अन्हिसक सत्याग्रह को कही भी ना तो मान्यता हि मिल रही है और ना ही विपक्ष चिन्तित दिख रहा है क्या इस लिये कि मणिपुर छोटा राज्य है तथा उसकी खबरो पर ज्यादा ध्यान दिया जाना लोग उचित नही समझते बात तभी समझ मे आती है जब आन््दोलन हिन्सक हो जाता है
. सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम 1958 (एएफएसपीए) भारतीय सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार अनुदान के लिए गिरफ्तारी, हिरासत में, पूछताछ या दण्ड से मुक्ति से मात्र संदेह पर किसी भी व्यक्ति को मार डालते हैं. मणिपुर (जहां ki शर्मिला निवासी है) और उसके उत्तर के पड़ोसी राज्यों पूर्वी भारत इस अधिनियम के अधीन लगभग आधी सदी के लिए गुजर रहा है. 2 नवम्बर 2000 के दिन मणिपुर मे मोलाम के निकट आतंकवादियों ने सशस्त्र बलो पर बम फ़ेका जिसकी जबाबी कार्यवाही मे सशस्त्र बलो ने दस नागरिकों की गोली मार कर हत्या कर दी
ऐसा नही है कि यह कोई नयी घटना थी मणिपुरियों के लिये अतीत मे ऐसी कई घट्नाये हो चुकी थी शर्मिला इस घटना के विरुद्ध एक प्रदर्शन मे शामिल होने गयी थी लेकिन इस घट्ना ने इस कवियत्री के मानस पर ऐसा असर छोड़ा कि वह वहकओ नवम्बर 2000 को इस दमनकारी कानून को समाप्त करने के लिये अनशन पर बैठ गयी तब से उसे आत्महत्या करने के प्रयास मे गिरफ़्तार कर लिया गया तथा जेल मे डाल दिया गया जहाँ उसने जमानत लेने से भी इन्कार कर दिया तब से एक अन्तहीन सन्घर्ष शुरू हो गया अब उसके अनशन को तोडने के लिये उसे जबरदस्ती नाक के रास्ते से भोजन दिया जाता है अदालत रिहा करती है वह फ़िर अनशन पर बैठती है तथा फ़िर उसे गिरफ़्तार कर लिया जाता है उसके नाक के रास्ते एक पाइप लगा दिया गया है अस्पताल व जेल तथा यन्त्रणादायक इस प्रक्रिया लगातार 10वे वर्ष मे प्रवेश कर चुका है 30 वर्ष की आयु से जारी अनशन ने शर्मिला के शरीर को कमजोर कर दिया है उसका चेहरा देखने पर सलीब से लट्के ईसा मसीह की तस्वीर की याद आती है
उसका शरीर भले ही कमजोर हो गया है लेकिन उसके इरादे फ़ौलाद की तरह मजबू्त है इस सन्घर्ष मे उसकी मां ने भी अपना योग्दान दिया है यद्यपि वह पढी लिखी नही है लेकिन दमन के कानून के प्रतिकार को बखूबी समझती है उसने इन दस वर्षो मे वह इस भय से कि कही उसके आन्सू शर्मिला के सन्कल्प को कमजोर न कर दे इस लिये उसने यह फ़ैसला किया है कि जब तक उसका उद्देश्य पूरा नही हो जाता तब तक वह उसके सामने नही आयेगी गजब की सन्कल्प शक्ति माँ व बेटी दोनो की है इस जज्बे को शत शत नमन जो लोकहित के सन्घर्ष मे अपनी खुशियो की आहुति दे रही है
इरोम चारू शर्मिला इस लडाई को आध्यात्मिक मानती है उनके अनुसार मेरा aअनशन मणिपुर के लोगों की ओर से है. This is not a personal battle – this is symbolic. यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है - यह प्रतीकात्मक है.”, यह सत्य, प्रेम और शांति का प्रतीक 'है, .
इस कानून के खिलाफ व्यापक विरोध के बाद केंद्र ने विशेषज्ञ के पूर्व न्यायाधीश जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में 2004 में इस कानून की समीक्षा समिति गठित. किया था पैनल ने 2005 मे केंद्र को उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की.commission had recommended the law should be repealed (" The Armed Forces (Special Powers) Act, 1958, should be repealed ," it notes in its recommendations. " The Act is too sketchy, too bald and quite inadequate in several particulars "..)
इस अहिन्सक आन्दोलन के बारे मे इस लिन्क पर http://manipurfreedom.org और जानकारी पाई जा सकती है
बुधवार, 9 दिसंबर 2009
मैं भी संत हो गया हू तलाश भक्तो की है
मेरे पडोसी जो भारत सरकार के एक ऐसे कमाऊ विभाग के पदधिकारी है जिससे सभी भय खाते है ये सब कुछ खाते है खातो को देख देख कर खाते है आप विभाग का नाम जान चुके होगे इनकी एक अदद पत्नी इन्हे इतना प्यार करती है कि यदि इनकी म्रृत्यु कमरे मे हो जाये तो भी ये लाश निकलने न दे नही प्रेमासक़्त हो कर नही लाभासक्त हो कर
आप गलत समझ रहे है जब तक लाश से दुर्गन्ध न उठ्ने लगे तब तक ये साहब के नाम पर बाबुओ को बुला बुला कर घूस व मधुर मोदक आदि खाती रहेगी देखने मे ये भारत के वित्त मन्त्रालय की वार्षिक समीक्षा पुस्तक की भान्ति है मेरा इनके घर आना जाना है एक दिन भाई साहिब ने अपने हनीमून के शैशव काल की तस्वीर दिखाई जो इन्होने सपत्नीक बीजापूर के गोल गुम्बद के समीप खिंचाई थी उन दिनो भाभी जी का व्यक़्तित्व इस कदर पाषाणवत था कि यह पता लगाना कठिन होता था कि भाभी जी कहाँ है व गोल गुम्बद कहाँ ? खैर मै उनकी कमनीयता की कम कमीनता का ज्यादा प्रशंसक हूँ मै अक्सर उनके इस तस्वीर को देख कर कहता हू कि आप ने कम उम्र मे विवाह का प्रस्ताव कैसे मान लिया
इनका हर काम विभागीय बजट से नही तो गैरविभागीय श्रोतो से हो जाता है जब भाभी जी को पुत्र पैदा हुआ पता नही उसका श्रोत क्या था क्यों कि भाई साहब के बारे मे लोकोक्ति आम है कि इन्होने बिना धन लिये अपनी कलम नही चलाई तो अपना पुत्र पैदा करने मे भाभी जी ने क्या प्रलोभन दिया होगा जब प्रसूति कक्ष मे भाभी जी भर्ती थी तो साहब परेशान थे कि काश प्रसव पीडा मुझे होती तो कम से कम विभाग वाले इस मौके पर मुझे घेरे रहते तथा प्रसव का खर्चा भी धनपशुओ से निकाला जाता खैर एक गज सदृश पुत्र की प्राप्ति हुइ ,लोगो ने साहब को बधाइया देनी शुरू कर दी वैसे बधाई तो मैने भी दी लेकिन यह रत्न का चक्कर समझ मे नही आया ,पता नही यह पुत्र भविष्य मे कौडी लायक भी ना हो सके लेकिन लोग है की अभी से रत्न रत्न चिल्ला रहे है क्योकि इतिहास गवाह है कि बडे बडे सम्राट साम्राज्यों का पतन अयोग्य उत्तराधिकारियो के चलते ही तो हुआ है लेकिन जन्म के समय तो ये उत्तराधिकारी लख्तेजिगर रत्न ही कहलाते होगे खैर साहब की किस्मत भी मुझे लगता है कि बहादुर शाह जफ़र से अधिक नही होने वाली
लोगो का क्या है कुछ भी कह डालते है राज की बात है कि भाभी जी भी साहब की धर्मपत्नी कहलाती है यदि यह धर्मभीरू नही होते तो ऐसा हरगिज नही कहते भाभी जी अक्सर साहब की दैहिक समीक्षा भी करती है उन्हे गालिया वग़ैरह भी सुनाती रहती है लेकिन करवाचौथ का व्रत बडी श्रध्दा से करती है ये पति को बहले ही पीटती हो लेकिन पराये मर्द से आँखे मिला कर बात नही करती आखिर किस एन्गिल से इन्हे पतिव्रता ना कहा जाये पति के लिये व्रत तो करती ही है
इनके घर से अक्सर सत्यनारायण की कथा मे शामिल होने का निमन्त्रण मिलता है तो मै ऐसे अवसर पर सौ काम छोड कर जाता हू ऐसा नही कि मै बहुत धार्मिक हू इसका खुलासा मै आज करता चलू दरअसल बात यू है कि ऐसे मौके पर गाई जाने वाली आरती की एक लाइन श्रध्दा भक्ति बढाओ सन्तन की सेवा से मेरा उत्साह बढ्ता है कि जिस दिन ये सन्त की सेवा करने निकलेगे उस दिन मुझ जैसा सरयूपाणी सन्त कहा पायेगे वैसे इसी कारण मैने कई उपनिषद आदि मगा कर शेल्फ़ मे सजा रखा है ताकि कभी तो इसका ख्याल करके ये मुझ जैसे सन्त की सेवा का व्रत ले ले मै अक्सर इन्हे बताता रहता हू कि इन कथावाचको को केवल दक्षिणा देनी चाहिये दान तो सर्वदा उच्च कुल के सन्सकारी वेदो को जानने वालो को ही देना चाहिये ऐरे गैरे उदरपोषक पन्डितो को नही ये सन्त सेवा नही अब देखे, कब इनकी नजर मुझ पर इस द्रिष्टिकोण से पडती है
वैसे मै इस लेख के माध्यम से बताता चलू वैसे मै आत्मप्रचार नही करता लेकिन मुझमे अनेक गुण सन्तो वाले है परद्र्व्येषु लोष्ठ्वत को मै अधिक महत्व देता हू जिससे उधार लेता हू उसे कभी लौटाने का पाप नही करता क्योन्कि सन्तो का काम ही है मानव मन से आसुरी प्रव्रितियो क नाश करना मैने जिन लोगो से भी उधार लिए है उनके मन से धन की आसक्ति को समापनीय ही कर दिया है जिन लोगो से भी मैने उधार खाये है उन्हे लौटाने का कभी भि गन्दा विचार मेरे मन मे कभी भी नही आया
सच्चे सन्त का यही तो काम होता है कि भक्तो के मन से काम क्रोध लोभ मोह की भावनायें समाप्त करना मेरे एजेन्डे मे प्राथमिकता सदैव लोभ मोह को समाप्त करने की रही है पैसे ना लौटाने से खिन्न मित्र क्रोधित तो होते है लेकिन इनका क्रोध कुछ दिनो के बाद स्वंय एक्स्पायरी डेट के बाद खत्म हो जाता है इस प्रकार लोभ मोह को समाप्त करने के मेरे प्रयास से मैने मित्रो का जिनसे मैने कर्ज लिया था उनका मन निर्मल कर दो बुराइयो को समाप्त कर दिया है अभी इन मित्रो के मन से काम को समाप्त करने का भी प्रयास कर रहा हू यह कार्य गुह्यातिगुह्य है सो इसका खुलासा बाद मे करूगा जब कुछ शिष्याये समर्पित नही हो जाती
कथा विषयान्तर हो गयी है मै सन्त बना पडोसी के पास बना हुआ हू देखे वह सपत्नीक कब सेवा भाव से जुटता है वैसे मैने उसे प्रोमोशन मे विलम्ब उचचतर जाच आदि का भय मुखाक्रिति के आधार पर बता दी है
वैसे मै एक बात का कायल हो चुक हू कि हिन्दूधर्म के बडे आयोजन बडे बेइमानों घूसखोरो पर ही टिके हुए है जिस दिन से इनकी आस्था यज्ञ हवन रामायण अखण्ड पाठ अभिषेक से उठ जायेगा | उस दिन के बाद हमारी सनातन सस्कार की रक्षा कौन करेगा , आज जिन आयोजित कार्यक्रमों मे मै जाता हू उसके पीछैं यही धर्मपरायण घूसखोरो बेइमानों को ही पाता हू जिनके दान से पन्जीरिया व फ़ल प्रसाद के रूप मे प्रभु व हम जैसे भक्त पाते है यदि ये सन्सार मे नही रहे या इनकी आस्था प्रभु से उठ गयी उस दिन हमारे हिन्दु धर्म का क्षय हो जायेगा हे प्रभु इन्हे फ़लने फ़ूलने दो क्योकि य तो आपके कथनानुसार अपना उपार्जित धन तो आपकी सेवा-सुश्रुशा मे य सन्त की सेवा-सुश्रुशा मे लगा कर धर्मरक्षा मे लगे हुए है इनका कल्याण करो मेरे पडोसी अधिकारी को भी मुझे सन्त मानने व सेवा करने की सद्भावना दो
सोमवार, 23 नवंबर 2009
अजब प्रेम की गजब कहानी

मेरे पडोस मे एक बुजुर्ग है अच्छी नौकरी से रिटायर हुए है मकान जमीन सम्पत्ति सभी कुछ है सरकार पूर्वजन्मो के अपने पापो का प्रायश्चित करने हेतु इन्हे पेन्शन दे कर अपने पाप धुल रही है रिटायर होने के बाद कुछ समय वे आज के दौर मे नैतिकता व इमानदारी की ऐसी चर्चा करते थे जैसे इन्होने अपने आफ़िस मे इन्ही सब वस्तुओ की खेती शुरू की थी और कोई इनकी फ़सल पर आँख लगाये हुए बैठा हुआ है तथा इन सब वस्तुओ का कापी्राईट इन्ही के पास है
इन दिनो इन्हे शौक चर्राया है मुहल्ले की बहू बेटियो के चरित्रों पर एफ़ बी आइ की तरह नजर गडा कर रखना | पवित्रता का मन्त्र पढ कर ये अपने को पूरे दिन के लिये शुध्द मान लेते है ये हमेशा दूसरे की अपवित्रता के मोश्चराईजर से अपना मुँह चमकाते रहते है धवल चेहरे के साथ पान घुलाते हुए ये जब भी मुंह उठा कर बोलते है तो लगता है कि चाँद पर ही थूक देंगे जब भी मिलेगे तो मुह्ल्ले की लडकियो के भागने की पूर्व कथाये स्त्रियो के विवाह पूर्व गर्भपात की चर्चा वर्तमान पतिव्रताओ के प्रणय प्रसंगों की चर्चा मुझसे जरूर करते है मै पहले बुजुर्ग होने के नाते उनका लिहाज करता था लेकिन अब वे अझेल व अप्रासन्गिक हो गये है वे प्रायः अपने दिनों को याद करते है कि पहले का जमाना कितना अच्छा था कितनी अच्छाइयाँ समाज मे थी मानो अच्छाइयाँ सड्क किनारे खोमचे पर बिकती रह्ती थी और लोग अनजाने मे उसे मांग मांग कर चखा करते थे जिससे उन्के खून जिगर मे अच्छाइयों के किटाणु पाये जाते थे लेकिन मै जानता हू कि जितना बुरा जमाना आयेगा उतना ही ये अपने को स्वस्थचित्त व सुखी मह्सूस करेगे तब इन्हे उसी प्रकार गर्व होगा जैसे जार्ज पन्चम के सिक्को को आज कल के सिक्को के आगे मह्सूस होता है कि देखो इतनी मुद्राओ व गाधी की फ़ोटो लगे नोटों के आगे भी लक्ष्मी के रूप मे मेरी ही पूजा होती है इसी प्रकार पतनोन्मुख समाज मे वे पुराने चावल की भान्ति सुवासित होने क ढोंग रचते है कि किस प्रकार से हमने अपनी अक्षत अच्छाइयों को बचा रखी है
वे आज कल इन्टरनेट के माध्यम से होने वाली शादियो रीति नीति विश्वास परम्परा के विरूद्ध व्यथित है मैने एक दिन उनसे कहा कि जब एक युवा व युवती 18 वर्ष की होने पर सरकार चुन सकते है तो मन्गेतर चुनने मे कौन सी आपत्तिजनक है आप इस बात पर क्यों दुःखी होते है तब से वे मुझसे ही दुःखित हो गये है
जब मैने तफ़्सील मे जाकर पता लगाया तो पता ये चला कि उनकी लड्की ने बहुत पहले एक विजातिय लड्के से प्रेम किया था बात जब शादी तक पहुँचती तब उन्होने जबर्दस्ती एक ऐसे लड्के से उसकी शादी करा दी जिसका कुल गोत्र तो उंचा था कमाई कम थी पत्नी को प्यार भले ही कम करता था लेकिन दहेज को लेकर पीटता अधिक था जहिर है पुत्री अक्सर इस शादी को लेकर ताने सुनाती थी लेकिन वो इस पर कोई बयान नही देते थे देते भी तो क्या देते उन्हे तो यह आत्मिक सन्तोष था कि चलो उंचे कुल गोत्र खानदानी लोगो से ही तो पिट रही है कोई विजातीय अधर्मी से तो नही कम से कम अगला जन्म तो सुधर जायेगा
मै यही सोच रहा हू कि क्या प्रेम करने से पहले युवकों व युवतियों को एक दूसरे का कुल गोत्र जाति विस्वा पूछ कर प्रेम की शुरूवात करनी चाहिये वैसे मै अपना अनुभव बताऊ कि इन सब चक्करो के कारण ही मै प्रेम की शुरूवात ही नही कर सका जिस कुल गोत्र से बान्धा गया उसी से मन्त्रविद्ध हू लेकिन एक शायर का शेर इनदिनो पढा पता नही पहले क्यो नही पढ्ने को मिला तो अब यह खयाल आता है कि आदर्शवाद मे काफ़ी कुछ खोना पड्ता है शेर कुछ यू है
सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर,
जमाने से लडना है तो जिगर पैदा कर |
कौन सी शय है जहाँ जज्बा ए माशूक नही ,
शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर |
तो मेरी सलाह ये है कि इन बुजुर्गो की बात पर ध्यान ना दे कर प्रेम आदि के मामले खुद ही निपटा लेना चाहिये ये बुजुर्ग तो प्रेम के नाम पर प्रेम चोपड़ा को ही जानते है जिन्दगी भर हनुमान चालीसा पढने का ढोंग करते हुए इन्होने बिना प्रेम किए ही परिवार में लाल तिकोन को ही वृत्त व अष्टभुजाकार ज्यामिति में बदल डाला तथा पूछने पर उसे हनुमान जी का आशीर्वाद व प्रसाद मान लिया