बुधवार, 10 सितंबर 2008

ईमानदार और बेईमान की परिभाषाएं

कुछ आधुनिक परिभाषाएं
बेईमानी और इमानदारी की बातें प्रायः हरि अनंत हरि कथा अनंता शैली में सदियों से चली आ रही हैं प्रत्येक युग में अलग अलग गुण धर्म रहे है इन शब्दों के , किंतु साधारण आदमी के लिए यह एक अबूझ पहेली बनी हुई है कि
हम किसे बेईमान कहें और किसे इमानदार | कुछ परिभाषाओं के मध्यम से आप अपने को या दूसरे को माप सकतें है कि वह कैसा है
१ हर व्यक्ती अपने को इमानदार व दूसरे को बेईमान समझता है |
२ हम सब कहीं न कहीं थोड़ी या ज्यादा बेईमानी करतें है | कुछ लोग अपवाद हो सकतें हैं |
३ एक चोरी करता है दूसरा चोरी में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से मदद करता है और तीसरा चोरी का इरादा मन में रखता है |इस दृष्टि से सभी तीनो चोर है |
४ यह भी सत्य है कि चाहे जितनी भी चोरी करो , बेईमानी कारों इस पापी पेट के लिए किंतु यह पापी पेट दो रोटी में ही भर जाता है वह चाहे चुपडी हो या सादी ....
आज के युग में बेईमानी और बेईमान सब तरफ़ से सुरक्षित व सरंक्षित है |
४ सरकारी नौकरी में सुधारवादियों की कोई जगह रिक्त नहीं है न इसकी जरूरत ही है बस इतना ही कोई कर सकता है कि कोई हमारे नाम पर न खाए , हमारे सामने न खाए ,और हमारी शिकायत न आए यही बचा कर चले तो समझो सफल हैं
५ चोर पकड़ने से अच्छा है अपना माल ही न चोरी हो जाए इसी पर ज्यादा ध्यान दें वह माल अपनी मर्यादा इज्जत नाम कुछ भी हो सकता है क्यों कि बेईमानों के हाथ काफी लंबे है
अपने प्रति इमानदार रहना ही सफलता और आत्मसंतोष कि गारंटी है |
६ पहले यह कहा जाता था कि यह अफसर बेईमान है रिश्वत लेकर काम करता है | आज कल लोग ये कहते हैं कि यह अफसर भ्रष्ट है रिश्वत ले कर भी काम नहीं करता है |
७ हर आदमी दूसरे को बेईमानी के लिए प्रेरित करता है आपकी कीमत की टोह में है अगर आपने अपनी कोई कीमत का अंदाजा नहीं दिया तो आप जसा नाकारा और बेकार अफसर कोई नहीं आपको हटाने के लिए लोग कटिबद्ध हो जायेंगे
अधिकारी कि तरक्की में ईमानदारी ,व्यापारी की तरक्की में दुनियादारी तथा नेता कि तरक्की में समझदारी बाधक है |
८ जो अफसर ज्यादा ईमानदारी के भाषण देता है वह उसके उतने ही विपरीत है समझ लीजिये|जो बदसूरत है वही तो फेयर एंड लवली कि क्रीम हाथ में लेकर दिखायेगा |
९ भ्रष्टाचार की बात करते हुए कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हुए सुना है कि फलां कि नैतिकता इतनी मर गई है कि उसने मेरे नाम का पैसा भी खा गया |
जय बोलो बेईमान की !!!!!!!!!

सोमवार, 8 सितंबर 2008

रामराज्य अच्छा या आज का राज्य

एक प्रश्न मेरे मनोमस्तिष्क में बहुत दिनों से परेशान करता है की जिस रामराज्य के के बारे में गांधी जी से लेकर हमारे संस्कृति के खेवन पार्टियाँ बड़े जोर शोर से बातें करतीं हैं , जिसके बारे में गोस्वामी दास जी ने उत्तर कांड में बड़ी अच्छी अच्छी बातें लिखी है क्या उसमे वास्तविक लोकतंत्र था तथा जनता की मनः स्थिति क्या थी ? एक दो प्रसंगों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ की आज से भी बुरी और भयग्रस्त मानसिकता वाली जनता उन दिनों की थी जो किसी अन्याय का विरोध नहीं करती थी केवल राजतन्त्र के प्रति निष्ठावान जनता थी जो राजा ने कर दिया वोही ठीक है
बल्कि महाराज दशरथ के दिनों में जनता अपनी भावना अच्छे तरीके से प्रकट करती थी प्रभु राम के वनवास की ख़बर सुन कर भारत के साथ राम को मनाने काफी संख्या में नर नारी का समुदाय जंगल में चला आया था बड़े मनावन व मनुहार के बाद जन मानस वापस लौटा था
किंतु धोबी प्रसंग के पश्चात जब राज धर्म का पालन करते हुए सीता को गर्भावस्था में बनवास हुआ तो वही जनता ने कहीं भी कोई विलाप या विरोध प्रदर्शन कर के अपनी असहमती नहीं जताई जनता के इन दो प्रसंगों में अलग अलग व्यवहार को क्या माना जाय की जनता पहले उसी राम सीता के वनवास होने पर वन में मनाने चली गई किंतु माता सीता के निष्काशन का उस पुर जोर से विरोध नहीं हुआ ?
क्या दशरथ महाराज के समय की जनता ज्यादा स्वतंत्र थी अपनी भावनाओं को प्रगट करनें हेतु या राम राज्य में अधिक कठोर व विकेन्द्रित शाशन प्रणाली के चलते जनता में कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई ?
इतना अच्छाई वाले राज्य में भी एक धोबी ऎसी अनर्गल प्रतिक्रया करता है इससे यह सिध्ध होता है की राम जैसे मर्यादा वाले राजा के विरोध में वैयक्तिक प्रतिक्रया हो सकती थी तो आज जो ओछी राजनीती हो रही है उसे नजरअंदाज करना ही पडेगा तथा उसे सामान्य ही माना जाएगा
यदी आज के समाज में किसी धोबी ने ऎसी वैसी टिप्पणी की होती तो सत्ताधारी दल के लोग उसे अपनी पुलिस या अपनी पार्टी के लोगो से धोबी के प्रति विरोध प्रगट करते और धोबियों के विरूद्ध दंगे भड़क जाते धोबी का नार्को टेस्ट करा कर सी बी आई उससे जुर्म कबुल्वाती की उसने किस पार्टी के कहने पर ऎसी वासी बातें कही है
खैर ये सब तो आज होता
उन दिनों में उस धोबी के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया क्या रही थी ? इसके बारे में मैंने कहीं नहीं पढ़ा है की क्या उसका सामाजिक बहिस्कार हुआ था या नहीं या उसके पड़ोसियों ने हुक्का पानी बंद किया था या नहीं हनुमान जी जैसा बलशाली देवता के रहते हुए कोई धोबी ऐसा वैसा कैसे कह दिया इससे ऐसा लगता है की प्रशाशन का ज्यादा खौफ जनता में नहीं था
खैर कुछ गंभीर प्रश्न जो अनुत्तरित हैं १ क्या युगों युगों से जनता का चरित्र ऐसा ही रहा है की वह शासकों के क्रिया कलापों के प्रति इसी प्रकार उदासीन रही है ?
क्या हम किसी ऐसे यूटोपिया की कल्पना कर सकतें है जो रामराज्य से भी बेहतर हो जिसमे ऎसी घटना न हो
क्या भगवान् राम को डर था की यदि धोबी की घटना पर उन्होंने जल्द से जल्द कोई प्रतिक्रिया नहीं की तो जन सामान्य में यह चर्चा का विषय बन जायेगी
मैं चाहूंगा की इस पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें किंतु मेरे मतानुसार जनता किसी की सगी नहीं है वोह भी अवसरवादी होती है तथा स्मरंशाक्ती शुन्य होती है जैसा की यहाँ राम के वनगमन और सीता वनवास में दो भिन्नताएं देखने को मिल रहीं है तथा नारी के प्रती लोगों की विपरीत सोच खास तौर से यौन शुचिता को ले कर वैसी की वैसी ही है तो क्या राम राज्य और क्या आज का राज्य ?????? कोऊ नृप होए हमें क्या हानि ........ यह भी मानसिकता उसी काल से चली आरही है नहीं बदला है जनता की सोच बस बदला है तो शासकों के शासन की स्टाइल ठीक कहा ना

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

वसीयत में ठेंगा

अभी कुछ दिन पूर्व एक अखबार में यह ख़बर पढी की अहमदाबाद की एक स्त्री ने अपनी वसीयत में अपने दो जीवित पुत्रों के नाम अपना ठेंगा (अंगूठा ) कर दिया इस ख़बर के अनुसार इस महिला के दो पुत्र थे बड़ा पुत्र अमेरिका में तथा छोटा पुत्र मुम्बई में सेटल थे तथा मान की परवाह नहीं करते थे माँ एक हास्पिटल में नर्स का काम करती थीं तथा retirement के बाद एक नौकरानी के साथ रहतीं थी| ७० वर्ष की आयु में अपनों से दूर निराशा पूर्ण स्थिति में उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी सारी समप्ति , मकान आदि उस नौकरानी के नाम कर दिया तथा अपने आँख गुर्दे के साथ अपना शरीर मेडिकल कालेज को दान कर दिया ताकि छात्र छात्रा उनके शरीर को अपने प्रक्टिकल हेतु प्रयोग कर सकें

अपने पुत्रों के लिए अपनी अन्तिम क्रिया के संस्कारों के निमित्त उन्होंने अपने दोनों हाथों के अंगूठे काट कर देने हेतु लिखा था जो मेडिकल कालेज के लोगों ने सुरक्षित रखा था जो वसीयत के अनुसार उनके पुत्रों को दे दिया गया

इस ख़बर को पढ़ कर अंदाजा लगाया जा सकता है उस माँ की पीडा तथा आज की पुत्रों की संवेदनशीलता को

उस अंगूठे का क्रिया कर्म हुआ या नहीं लेकिन इतना स्पष्ट है की इनकी संतानें ऐसे माता पिताओं को कीडो मकोडों के द्वारा ही अन्तिम क्रिया कराएंगी इसमे कोई शक नहीं क्यों की भौतिकता के नाम पर जो संस्कार ये अपने बच्चों को दे रहे है उसका फल क्या होगा

कभी कभी मुझे लगता है की पुराने ज़माने की जो कहावत है कि भलाई का बदला भलाई मिलेगा ये सब बातें outdated हो गयीं है ये उन दिनों के लिए गाधी गयीं थी जब वास्तव में भले लोग संसार में ज्यादा थे तथा आए दिन भला आदमी भले आदमी से ही टकराता रहता था इस लिए उसे भलाई मिल जाती रही होगी ऐसे भले लोगों ने अपने अनुभवों से ये मुहावरा बना दिया

अन्यथा आज के ज़माने में एक भले आदमी को इतनी जिल्लत सहनी पड़ेगी कि उसे फ़िर इसी निष्कर्ष पर पहुँच कर इस दोहे को संसोधित करना पडेगा कि "जो टोके काँटा बोए ताहि बोए टू भाला , वो भी साला याद करेगा पड़ा किसी से पाला " मूल दोहे में काँटा के बदले फूल बोने की बात कही गयी है

फ़िर उस घटना से व्यथित हो कर मई उस दुखात्मा को अपनी तरफ़ से श्रधांजलि देते हुए इश्वर से उनजैसी माताओं के पुत्रों को सद्बुधी देने की प्रार्थना करता हूँ कि फ़िर किसी माँ को ऐसा कठिन निर्णय न लेना पड़े और किसी पुत्र को ठेंगा न मिले

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

जनरल मुशर्र फ गांधीवाद की ओर

इस फोटो को पहचानिये ये हैं शान्ति के नए दूत
आज कल हर कोई यह जानने की कोशिश
में है कि मियॅ मुशर्रफ़ क्या सोच रहे हैं और
क्या कर रहे है जनरल साहिब गांधी जी के तीन
बंदरों वाले सिधांत पर ये चौथा बन्दर को साधने
कि कवायद कर रहे हैं ये चौथा बन्दर कह रहा है
बुरा मत करो ॥ शेष तो वोही बुरा मत देखो , कहो और
सुनो का ही राग अलाप रहे थे
मुशर्रफ़ साहब ने इसमे बुरा मत करो वाला चौथा बन्दर
भी डाल कर अमेरिकिओं को भी संदेश देना चाहा है कि बुरा करने का परिणाम अंत में बंदरों को नचाने सरीखा ही है
काश अवाम और इंशा अल्लाह सारे पाक हुक्मरान
इस चौथी नसीहत को अपना लेते तो आज मुसर्रफ कि ये सद्गति नहीं होती |हाँ एक बात स्पष्ट है इस चित्र से कि केवल सत्ता गई है लेकिन कुछ बंदरों की कमान अवश्य जनरल साहब के पास है सावधान रहने की अभी भी जरूरत है |

सोमवार, 1 सितंबर 2008

मत जाओ चाँद पर

" जिंदगी जब भी तेरे बज्म में लाती है हमें
ये जमीं चाँद से बेहतर नजर आती है हमें "
ये खूबसूरत नज्म जब जब मैं सुनता हूँ तो वाकई रश्क होने लगता है कि क्या वाकई किसी प्रेमी को ये जमीं चाँद से बेहतर नजर आ सकती है | शायद हाँ क्यों कि सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है
हमें तो यारो ये जमीं चाँद सी ही नजर आने लगी है बस फर्क इतना है कि चाँद पर प्लास्टिक की थैलियाँ तथा नेताओं के पार्टी झंडे की प्लास्टिक टुकड़े व नारे देखने को ना मिले | लेकिन अपना चाँद तो भारत के किसी कसबे या महानगर से ही मिलता जुलता नजर आता है विस्वास न हो तो अपने यू पी के किसी महानगर से जुड़ने वाली सड़क पर बसों की यात्रा करें माँ कसम आपको इतना ही मजा आयेगा जो नील आर्मस्ट्रांग को चाँद पर बघी पर आयेगी | यह बात अलग है की अपने प्रदेश में ये सड़कें चाँद को देख कर ही अभियंताओं ने बड़े ही परिश्रम से मंत्रियों के आशीर्वाद से बनाई है | अगर मुग़ल राज होता तो शायद इन अभियन्ताओं और ठेकेदार महा प्रभुओं के हाथ अवश्य काट लिए जाते |
आप कहेंगे की चाँद और आपके शहर में कौन सी समानता है मजाक कर रहे है नहीं हुजूर हमारा शहर चाँद से बेहतर ही है | आप यही खोज करने जा रहे हो ना की चाँद पर पानी है या जिंदगानी है या नहीं धत तेरे की
बस इत्ती सी बात के लिए भारत सरकार चन्द्र यान छोड़ रही है आओ हमारे नगरों की दूर से तसवीरें खीच कर उसमे से पेड़ आदि वैसे मिलने मुस्किल ही होंगे उसको डिलीट कर भेज दो नासा के पास वो उसे पास कर देगा शीर्षक दे देना चाँद का वोह भाग जिसकी और कभी कोई यान नहीं गया | यही तो खोजने जा रहा है हमारा चंद्र यान
आप चाँद पर जल खोजने जा रहे हो हमारे शहर में शुद्ध जल खोज कर दिखा दो जल में जीवन के गुण और प्राणी दिखा दो आप जीवन की तलाश में चाँद पर क्यों जा रहे हो |हमारे शहर में जीवन की संभावनाएं दिखा दो ना ...
आप गैसों की खोज में चाँद के अभियान पर क्यों जा रहे हो हमारे यहाँ गोबर गैसों और सीवर गैसों के आलावा आक्सीजन खोज कर दिखाओ ना की पृथ्वी पर जीवन कैसे चल रहा है | हाँ चाँद पर जमीनों के क्या रेट है रियल इस्टेट की क्या संभावनाओं की तलाश हो तो जाओ पर इतना अवश्य जान लो की शायद तुम्हे वहां अच्छी जमीं मिल जाए लेकिन हमारे शहर में तो आपको न जमीं मिलेगी न जमीर | तो भारत सरकार को पहले अपने देश में ही जगह जगह चाँद जो नक्शे में भी चाँद की खोपडी जैसे लगते है इन्ही पर शोध करना चाहिए की अचानक भारत खंडे इन छंदों का क्या किया जाए | हमने पढ़ा है की कोई बूढी औरत चाँद पर चरखा कातती नजर आती है | यहाँ भारत में तो बहुत पहले एक बूढा व्यक्ति वास्तव में चरखा काटता था जो मर गया तो उसके चेले आज कर हर जगह चाँदी काटते नजर आ रहे हैं |उस बूढे के पास एक लाठी और एक लंगोटी भी थी जिसे सरकार ने बाँट दिया पुलिस को लाठी दे दी तथा पब्लिक को लंगोटी | दोनों इसका भली प्रकार से निर्वाह कर रहे है और इसको छोड़ नहीं पा रहे है ना पुलिस न पब्लिक | मत जाओं चाँद पर यहीं चंद लोगों के चाँद को निहारों तथा चाँदी को देखो
तो बंधुओं ये जमीं चाँद सी ही नजर आती है मुझे |क्या रखा है उस चाँद पर .....
किससे करूँ शिकायत किससे कहूँ फसाना
एक तरफ़ तुम्ही तुम हो इक तरफ़ है जमाना |

आज की कविता

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)

संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।
(यह कविता स्वर्गीय धूमिल की रचना है ) आज के दौर में इतना बेबाक कविता पढने के बाद आप शायद अंदाजा लगा सकें की आने वाला समय कैसा होगा , शायद अच्छे दिमागों का सी टी स्कैन करा कर कोमा में रख दिया जाएगा लोगबाग मर्सिया पढेंगे इन अच्छे दिमागों की इस अवस्था पर ..........
इसी पर एक कविता जेहन में उभर रही है
इस शहर की सभ्यता हद है
हर चने की झाड़ बरगद है ,
कुर्सिया चुम्बक नहीं यारों
बैठने वाला ही अंगद है
तो इन अंग्दों को नमस्कार करते हुए व्यस्था की जय जैकार करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूँ

रविवार, 31 अगस्त 2008

सिक्स पे कमीशन और बाबु की व्यथा

जब से सिक्स कमीशन की रिपोर्ट क्या आई है ,ऐसा लगता है की भूचाल आ गया है ऐसे में मैंने सोचा चलो अपने कलक्टर के पेशकार मुरारी लाल से पूछ्तें हैं की वेतन बढोत्तरी के बारे में उनके नेक ख़यालात क्या हैं | जा कर देखा तो वे टुन्न पड़े हुए थे बोले शांत रहने में ही भलाई है आज बाबू वर्ग तनख्वाह को लेकर नहीं बल्कि रिश्वत को लेकर परेशां है तनख्वाह की दरें चेंज हों या न हों लेकिन रिश्वत की दरें revise होनी चाहियें वेतन का क्या है साडी दुनिया जान जाती है एक रूपया वेतन बढ़ता है तो महंगाई दो रुपया बढ़ जाती है बाबू वर्ग की जेब तो तार तार हो जाती है इस महंगाई के चलते |
पे पर तो सिक्स कमीशन बैठ चुके किंतु रिश्वत पर एक भी नहीं |यदि कोई कमीशन बैठता तो हम भी अपनी बात कहते | जब कोई कमीशन ही नहीं बैठा तब बाबू वर्ग को छोड़ कर बाकि लोग मौज करें
मैंने कहा मुरारी लाल जी क्या चिंतन है मैं तो पे की बात कर रहा था कितना फायदा हुआ और आप घूस को ले कर रोए जा रहे है
" वेतन को मारिये गोली |वेतन से आज तक किसी का भला हुआ है जो होगा मैंने तो किसी को होते नहीं देखा तो इस पर बात करना बेकार है , घूस की बात करो घूस की , जिसे देने वाला और लेने वाला दोनों माला माल हो रहे है
घूस जिससे दिन भर में कोठी तैयार होती है तथा रात भर में लक्सारी कार | घूस जिसका दस बीस लाख खा कर अफसर मस्त रहता है करोड़ पचास लाख खा कर नेता |
छापा के बहने पर जाने पर पता चलता है की इन इमानदारों के घरों में कितना माल संडास में छुप्पा है बाकी सब ले दे कर बराबर |उधर येही अफसर और नेता शिकायत सुन लें की किसी बाबू की जेब में पचास रुपये की नोट है तो बाबू जेल के अन्दर |क्या साडी इमानदारी का ठेका बाबू वर्ग ने ही ले रखी है |क्या हम चंदन लागतें है तो इसलिए
केवल राम राम जपतें रहे , अपने पांडे जी को देखिये बड़ा लाल टीका लागतें है माथे पर लेकिन क्या मजाल है फाइल को बढ़ने दें बिना कुछ दक्षिणा लिए | मैं समझ गया वे गुरु जी की बात कर रहे थे माथे पर लाल टिका विनम्रता की प्रतिमुर्ती कि आप जब मिलोगे तो विनम्रता से खड़े हो जायेंगे किंतु फाइल पर जो बात जायेंगे तो बिना फाइव स्टार लिए उठेंगे नहीं |हनुमान जी के भक्त हैं संकट मोचन में जा कर एक ही चौपाई सीख सकें है
" राम दूआरे तुम रखवारे , होत ना आज्ञा बिन पैसा रे || यही गुनगुनाते रहतें है लोग समझ जातें है कि दरवाजे पर लाल टीका लगाये यह सख्स बिना पैसा के कोई आर्डर निकलने नहीं देगा
मैंने मुरारी लाल को कहा आप भी तो पेशकार हैं आप को दिल छोटा करने की क्या जरूरत है , वे बिफर गए " हाँ बाबू सवेरे से शाम तक टकटकी लगा कर देखे दस या पाँच के पत्तों के लिए उधर अगला संडास में सोना छिपाता फिरे ""
"यार लाल साहब ये बात जम नहीं रही , संडास में सोना चांदी की बात ठीक नहीं' मैंने कहा
मुरारी लाल बोले जा कर देखो तो उनके संडासों में , जरा इन पाखण्ड विकास अधिकारीयों को देखो मैंने कहा' यार खंड विकास कहो" वे भड़क कर बोले" खंड कहो या पाखंड बात एक ही है ब्लाक डेव्हलपमेंट के नाम पर क्या ये डेव्हलपमेंट
को ब्लाक नहीं कर रह्नें है कोई पूछने वाला है ये साल दो साल कि नौकरी में इतना विकास कहाँ से हो रहा है कि तमाम लक्सारी कारें इन्हे ही मिल जा रही है और तुर्रा ये कि उन्ही गाडीयों पर उत्तर प्रदेश सरकार भी लिखवा दे रहे है यदि मैं राज्यपाल होता तो i am pleased to seize all वेहिकल्स कि जब माल सरकार का ही है तो इधर लाओ" |
तब तक मुरारी लाल पर नशा हाबी हो चुका था बोले ये बाबू वर्ग की ट्रेजेडी है की वो बाबू है इस लिए बदनाम है बाद होने के लाख फायदे बदनाम होने के लाख नुक्सान |बीबी वेतन और रिश्वत की पाई पाई वसूलने के बाद भी समझती है की उससे कुछ छिपा कर रकम डंप की गयी है अफसर साला भी येही समझता है की हो ना हो कुछ रकम का फील गुड बाबू ने कर दिया है
उस पर से ये पे कमिशान की कामिनी रिपोर्ट जिसने एरीअर की ख़बरों को भी लीक कर दिया है , दामाद बेटियों को तंग करते हैं , बहुएं बेटों को एहन तक की चुन्नू मुन्नू को भी पता हो गया है की वेतन बढ़ गया है सबकी एक ही रट है बाबू जी से कहो - कहो कहते जाओ बू वर्ग तो अभ्शाप्त है केवल सुनने के लिए दफ्तर में अफसर की फरमाइशें पुरी करते रहो अपनी दस पैसों में से तथा घर पर बेटो बेटियों दामादों से सच पुछो तो नफरत
हो गयी है ये बाबू डम से पहले की बात कुछ और थी घुस कमिसन में इमानदारी से सकदे में अट्ठानी मिलाती थी तो उसमे बरक्कत थी अब उसमे इन बे ईमानों ने सैकडो मुसीबतें खडी कर दी है | सैकडा खाने वालों ने हमारी अट्ठानी भी कहानी शुरू कर दी |आज सैकडा खाने वाला इमानदार है तथा अट्ठानी खाए जो वो बदनाम
हम बाबू वर्ग तो घर पब्लिक परिवार सबके सामनें नंगे हो गए हमारी रिश्वत के रेट वही नेहरू जी के ज़माने के ही चलें आ रहे हैं वही पाँच दस रुपये सरकार इन रुपयों का चलन बंद कर दे तो शायद कुछ बदलाव आए हमसे अच्छे तो भिखारी हैं जो आटा- चावल के स्थान पर एक दो रुपये लेने शुरू कर दिए पर हम पेशकार वर्ग अभी भी तारीखों को देने के नाम पर वही पुराना दो रुपया ही लेते चले आ रहे हैं है कोई ऎसी कॉम जो पब्लिक हित में अपना इम्मन दस पाँच में बेचती हो
मैं मुरारी लाल की इस व्यथा को सुन कर " करुना कर के करुणानिधी रोए " की स्थिती में आ गया हूँ है कोई सुनने वाला है? जो इस अनोमाली को पे कमीशन के सामने ला कर पे बैंड की तर्ज पर ले बैंड या दे बैंड बना कर इन मासूम बाबू वर्ग को निर्दयी अफसर साहूकारों के चंगुल में जा रहे उनकी अट्ठानी को कपंन्शेट कर सके

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

व्यंग्य कविता

छुपे हैं चोर थाने में , पकड़ने हम किसे जायें
दरोगा बन गया साला अकड़ने हम कहाँ जायें

लगा है शौक पढने का हमें यारों बुढापे में
बंधी भैंसे मदरसे मैं तो पढने हम कहाँ जायें |

खुजा कर सर किया गंजा , न आई बात भेजे में
लिया जब जन्म अगडों में पिछड़ने हम कहाँ जायें |

बिजली है , न पानी है ना सीवर है न सड़कें है
बसाया घर बनारस में , तो उजड़ने हम कहाँ जायें|

कटें है सीरियलो में दिन गुजारी रात फिल्मों में
जो घर में हो डिश टीवी बिगड़ने हम कहाँ जायें

पढ़ी है जब से लोगो ने पे कमिशन न्यूज अखबारों में
बढाये दाम बनियों ने , तो बताने हम कहाँ जायें |

सभी बेटों ने कर लिया एम् सी ऐ , और एम् बी ऐ ,
बेचते पार्ट एच सी एल के , बतानें हम कहाँ जायें |

एक दोहा
रहिमन अब वे पुलिस कहाँ ,धीर वीर गंभीर ,
थाने - थाने देखिये हरिजन और अहीर |
( ये दोहा किसी जाति विशेष के प्रति विरोध के लिए नहीं है बल्कि थानों में दरोगाओं के जातिवार नियुक्ति को ले कर कोटा सिस्टम के प्रति टिपण्णी है | अतः सुधी पाठकों से क्षमा याचना सहित )

रविवार, 24 अगस्त 2008

लोक तंत्र

लोक प्रतिनिधि की वंदना करूँ मैं बारम्बार

लोक के प्रति निष्ठां नहीं निधि से नेह अपार

बोले कुर्सी बिहंसी के हूँ वेश्या की जात

आने वाले पान खाय जाने वाले लात

सारा जग अँधा हुआ भूले भटके लोग

जोगी ढूंढे भोग को भोगी ढूंढे जोग

तन्त्रहि लोक भावे नहीं नहिं भावे लोक तंत्र ,

एक गुलामी कर रहा है दूजा परम स्वतंत्र

रोवे लोक रोटी नहिं पड़ी लंगोटी छोट ,

चाहे उनको वोट दें , चाहे उनको वोट

मोटर चमके तंत्र की बत्ती नीली लाल ।

चीखा जन नंगे हुए मेरी उतरी खाल

मारा - मारा जन फिरे , इनके उनके धाम ,

सबके निश्चित काम हैं सबके निश्चित दाम

भुला भटका जन लगे तंत्र द्वारे जाए

कुकुर मिठाई खा रहे देखि देखि ललचाय

जन जैसा निर्धन नहिं , तंत्र सरिस धनवान ,

निर्धन को धन दे प्रभु !! धन वालों को ज्ञान



अंधे युग को क्या कहूँ चढा करेला नीम ,

सबे शिखंडी हो गए क्या अर्जुन क्या भीम

पहिले जस दानी कहाँ , कहाँ दान और मान ,

sabhii सुदामा हो गए , रोवें कृपानिधान

सोमवार, 18 अगस्त 2008

सोना सस्ता बेकार है सोने का मैडल

जब से निशानेबाज बिंद्रा ने गोल्ड मैडल क्या जीता सोने और चाँदी दोनों के भाव गिरते ही चले जा रहे है विश्वास न हो तो पुराने सराफा बाजार की खबरें देख लें बिंद्रा ने कहा कि यह स्वर्ण कईयों को प्रेरित करेगा \किंतु सत्यानाश हो इन सर्राफा बाजार वालों का जो सोना तो सोना , चाँदी का भी दाम गत आठ महीनों के न्यूनतम मूल्य पर ला कर पटक दिए बिंद्रा का कहना था उसका केवल लक्ष्य मैडल कि ओर ही था किंतु भला हो अन्य निशानेबाजों राठौर आदि आदि का जो सराफा बाजार कि ख़बरों पर ध्यान देते हुए सोच लिए कि ये फायेदे का सौदा नहीं कि मैडल ले जाओ जिसकी कीमत ओलम्पिक ख़त्म होते होते पता नहीं कहाँ तक गिर जाए
वास पता नहीं सोना भी कितने कैरट का है इन चीनियों का क्या भरोसा जब इन्हे भारत के मेहमानों कि लिस्ट में मनमोहन सिंह में ही खोट नजर आ गया तो इनकी नियत मैडल बनाने में कितनी साफ़ होगी ची चंग ही जाने \
फेल्प्स आठ स्वर्ण ले जा रहे हो न बाद में पता चलेगा कि ये सारे स्वर्ण संघाई के कबाडी बाजार से पीतल के बने हुए हैं खैर इसमे तुम क्या कर सकते भी हो तुम्हारा देश तो ऐसे भी कुछ करने वाला नहीं है सिवाय निंदा के ...
कांस्य पदक शायद ठीक ठाक हो इसमे हमारे बाक्सेर लगे हुए हैं देखना स्वर्ण मृग के चक्कर में तुम सब मत आ जाना हम सब उन वीरों कि संतानें है जिन्होंने सोने को लोष्ठ्वात ( ढेले) से ज्यादा कुछ नहीं समझा बिंद्रा अभी नादान है शादी शुदा है नहीं वो नहीं जानता कि सोने के पीछे भागेगा तो भागता ही रहेगा सीखना है तो क्रिकेट टीम से सीखो जो रोज बयान दे रही है कि मेंडिस कि काट मिल गई है और हर बार मेंडिस ही काट रहा है एक दो हार से जिन्दगी तो ख़त्म नहीं हो जायेगी मन बहलाने के लिए बिंद्रा का मैडल काफी है आप सब आ जाओ कामनवेल्थ और मिशन लन्दन कि बात करनी है

शनिवार, 2 अगस्त 2008

क्षणिकाएं फूटकर कवितायें

गुप्त रिपोर्ट (टाप सीक्रेट )
सेवा में .......
aapkaa पत्र मिला
अर्ज है
यह बड़ा अनुसाशनहीन है
न खाता है , न खिलाता है
खान पान का सख्त विरोधी है
पूरा दफ्तर परेशान है हैरान है ,
आचरण निंदनीय है
अतः तबादला जनहित (बहुजन हित ) में
अनिवार्य है गुप्त रिपोर्ट आपकी सेवा में
कार्यवाही हेतु प्रेषित है
भवदीय
(आ. प् .लेले )
कुछ नयी बीमारियाँ ----
रिपोर्ट आई है कुछ बीमारियाँ घट रही हैं तो कुछ नई आ रही हैं
पक्षाघात घट रहा है
पक्षपात बढ़ रहा है
मलेरिया घट रहा है ,
मॉल एरिया बढ़ रहा है ॥ (माल शब्द के कई अर्थ है कृपया सभी को देखें )
चेचक मिट गयी है
चक _चक बढ़ गयी है
पर व्यक्ती खुराक घट गयी है ,
पर वजन बढ़ रहा है
दिल के दौरे बढ़ गए हैं
दिल का आकार छोटा हो गया है
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सोमवार, 28 जुलाई 2008

आज का अखबार पढ़ा क्या ?

और लोगों की तरह मैं भी रोज अखबार पड़ता हूँ ठीक उसी तरह से जैसे खाना खता हूँ पानी पिता हूँ काम नहीं करता फ़िर भी तन्खवाह लेता हूँ
अख़बारों में कुछ खास नहीं होता क्यों होवे वास्तव में अख़बारों की कोई गलती नहीं है , गलती गैरों की है जो गैर बन कर हमारे और आपके बीच में बन कर वारदात कर रहा है \ जो हमारे विश्वासों को रोज कुचल रहा है येही वो सकश है जो अविश्वास पैदा कर रहा है दरअसल जो जमीं पर घट रहा है वोही तो अख़बारों में छप रहा है घटना घट रही है वारदात हो रही हैं अख़बार वाला इन्तेजार कर रहा है जो हो रहा है हो जाने दो
आज जो विसंगतियां हैं वोही तो ख़बर है कल का सड़कछाप आज सत्ताधारी है गदाधारी है कल वाला आज को धकेल कर कल सत्ता पर काबिज हो जाएगा फिर कोई तीसरा आएगा जो इन दोनों को पडल की रह दिखायेगा चौथा गणित लगा रहा है देर तो होगी पर अंधेर नहीं होगी आज हेलिकोप्टर वाला कल कहाँ लैंड कर जाएगा या क्रश करेगा पता नहीं येही तो रोजाना का हाल है यही अख़बारों की खबरें
स्थाई ख़बरों के स्तम्भ में खबरें अस्थाई होती हैं ,स्तम्भ स्थाई चलता वोही है जो चलनें लायक नहीं है\ जो चलनें लायक थे वो हार कर बैठ गए एक बार बात गए तो कोई उठाने वाला नहीं मिलता किंतु जो एक बार चल पड़े वोह तो चलही रहा है इस रफ्तार से की कहाँ जा कर रूकेगा पता नहीं
तीसरे पन्नें की खबरे लोकतंत्र की तजा तस्वीरें कत्ल डकैती ,पकड़ फिरौती
हड़ताल प्रदर्शन ,मानस प्रवचन धोखाधडी अपहरण , भगवती जागरण अनाचार व्यभिचार सामहिक बलात्कार
पाँच बच्चों की माँ , आठ बच्चों के बाप के साथ भागी आतंग्वाद की कठोर सब्दों में निंदा, कायरता पूर्ण कारवाही
क्यों आप से प्रसंशा पाने के लिए वे ये सब ये करतें है क्या जो निंदा से वे सर्मिन्दा होने लगेगें
सल्फास खा कर प्रेमी युगल मरें , दहेज़ हत्या के आरोपी सास ससुर गिरफ्तार , ट्रक और स्कूटर भिडे लुटेरे फरार
आदि आदि
एक और ख़बर जो मुझे पसंद है वोह है आतंकवाद को देख कर सहर में रेड एलर्ट जारी एक कुत्ते को लेकर पुलिस का बंदक्या सूंघता है ( पता नहीं) लेकिन ये रेड एलर्ट कब ग्रीन सिग्नल हो जाता है पता नहीं चलता है
घाटना हो जाने पर पुलिस वाले अपनें ही घर के कुछ लोगों की तस्वीर का स्केच फ़ौरन जारं करतें है तथा तलाश और सुराग की खबरें रोज जरी होने लगती हैं फ़िर खामोश हो जाती है इस तरह की तमाम बातें जिसे पढ़ना या न पढ़ना एक ही बात है
फ़िर आता है बाजार भावः चांदी लुढ़की सोना उचला गुड गिरा में काजू और बादाम में नरमी नमक तेज
सेंसेक्स में उछाल सेक्स में गिरावट अमुक बैंक को तिमाही में ४२० करोड़ का सुद्ध लाभ निवेसकों कों ghabdanein की जरूरत नहीं ,वित्त मंत्री
विज्ञापनों की दुनिया ही वो पन्ना है जो घटिया होते हुए भी सभी अख़बारों के पापी पेट का भरण पोषण करता है
विज्ञापन भी कैसे कैसे ,नौकरिया ही नौकरिया ,दसवीं फेल इंटर पास करें ,बेरोजगार निराश न हों , असली शिलाजीत रुद्राक्ष लिंग्वर्धक यन्त्र असली जवानी , चमत्कारी आयल ,कोचिंग कालेज में प्रवेस ले सफलता की गारंटी बौराम सर जी की क्लास , १५ घंटे में न अंग्रेजी सीखें , जापानी कुत्तें ज्योतीस भृगु संहिता मूठ वशीकरण नजर का काट २४ घंटें में , जोश और जवानी चस्मा लगायें बिकावू है माकन दूकान , रिश्ते ही रिश्ते .....
आकर्षक वैबाहिक विज्ञापन इतना आकर्षक की बुढ्ढे भी मचल उठें ,मनपसंद जीवन साथी ऐसे विगयापन की वाकई जाती बंधन धर्म बंधन को छोड़ कर बंधनें की इच्छा जाग उठाती है कास नारद जी को भी भगवान् नें येही पढ़ा दिया होता तो वो न श्राप देतें न रामायण का इतना लफडा होता किसी न किसी कन्या से तो नारद जी बाँध ही जाते,कन्या ही कन्या ६ फ़ुट आकर्षक एम् ऐ बी ऐ डिप्लोमा सजातीय वर २३/१६५/५०००/ जाती बंधन नहीं ईसाई खुले विचारों वाली ,परित्यक्ता निर्दोष तलाकशुदा , बाँझ ,दो बच्चों का बाप ,अधेड़ किंतु आकर्षक अपना मकान नौकर वाले पेंसनर को नीसंतान जीवन संगिनी चाहिए लिखें पोस्ट बाक्स फलां फलां लिखें ऐसा की लिखते लिखते ही लव हो जाए पढ़ते पढ़ते ही सब हो जाए येही तो इन विज्ञापनों की विसेषता है
फ़िर फिल्मी चुटकियाँ , मैं चूजी हो गयीं हूँ चूजी हो चाहे चूजा नवजवानों का तो बेडा गर्क कर चुकी हो ,मुझे नग्नता से परहेज नहीं यदि कहानी की मांग हो तो किंतु मैं बिकनी नहीं प्रयोग करुँगी , बलात्कार की मांग हो तो करूंगी किंतु बोल्ड किस का सीन मंजूर नहीं आदि आदि सुवचनों से पिधियन उत्प्ररित होतीं हैं
इसी तरह की तमाम बकवासों से भरीं बातें घिसे पिटे संसकारों की तरह छापतीं रहतीं है तथा फ़ौरन भुला दी जातीं है कल का अखबार हतावो आज वाला दो मिनट बाद रद्दी वाले को बुला कर बेच देना

स्त्री देह विमर्श

स्त्री पुरुष संबंधो पर राजेंद्र यादव की बेलाग टिप्पणियो ने हिन्दी जगत में हमेशा तूफान खड़ा किया है पर उनकी बातें हमेशा सोचने को विवश करती हैं१ स्त्री को हजारो साल से देह के सिवा कुछ नहीं माना गया सारे साहित्य कलाओं में स्त्री के सारे उपमान कुच- नितम्ब -कटि के ही मिलेंगे बहुत कम जगह स्त्री के मन की बात की गयी है जब तक स्त्री अपनी देह से बाहर नही निकलेगी उसके बारे मी खुद फैसला नहीं लेटी तब तक उसकी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है२ - पुरुष ने divide and rule का पहला प्रयोग स्त्री पर ही किया इससे एक हिस्सा दुसरे हिस्से पर शासन करने में मदद करता है हमनें स्त्री को दो हिस्सों में बांटा है स्त्री कमर से उपर आनंद है कविता है कमर से नीचे स्त्री नरक का द्वार है३- मूलतः पुरुष स्त्री से डरता है इसी लिए उसके बारे में अजीब कल्पनाएँ गढ़ता रहता है जैसे स्त्री सुपर सेक्स है स्त्री मे काम वासना आदमी से आठ गुना ज्यादा होती है पुरुष स्त्री को संतुष्ट नहीं कर सकता है इसी लिए वोह उसे कुचलता रहता है आज तक आपने कभी स्त्री की काम वासना बढ़ाने के लिए दवाओं का विज्ञापन देखा है इन्टरनेट की कुछ साइट्स अपवाद हो सकतीं स्त्री वास्तव में हमारे लिए आज भी देह पहले है कुछ और बाद में हम उसके अंगो के लिए क्या क्या उपमानों का प्रयोग करते हैं संस्कृत में पिन पयोधरा ,बिम्बधारी क्षीण -कटी बिल्व - स्तनी सुभगा आदि सारी संस्कृति सारी नैतिकता सारा धर्म स्त्री की देह पर ही आकर क्यों टिका हुआ है अजीब बात है स्त्री का जरा सा सरीर दिख जाए तो अश्लील है ग़लत है संस्कृति के खिलाफ है सारा धर्म और संस्कृति का ठेका सिर्फ़ स्त्री देह के ही इर्द गिर्द क्यों घूमता है समझ में नहीं आता कभी किसी पुरूष के लिए किसी ने नहीं कहा की उसकी इस हरकत से संस्कृति खतरे में है अगर आदमी बाजार में दीवार के सहारे जिप खोल कर खड़ा हो जाए तो कोई बात नहीं किंतु यदि किसी मजबूरी में औरत येही काम छिप कर भी करे तो अश्लील घनघोर अश्लील यदि आँचल से दूध पीते हुए बालक ने जरा सा आँचल हटा दिया तो स्त्री बदचलन और अश्लीलता की वाहक हो जाती है कृपया इस पर विचार करें की ये दोहरी मानसीकता कब तक चलेगी
प्रस्तुतकर्ता arun prakash पर 8:53 AM

शुक्रवार, 27 जून 2008

उपलब्धि

चेचक परविजय के बीस वर्षपूरे हुए ।यह समाचार आया है। कि इस बीच---आतंकवाद और उग्रवाद नेप्रतिवर्षहजारों कोजीवन-बंधन से मुक्त कराया है। हम प्रगति पर हैं॥ । अब इन्सानकीड़े-मकोड़ों के हाथों नहीं मारा इन्सानइन्सान के हाथ मरने का गौरव पाता है।

शनिवार, 31 मई 2008

क्या जमाना ख़राब है (गजल)

क्यों कह रहे हो तुम कि जमाना ख़राब है
आदमी भी क्या यहाँ पे कम ख़राब है

हमसे ही जमाना , ज़माने से हम नहीं
अच्छे कहाँ है हम कि जमाना ख़राब है

सर आदमी का आदमी ही काटता है यहाँ
फ़िर आदमी ही कहता है जमाना ख़राब है

दुनिया संवारने को क्या तुमने कुछ किया
जो कह रहे हो कि जमाना ख़राब है

औरो के मुंह की रोटी , आंखो के ख्वाब को
जो छिनते कहते वही , जमाना ख़राब है

क्या तुमने कभी ख़ुद के गरिबां मे है झाँका
जो हमसे कह रहे हो कि जमाना ख़राब है

क्या फैसलाकुं नजरें हाकिम ने पाई है
हर फैसले पे कहतें है जमाना ख़राब है

माना ख़राब है ये जमाना मगर कहो
किसकी वजह से ये सारा जमाना ख़राब है

फैसलाकुं -- फैसला करने वाली

जीने की बात करते हो

जीने की बात करते हो रिश्तों को तोड़ कर
क्या जिन्दगी को नापोगे किस्तों में जोड़ कर
इस जिन्दगी के जोड़ , घटना , गुणा , और भाग
शिद्दत से मिलेंगे खड़े हर एक मोड़ पड़
यूं तो भला लगे है हर इक हमसफ़र हमें
पर क्या कहा कहें वह जाए है जब दिल को तोड़ कर
बदसूरती दुनिया की नहीं देखने की चाह
मुमकिन नहीं है जीना मगर आँख फोड़कर
यादों के साँप काढ़ के फ़न हैं खड़े हुए
इस जिन्दगी की हर गली कूचे के मोड़ पर
यही इस गजल की है खूबी कि हर कोई
उठ जाता बीच मे ही सुनता छोड़ कर
जीवन की पर्त - पर्त है रख दी उधेड़ कर
दिखलाये मुझे अब कोई ये पर्त जोड़ कर

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008

महंगाई से निपटने के सरकारी उपाय

अभी कुछ दिनों पहले सरकार ने मंहगाई से निपटने के लिए जमाखोरों पर छापे डालने के लिए कहा तो मुझे बरसों पहले परसाई जी की रचना याद आ गई कतिपय परिवर्तनों के बावजूद सरकार की मानसिकता और सरकारी तंत्र की सक्रियता पर कोई अन्तर नहीं आया है प्रस्तुत है उसी रचना के पार्श्व मे यह कथा

सरकार के विचारों को सुन कर मेरा देश प्रेम जाग उठा और मैंने ठान लिया की कलक्टर साहिबा से आज मिल कर उन व्यापारियों की लिस्ट दूंगा जो माल दबा कर बैठे हें तथा महंगाई ब्रिधि कर रहे हैं चौराहे पर पुलिस का सिपाही कह रहा था साले श्रीमान जी उधर से न जा कर इधर से जाइये मैं अचरज में था की सत्ता परिवर्तन के बाद पुलिस मे इस कदर परिवर्तन कारन जानना चाहा तो पता चला की नए sp साहिब का फरमान है की पुलिस सभी से विनम्रता से सलूक करेगी तथा जल्द ही लोग इसे महसूस करेंगे तथा जनता और पुलिस में सहयोग बढ़ेगा \खैर श्रीमान माँ च्चो आदि विनम्रता सूचक सब्दों को सुनते हुए मैं जिले के कलक्टर साहिबा के कमरे मे पंहुचा तथा मैंने उनसे कहा की सरकार ने जमाखोरों के विरुद्ध अभियान मे जनता से सहयोग माँगा है तो मैं यह दो नाम दें रहा हूँ कृपा कर के इनके विरुद्ध कारवाही करिये

कलक्टर साहिबा बहुत खुश हुई तथा बोलीं आका नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरो॰ मे लिखा जायेगा सरकार की ऐसी मंशा है की ऐसे सभी लोगों का नाम जल्द ही प्रईमारी इतिहास की पुस्तकों मे छाप दिया jaayen बेसिक साहिब को जरूर नोट कर उन्होंने मैंने पूछा मादाम जी कब कारवाही होगी
unhone कहा की अभी मैं ऐ दी ऍम से जांच करुंगी यदि आपकी सूचना सही निकली टू उनको नोटिस भेजी जायेगी फ़िर उनके जबाब के आधार पर कोई कारवाही होगी
मैंने कहा इसकी क्या जरूरत है उन्होंने कहा यह सरकारी काम है उसके कुछ कायदे कानून है सरकार कायर नही है की चुपके से जा कर किसी के गोदाम में छापा मार दे सरकार टू चुनौती देगी ललकार कर वार करने में विस्वास करती है हमने चुरियाँ नही पहन रखी हैं सचमुच मी कलक्टर के हाथ में चुरियाँ नही थी नोकिया का नया सेट था
मैंने कहा की हुजुर ताब तक टू देर हो जायेगी और ये सेठ अपना माल छुपा कर इधर उधर कर देंगे टैब क्या आप उनके खाली गोदामों मी झख मारेंगी वे गुस्सा कर बोलीं सरकार उचक्का नहीं है जो उचक उचक कर कहीं भी पहुँच जाए सरकार काफी गंभीर है इस लिए कोई काम जल्दबाजी में नही करेगी ऐसे मुझे ऊपर से आर्डर मिलें हैं आप जाएं आपको इसके बारे में आपको पत्रों से बताया जायेगा
खर जो पत्रों की कापी मुझे मिली उसमे सेठो ने अपने फार्मोंको सही ठरते हुए बताया की खाद्य मंत्री के नगर आगमन पर उन्हें सम्मानित करने का उन्होंने जो काम किया था उसी से जल कर विरोधियों ने यह शिकायत की है
इसके अलावा वे एक क्लब के मेंबर भी है जहाँ कलक्टर साहिबा के सामाजिक प्रयासों के लिए मंत्री जी से सम्मानित करने की योजना बनी है विरोधी गन इसका विरोध के लिए इस ओछी हरकत पर उतर आयें है इसकी तस्दीक आप ऍम अल सी साहेब से कर सकतीं है हम सभी रूलिंग पार्टी के सी एम् साहिबा के जनम दिन पर ५५ किलो लडू बातें थे हो सकता है इससे भी येही सिद्ध होता है की इन आरोपों मे कोई दम नहीं है फिर भी आप चाहें टू जांच कर सकतीं है वैसे सरकार ने अख़बारों से ले कर चपरासी तक जो भी रेट तय किया है उसका तथा चंदे की जो भी रकम तय होती है हम उसका पालन करतें है टू हमारे पास अनाज दबाने का प्रश्न ही नहीं उठता
कलक्टर साहिबा ने हमारे ऊपर ही जांच बैठा दी की मैंने उनको गुमराह कर सरकार कीअभियान को भटकाने का प्रयास किया
नैतिक मूल्य ----' जो सरकारी नहीं है वही असरकारी है '

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

आरक्षन का आनंद्वोत्सव मनाएं

बधाई हो अर्जुन सिंह तथा सुप्रीम कोर्ट के महान जजों आज आपने एक एतिहासिक फैसला सुना कर वाकई मन को मोहने का ही काम किया है आज तक ओ बी सी के educatonal institution मे रिज़र्वेशन का कोटा न होने से देश को जो हानि हुई है उसे देश कभी नही भूल सकेगा \ लेकिन एक बात समझ में नहीं आती जब कोर्ट में रिज़र्वेशन की बात सरकार उठाती है तो आप सभी judges इसके लिए तैयार नहीं होते एक और फैसला मुझे याद आता है कोई १५ वर्ष पूर्व की बात है सुप्रीम कोर्ट ने पान मसाला व गुटका के pouch तथा डिब्बों की विक्री पर रोक लगा थी ( अम्बु मणि जी ध्यान दें ) तब कुछ देश भक्त पान व गुटका कंपनियों के मालिको ने माननीय कोर्ट से mercy अपील कर यह अनुरोध किया था की जो माल वह पहले से तैयार कर रखें हैं उसको बेचने की अनुमति दे दी जाए उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का दिल ऐसा पसीजा की फिर pouch पर प्रतिबन्ध नहीं लगा तथा अब तो गुटखा status symbol हो गया है ऊँचे लोग उंची पसंद सवाल है कितना ऊँचा क्या सबसे उच्च ? खैर सभी को इस न्याय का सम्मान तो करना ही होगा ऊँचे लोग उंची पसंद हम रजनीगंधा खाने वाले ऐरो गैरों को मुंह नहीं लगाते हैं वाकई मजा आ गया लेकिन क्रीमी लेयर को क्यों वंचित कर दिया जा रहा है मलाई तो सबको ही पसंद है तब खुरचन सिंह की खुरचन कौन चाहेगा वाह क्या सबूत है सफेदी का इस समय इस निर्णय ने महँगाई की बात को पीछे कर दिया २० २० की जीत की तरह इंडिया इज शाइनिंग