सोमवार, 10 मार्च 2008

महिला दिवस

महिला दिवस के अवसर पर एक कविता

नारी के सम्मान में देते सभी दलील ,
पोस्टर छपते रात दिन पूरे अश्लील
हैं पूरे अश्लील शर्म से आंखे झुकती ,
फिर भी नग्नता की गति न रूकती
कौन कब कली मसल दे फुलवारी के ,
आदर्शवाद का ढोल बजाते हैं नारी के
बच के रहना नारी इन नर मक्कारो से
मंचो से जो देते आह्वान देविमय नारों का

3 टिप्‍पणियां:

arvind mishra ने कहा…

जोरदार कविता -पाखंड को पेपर्दा और नारियों को खबरदार करती हुयी !

arun prakash ने कहा…

thanxx for your comments

note pad ने कहा…

kyakahun kaun sunega
kyakahun maya ke aage -
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कहिये , कहिये , हम सुन रहे हैं ......
और यह माया कौन है जो आपको पीछे धकेले हुए है ?
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CHOKHER BALI
sandoftheeye.blogspot.com