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रविवार, 13 दिसंबर 2009

अनशन की राजनीति में भेद क्यों ????



क्या अनशनो पर राजनीति करना ठीक है अभी 11 दिनो के अनशन पर भारत सरकार आन्ध्र सरकार तथा सम्पूर्ण विप्क्ष इस अनशन को समाप्त करने तथा एक अलग राज्य बनाने पर एकमत दिखाई दिये आड्वाणी जी की ्सदन मे चिन्तातुर मुख मुद्रा को देख कर मै खुद बडी चिन्ता मे पड गया इस उम्र मे इतनी चिन्ता ठीक नही है लेकिन एक अनशन जो गत गत दस वर्षो से एक महिला एक कानून के खिलाफ़ कर रही है उसके लिये कोई चिन्ता नही है और ना ही उस कानून मे आवश्यक सन्शोधन का ही आश्वासन ही सरकार कर रही है क्या व्यक्ति पर एक कानून इतना अधिक मह्त्वपूर्ण हो गया है कि सरकार इसे बद्लना नही चाह्ती
विगत दिनो मानवाधिकार दिवस , नोबल पुरस्कार तथा तेलन्गाना के लिये अनशन ये तीन घट्नाये हुई है लेकिन मणिपुर के इस अन्हिसक सत्याग्रह को कही भी ना तो मान्यता हि मिल रही है और ना ही विपक्ष चिन्तित दिख रहा है क्या इस लिये कि मणिपुर छोटा राज्य है तथा उसकी खबरो पर ज्यादा ध्यान दिया जाना लोग उचित नही समझते बात तभी समझ मे आती है जब आन््दोलन हिन्सक हो जाता है
. सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम 1958 (एएफएसपीए) भारतीय सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार अनुदान के लिए गिरफ्तारी, हिरासत में, पूछताछ या दण्ड से मुक्ति से मात्र संदेह पर किसी भी व्यक्ति को मार डालते हैं. मणिपुर (जहां ki शर्मिला निवासी है) और उसके उत्तर के पड़ोसी राज्यों पूर्वी भारत इस अधिनियम के अधीन लगभग आधी सदी के लिए गुजर रहा है. 2 नवम्बर 2000 के दिन मणिपुर मे मोलाम के निकट आतंकवादियों ने सशस्त्र बलो पर बम फ़ेका जिसकी जबाबी कार्यवाही मे सशस्त्र बलो ने दस नागरिकों की गोली मार कर हत्या कर दी
ऐसा नही है कि यह कोई नयी घटना थी मणिपुरियों के लिये अतीत मे ऐसी कई घट्नाये हो चुकी थी शर्मिला इस घटना के विरुद्ध एक प्रदर्शन मे शामिल होने गयी थी लेकिन इस घट्ना ने इस कवियत्री के मानस पर ऐसा असर छोड़ा कि वह वहकओ नवम्बर 2000 को इस दमनकारी कानून को समाप्त करने के लिये अनशन पर बैठ गयी तब से उसे आत्महत्या करने के प्रयास मे गिरफ़्तार कर लिया गया तथा जेल मे डाल दिया गया जहाँ उसने जमानत लेने से भी इन्कार कर दिया तब से एक अन्तहीन सन्घर्ष शुरू हो गया अब उसके अनशन को तोडने के लिये उसे जबरदस्ती नाक के रास्ते से भोजन दिया जाता है अदालत रिहा करती है वह फ़िर अनशन पर बैठती है तथा फ़िर उसे गिरफ़्तार कर लिया जाता है उसके नाक के रास्ते एक पाइप लगा दिया गया है अस्पताल व जेल तथा यन्त्रणादायक इस प्रक्रिया लगातार 10वे वर्ष मे प्रवेश कर चुका है 30 वर्ष की आयु से जारी अनशन ने शर्मिला के शरीर को कमजोर कर दिया है उसका चेहरा देखने पर सलीब से लट्के ईसा मसीह की तस्वीर की याद आती है
उसका शरीर भले ही कमजोर हो गया है लेकिन उसके इरादे फ़ौलाद की तरह मजबू्त है इस सन्घर्ष मे उसकी मां ने भी अपना योग्दान दिया है यद्यपि वह पढी लिखी नही है लेकिन दमन के कानून के प्रतिकार को बखूबी समझती है उसने इन दस वर्षो मे वह इस भय से कि कही उसके आन्सू शर्मिला के सन्कल्प को कमजोर न कर दे इस लिये उसने यह फ़ैसला किया है कि जब तक उसका उद्देश्य पूरा नही हो जाता तब तक वह उसके सामने नही आयेगी गजब की सन्कल्प शक्ति माँ व बेटी दोनो की है इस जज्बे को शत शत नमन जो लोकहित के सन्घर्ष मे अपनी खुशियो की आहुति दे रही है
इरोम चारू शर्मिला इस लडाई को आध्यात्मिक मानती है उनके अनुसार मेरा aअनशन मणिपुर के लोगों की ओर से है. This is not a personal battle – this is symbolic. यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है - यह प्रतीकात्मक है.”, यह सत्य, प्रेम और शांति का प्रतीक 'है, .
इस कानून के खिलाफ व्यापक विरोध के बाद केंद्र ने विशेषज्ञ के पूर्व न्यायाधीश जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में 2004 में इस कानून की समीक्षा समिति गठित. किया था पैनल ने 2005 मे केंद्र को उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की.commission had recommended the law should be repealed (" The Armed Forces (Special Powers) Act, 1958, should be repealed ," it notes in its recommendations. " The Act is too sketchy, too bald and quite inadequate in several particulars "..)

इस अहिन्सक आन्दोलन के बारे मे इस लिन्क पर http://manipurfreedom.org और जानकारी पाई जा सकती है

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सरकार सुप्रीम कोर्ट समलैंगिकता

काफी पशोपेश के बाद सरकार ने उच्चतम न्यायालय के समलैंगिकता के प्रश्न पर अपना रुख स्पष्ट करने के सवालपर चुप्पी साध ली तथा कोर्ट को सहयोग करने की बात कह दी कुछ दिन पूर्व ऐसा लगता था की सरकार में बैठेलोग खास तौर से मोइली साहिब इसके बारे में स्पष्ट रूख करेंगे लेकिन लगता है की सरकार पर समलिंगी समर्थकहोने का ठप्पा न लग जाए इस कारन से और इससे वोट बैंक भी नही जुडा है इस कारन से सरकार पीछे हट गई मेरेख़याल से वोट बैंक तो बड़ा है लेकिन उसको लेकर कोई वारिस बन कर दल सामने नहीं है इस मुद्दे पर विचारक जगदीश चतुर्वेदी का यह लेखांश पठनीय व विचारणीय है
"अधिकांश राजनीतिक दल भी अपनी तलवारें लेकर मीडिया के मैदान में आ गए हैं और इस सबसे समलैंगिकताके बारे में गलत समझ पैदा की जा रही है। हिन्दी उर्दू की साझा परंपरा में दो महत्वपूर्ण लेखिकाएं हैं जिन्होंनेसमलैंगिकता के सवाल पर बेहतरीन रचनाएं लिखी हैं। उर्दू में इस्मत चुगताई ने सन 1941 में 'लिहाफ' कहानीलिखी थी और हिन्दी में पहला लेस्बियन उपन्यास आशा सहाय ने 'एकाकिनी' के नाम से 1947 में प्रकाशित कियाथा। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार शिवपूजन सहाय ने इस उपन्यास की भूमिका लिखी थी। असल में समलैगिंकतातयशुदा लिंग विभाजन के आधार पर प्रेम की धारणा को चुनौती है। समलैंगिकों को सामाजिक व्यवस्था में सबसेज्यादा उत्पीड़न और अपमान झेलना पडता है। हमारे समाज में सेक्स और प्रेम दोनों ही उत्पीड़न करने के बहानेहैं। इसमें भी यदि समलैंगिक प्रेम है तो खैर नहीं। समलैंगिकता का देहभोग से कम और एक ही समानधर्मा लिंग केसाथ प्रेम का संबंध ज्यादा है। समलैंगिक संसार अनुभूतियों का संसार है। यह पाप या पुण्य की कोटि से परे है।यहस्वाभाविक संसार है। यह दो प्राणियों या मित्रों का मिलना है। इसी प्रसंग में 'काम' या सेक्स की भारतीय धारणा परविचार करना सही होगा। वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' के दूसरे अध्याय में 'काम' की धारणा पेश करते हुए लिखा है '' स्पर्शविशेषविषयात्वस्याभिमाननिकसुखानुबिद्धा फलवत्यर्थ प्रतीति : प्राधान्यात्काम:।'' अर्थातचुम्बन,आलिंगन,प्रासंगिक सुख के साथ गाल,स्तन,नितम्ब आदि विशेष अंगों के स्पर्श से आनन्द की जो प्राप्तिहोती है वह 'काम' है। इस प्रसंग में ही दूसरी महत्वपूर्ण बात जो वात्स्यायन ने रेखांकित की है कि कामशास्त्र कोकिसी निपुण व्यक्ति से जानना चाहिए।
मीडिया में बार बार ऐसी बातें कही जा रही हैं जिससे यह आभास पैदा किया जा रहा है कि सेक्स तो स्वाभाविकहोता है उसके लिए शिक्षा की कोई जरूरत नहीं है,देखो पशु भी सेक्स करते हैं वे तो ज्ञान अर्जित करके सेक्स नहींकरते। वात्स्यायन ने इस धारणा को भी चुनौती दी है। वात्स्यायन का मानना था सेक्स शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति कोदी जानी चाहिए और सेक्स शिक्षा से व्यक्ति भय,लज्जा, और पराधीनता से मुक्त होता है। आनंद ,सुखी औरसम्पन्न बनता है। मजेदार बात यह है कि जो लोग समलैंगिकता के सवाल पर गुलगपाडा मचा रहे हैं वे ही सेक्सशिक्षा का भी विरोध कर रहे हैं। वात्स्यायन के टीकाकारों ने लिखा है सेक्स शिक्षा से दायित्वबोध, परोपकार औरउदात्त भावों का जन्म होता है। अपने सहचर के प्रति श्रद्धा,विश्वास, हित कामना और अनुराग में व़ृद्धि होती है।सेक्स शिक्षा के अभाव में अनबन,कलह, असन्तोष, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार आदि पैदा होता है। जो लोगसमलैंगिकता के सवाल पर दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय से गुस्से में तनतनाए मीडिया में बोल रहे हैं अथवाइसके बुरे नतीजों के बारे में आगाह कर रहे हैं उनमें अधिकांश फंडामेंटलिस्ट हैं अथवा तथाकथित लिबरल दल केलोग हैं। फंडामेंटलिस्टों और साम्प्रदायिक संगठनों या धार्मिक संगठनो के नेताओं से सिर्फ इतना ही निवेदन है किवे कृपया अपने धर्म को जाकर संभालें ,सेक्स और प्रेम उनका क्षेत्र नहीं है।"
समलैंगिकता असल में पहचान,अनुभूति और मानवाधिकार का मामला है,यह देह व्यापार अथवा देहभोग तक हीसीमित मामला नहीं है। समलैंगिक अधिकार का सवाल मूलत: पितृसत्तात्मक विचारधारा के खिलाफ खुलीबगावत है। यह राजनीतिक नजरिया है। पुरूष वर्चस्व का विरोध करना इसका प्रधान लक्ष्य है। समलैंगिक हमेशाअपनी काम संबंधी भूमिका का अतिक्रमण करता है। समलैंगिक एक नयी परिभाषा और नयी
‍‍‍ ‍‍ ‍‍ ‍‍‍‍ ‍‍ ‍‍ ‍‍‍ ‍‍‍ ‍‍‍‍ ‍‍‍‍ भावानुभूति कों सामने लेकर आए हैं
यह ऐसा अनुभव है जिसे सामान्य जीवन में महसूस करना संभव नहीं है। फलत: समलैंगिक हमें असामान्यलगता है ,समाज के बाहर प्रतीत होता है।यही वह विचारधारात्मक बिंदु है जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहचानाहै। इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि पहचान के सवाल जब भी उठते हैं सामाजिक हंगामा होता है परंपरापंथी सड़कोंपर आ जाते हैं। किंतु बाद में वे भी ठंडे पड़ जाते हैं। समलैंगिकता के सवाल पर भी यही होगा। समलैंगिकता सेपरिवार टूटने वाले नहीं है और युवावर्ग पथभ्रष्ट होने वाला नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला सिर्फ एकफैसला नहीं है बल्कि असाधारण फैसला हैसमलैंगिकता के सवाल पर कानूनी फैसला हजारों आत्माओं की त्रासदयात्रा के गर्भ से पैदा हुआ है। यह समलैंगिकों के लिए नव्य उदार वातावरण की मलहम है। यह लोकतांत्रिक फैसला है । इसका व्यापक स्वागत किया जाना चाहिए साथ ही इस संबंध में कानूनी फेरबदल भी किया जानाचाहिए।"
देखना है
‍‍ ‍‍‍‍ ‍ ‍‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍ सुप्रीम कोर्ट के paale में गेंद को कौनगोल करता है सरकार तो ऑफ़ साइड हो चुकी है
जगदीश चतुर्वेदी से साभार

पाक ब्लागरो का भदेसपन

पूर्व के पोस्ट श्राद्ध कैसे कैसे पोस्ट कराने के बाद नेट पर घूमते घूमते एक समाचार पर नजर पड़ी की भारत पाकसीमा पर २००० वेश्याएं भारतीय फौजों के अवसाद दूर कराने के लिए लगाई जा रहीं है
इस ख़बर को पढ़ कर मैं एक बार चौंका कि माना कि सैनिक अवसाद में रहते हैं तथा आत्म हत्याएं भी करते हैंजैसा कि दुर्खिम ने अपने अध्ययन में भी यह सिध्ध किया है कि परिवार से दूर एकाकी जीवन जी रहे सैनिकों मेंआत्महत्या कि प्रवृत्ति अधिक होती है भारतीय सैनिक इसके अपवाद नहीं , लेकिन किसी देश ने सैनिकों के जीवनको बचाने के लिए ऐसा अभिनव प्रयोग किया हो ऐसा मैंने कहीं पढ़ा नहीं था
लगे हाथ जब मैं इस साईट pakalerts.wordpress.com पर गया तो पूरी ख़बर विस्तार से पढ़ी सोचने लगा किपाक सेना इसके जबाब में क्या बार्डर पर जनखों कि फौज खड़ा करेगी जिससे उनके फौजियों का मनोबल बढ़ता रहे
दूसरे दिन इस ख़बर कि हकीकत जानने के लिए जब कई साईट देखा तो पता चला कि महिला बी एस ऍफ़ के २०००महिला सैनिक इंडो पाक बार्डर पर तैनात हो रहीं हैं जिसकी प्रतिक्रिया में यह सब लिखा गया है
इसी साईट पर हिन्दुओं के कर्म काण्ड के कुछ बड़े ही घ्रृणास्पद चित्र जो लाशों के अन्तिम क्रिया के दौरान नदियों मेंया आस पास बिखेरे रहते हैं उसे दिखाया गया है इन चित्रों को प्रकाशित कराने के पीछे एक ही मकसद था हिन्दुओंके कर्म काण्ड कि खिल्ली उडाना


लेकिन यह सत्य कड़वा है हमें मृतक व्यक्तियों के अन्तिम संस्कार करने के पूर्व यह अवश्य ध्यान देना होगा किउसके अधजले अवशेष न बचे जिसे ये नाटकबाज दिखा दिखा कर किसी धर्म का मजाक न बना सके चूँकि किसीमानव कि लाश कि नुमाइश नही होनी चाहिए इसलिए हम सबको इसका विरोध इस साईट पर करना ही चाहिएवैसे इस साईट पर कमेन्ट आदि पढ़ कर ऐसा लगा कि ये जान बुझ कर हिन्दुओं को भला बुरा कहने कि धर्मान्धतासे प्रेरित है यहाँ स्वच्छ संदेश वालों को स्वच्छ संदेश देना चाहिए कि क्या इस्लाम में मृत लाशों कि बीभत्सता कोदिखने कि कोई विवशता है क्या ?????
क्या कहूँ ऐसे ओछी मानसिकता वाले पाक ब्लागरों को ......
औरों को अमृत देने का दंभ नहीं अच्छा है
अपने मन का विष यदि पच जाए तो काफ़ी है

बुधवार, 5 अगस्त 2009

सास द्वारा लात मारना बहू के प्रति क्रूरता नहीं

सास- बहू के जगत्व्यापी शाश्वत झगडो के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सास के बहू को लात मारने को क्रूरता की श्रेणी में नहीं माना है बल्कि इसे अन्य अपराधों की श्रेणी में माना जा सकता है वैसे भी भारतीय संस्कृति में माता ,पिता गुरु व पति के चरण रज स्वर्ग दिलाने का मध्यम है इस्लाम में भी माँ के पैर तलों जन्नत की बात कही गई है फ़िर उस चरण से पिटाई तो आत्मकारक मोक्षदायिनी है तथा संस्कृति की पोषक है उसे क्रूर कैसे माना जा सकता है यही सन्दर्भ सासू माता के मामले में भी लागू होता है
सास बहू के सीरिअल बनाने वाले चाहे तो इस घटना से २० - २५ एपिसोड की कहानी तो आसानी से बना कर जोड़ ही सकते हैं जिसमे अंत में सास को विजय मिलती तथा बहू को शर्मिंदा होते तथा माफ़ी माँगते अंत में दिखाया जाए तथा सास उसे क्षमा करते हुए कहे कि बहू वो तो मेरा कर्तव्य था जो मैंने निभाया तुमको इसमे खामी लगी खैर अब सब कुछ ठीक हो गया जय श्री राधे कृष्ण की

पूरी ख़बर नीचे सन्दर्भों के साथ पढ़ें


सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी (बहू) को अपीलकर्ता सास द्वारा पैर से ठोकर मारने और उसकी माता को झूठी बताने पर उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत दंडित नहीं किया जा सकता है बल्कि इसे अन्य अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा।

पीठ ने कहा कि इसी प्रकार बहू द्वारा अपीलकर्ता सास पर अपने पुत्र का कान भरने, प्रयोग में लाए गए कपड़े और हमेशा नसीहत देने जैसे मामलों को भारतीय दंड संहिता की धारा 489ए तक दंडनीय अपराध नहीं माना जाएगा। पीठ ने कहा कि यहां तक की पुत्र की दूसरी शादी करने और तलाक की धमकी देने को भी आईपीसी की धारा 498ए के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत किसी महिला के खिलाफ क्रूरता के मामले में उसके पति या पति के रिश्तेदार को दंडित किया जा सकता है और सजा की अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है और उसे अर्थ दंड भी लगाई जा सकती है।

इस मामले में, बहू मोनिका ने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले अपने पति विकास शर्मा, उसके माता-पिता भास्कर लान एवं विमला के खिलाफ क्रूरता तथा विश्वास भंग करने का मामला दर्ज किया था। मोनिका विकास की दूसरी पत्नी है। विकास ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया था जिससे उसके दो बच्चे हैं। शादी के कुछ समय बाद विकास और मोनिका के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए और मेलमिलाप की तमाम कोशिशों के विफल होने के बाद मोनिका ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर आईपीसी की धारा 498ए (क्रूरता) और धारा 406 (विश्वास भंग) के तहत मामला दर्ज किया।

पटियाला कोर्ट ने मोनिका के पति और ससुरात पक्ष के खिलाफ समन जारी कर दिया था। जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के खिलाफ पति और ससुराल पक्ष की अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीमकोर्ट के समक्ष आया था।
एक बार फ़िर जय हो कहने का मन कर रहा है लेकिन क्यों कहूँ यदि कह दिया तो मेरी माँ ही खुश हो सकती है और तो नहीं

रविवार, 2 अगस्त 2009

जय हो सुप्रीम कोर्ट की

इन दिनों मै जब भी ब्लॉग पर कुछ लिखने बैठता हूँ तो उसी समय कुछ ऐसे एतिहासिक फैसले हो जाते हैं कि न चाहते हुए भी उसकी ख़बर पर ही लिखने को बाध्य होना पड़ जाता है बहुत पहले एक सरकारी मीटिंग में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि कोर्ट का चले तो वह इस बात पर भी स्टे लगा सकती है कि किसी बच्चे का जन्म हो अथवा न हो हमें तो हर हाल में स्टे आदेशों का पालन करना है तब यह बात हँसी में उडा दी गई लेकिन रेप कि हुई शिकार लड़की को माँ बनाना /बनना चाहिए इस पर न्यायालय के फैसले से हतप्रभ अवश्य हूँ न्यायालय का सम्मान करते हुए इस न्यूज़ पर नजर डालें तो वकीलों के तर्क व उस पर फसलों कि एक बानगी मिलाती है कि किस प्रकार वकील गण इन फसलों में अहम् भूमिका निभाते हैं
सौरभ द्विवेदी से साभार
सुप्रीम कोर्ट के तीन जज
वकील की दलीलों के कायल हो गए और फैसला दे दिया कि रेप की शिकार हुई लड़की को भी मा

ं बनने का हक है। हक शब्द सुनते ही भावनाएं उमड़ने लगती हैं
, रक्षकों के कान चौकन्मगर अहम सवाल यह है कि क्या मानसिक अस्थिरता की शिकार उस लड़की ने यह हक मांगा है ! क्या वह अपनी इच्छा से मां बनी है ?

किसी वहशी ने नारी निकेतन चंडीगढ़ में उसके साथ रेप किया , गर्भ ठहर गया और अब वकील साहिबा दलील दे रही हैं कि मां बनना उसका हक है और अदालत को उससे यह हक नहीं छीनना चाहिए। हम भी इस दलील के कायल हैं कि निजी मामलों में स्टेट या अदालत का कम से कम हस्तक्षेप हो। मगर अहम सवाल यह है कि यहां उस लड़की की बात हो रही है , जो समाज और स्टेट की जिम्मेदारी है। वह लड़की अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती और की निकेतन में रहकर जीवन गुजार रही है। रेप के मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी माना था कि इस स्थिति में अबॉर्शन ही एकमात्र विकल्प है , मगर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया।

महिला के अबॉर्शन का विरोध कर रहीं वकील साहिबा ने तर्क दिया कि वह पहले से ही इस दुनिया में अकेली है और इस बच्चे के पैदा होने से उसे खालिस अपना कोई मिल जाएगा। बहुत ही अच्छा तर्क है। वैसे भी मां सुनते ही हमारी भावुकता हिलोरे लेने लगती है। सही बात है , आखिर उस बेचारी औरत का कोई तो अपना होगा। मगर , इस सवाल का जवाब कौन देगा कि मानसिक रुप से अस्थिर इस औरत के बच्चे को पालेगा कौन , स्टेट , अदालत या दूसरी कोई सरकारी संस्था ?

अगर बच्चा बेटी हुआ तो उसे नारी निकेतन में सक्रिय वहशियों से कौन बचाएगा ? कहीं उसका भी रेप हो गया तो ? हो सकता है कि आपको मेरा तर्क अतिवादी लगे मगर क्या यह सच नहीं है कि बच्चा अनाथों की तरह , दूसरों की दया बटोरता पलेगा ? और जब डॉक्टरों के तर्क से सहमत होकर अदालत भी यह मान रही है कि यह महिला अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती , तो वह बच्चे की परवरिश कैसे करेगी ? कैसे उसे अपनी ममता की छांह में लेगी और दुनिया की धूप से बचाएगी ?

राखी सावंत और राहुल गांधी पर बहस करने वाले हम भारतीयों को यह मसला गैरजरूरी लगता है ? मां दुनिया का सबसे सुंदर और पवित्र शब्द है और जन्म देना प्रकृति को विस्तार देने जैसा। मगर तभी जब यह अपनी इच्छा से किया गया हो , दुर्घटनावश या बिना सहमति के नहीं। अगर लड़की मानसिक रूप से स्वस्थ होती और किन्हीं परिस्थितियों में हुए रेप के चलते उसे गर्भ ठहरता , तो यह पूरी तरह से उसका अपना फैसला होता कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं।


गुरुवार, 23 जुलाई 2009

गे पर इतनी है तौबा क्यों

होमोसेक्शुऐलिटी के खिलाफ जो सबसे बड़ा आरोप है, वह यह कि यह अननैचरल है। ऊपरी तौर पर यह आरोप सही लगता है क्योंकि मनुष्य ही नहीं, बाकी जीव-जंतुओं में भी सृष्टि ने नर और मादा अलग-अलग बनाए हैं – उनके शरीर अलग-अलग हैं, उनके सेक्शुअल अंग अलग-अलग हैं। वे एक-दूसरे के संपर्क में आने पर उत्तेजित होते हैं और एक-दूसरे को संतुष्ट करते हैं। और ऐसा करने में नेचर (या भगवान अगर आप आस्तिक हैं तो) का सबसे बड़ा मकसद सृष्टि को कायम रखना है।

अगर स्त्री-पुरुष में सेक्स ही नैचरल है और जो यह नहीं करता, वह अननैचरल और मानसिक तौर पर बीमार है तो फिर ये सारे ब्रह्मचारी क्या हैं ? वे लोग जो सेक्स से ही दूर रहते हैं (या दूर रहने का ढोंग करते हैं), उन्हें तो हमारा समाज पूजता है, उनकी चरणसेवा करता है, उनके गुणगान करता है। तब किसी को याद नहीं आता कि ये लोग प्रकृति के नियमों के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह कैसा न्याय है कि ब्रह्मचारियों के अननैचरल बिहैवियर की हम पूजा करते हैं और होमोसेक्शुल्स के अप्राकृतिक व्यवहार की निंदा।
मजे की बात है कि धार्मिक संतो ने सबसे पहले इसका jordar विरोध किया है जैसे उनके मठों पर समलिंगियों ने हमला बोल दिया है इस कानून के आने से मठो के अस्तित्व पर क्यों खतरा लग रहा है ????? समाज को ही निर्णय लेने दे ,,कानूनी मान्यता मिल जाने मात्र से समाज इसे स्वीकार कर ले गा ???

अगर आप शादीशुदा हैं तो क्या आप नेचर के नियमों का पालन कर रहे हैं? आखिर किन कुत्ते-बिल्लियों में शादी होती है? किन मछलियों और मेढकों में एक ही पति या पत्नी से बंधे रहने की अनिवार्यता है? नहीं है। तो इसका मतलब यही हुआ कि शादी करके हम नेचर के नियम को तोड़ रहे हैं। लेकिन क्या हम उसे गलत मानते हैं? क्या शादी करने वाले को नीची नज़रों से देखते हैं?

मैं नहीं कह रहा कि शादी गलत है। समाज और परिवार के विकास में विवाह की ज़रूरत है और शायद आगे भी रहेगी। लेकिन उससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह नैचरल है। ठीक वैसे ही जैसे कि हमारा कपड़े पहनना नैचरल नहीं है, गुफाओं की जगह एयरकंडिशंड घरों में रहना नैचरल नहीं है, पैदल चलने के बजाय कार आ बस में चलना नैचरल नहीं है। यानी हम ऐसे बहुत से काम करते हैं जो नैचरल नहीं है। अपनी इच्छा और सुविधा के लिए हमने नेचर के नियमों को तोड़ा है, उसके उलटे जाकर काम किया है और आगे भी करेंगे।

कहने का मतलब यह कि अगर कोई नेचर के खिलाफ काम कर रहा है तो हम उसे गलत नहीं कह सकते। जैसे कोई ब्रह्मचारी सेक्स से दूर रहना चाहता तो मैं कौन होता हूं जो उसे कहूं कि नहीं भाई, तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। वैसे ही अगर कोई पुरुष किसी पुरुष के साथ प्यार या सहवास कर रहा है, तब भी मेरा कोई हक नहीं बनता कि मैं उसे रोकूं कि तू गलत कर रहा है। न मेरा न आपका।

होमोसेक्शुऐलिटी पर एक आरोप यह भी है कि यह प्रवृत्ति भारतीय रुझानों के खिलाफ है और पश्चिम से इंपोर्टिड है। इस शिकायत के दो हिस्से हैं। पहले भारतीय परंपरा की बात करें तो यह कहना बहुत मुश्किल है कि भारत में यह कबसे है और कितनी व्यापक है क्योंकि आम तौर पर लोग अपना यह रुझान उजागर नहीं करते। लेकिन भारतीय यौन दर्शन की दो महत्वपूर्ण विरासतों – कामसूत्र और खजुराहो की मूर्तियां इस बात की गवाह हैं कि समलैंगिकता हमारे देश के लिए कोई अनूठी अवधारणा नहीं है।
फ़िर ये हाय तौबा क्यों / भारतीय संस्कृति व समाज इतना बोल्ड है कि ख़ुद ही इसका इलाज ढूंढ लेगा


नव भारत से साभार

शुक्रवार, 22 मई 2009

प्रेम जोशी तेरे जज्बे को सलाम

कई दिन पहले दूरदर्शन पर एक फीचर देखने को मिला जिसमे श्री प्रेम जोशी नामक रिटायर्ड व्यक्ति के बृक्ष प्रेम को दिखाया गया था इंदौर मध्य प्रदेश के रहने वाले प्रेम जोशी ने पेडो को बचाने का एक नायब तरीका ढूंढ निकला है
इंदौर में विकास के नाम पर पुराने पीपल बरगद आदि बृक्षों को कटता देख कर जोशी जी ने इन पेडो को काटने के पूर्व ही इंदौर के बाहरी इलाकों में पुनः लगाने यानी retransplant करना शुरू कर दिया इन्होने एक संघठन बना रखा है जिसमे अपने संसाधनों के द्वारा जे सी बी मशीन खरीदी है तथा पेड़ को काटने के पूर्व उसकी बाकायदा पूजा करके उसके भारी वजन आदि को ध्यान में रख कर उसकी डालियों की छंटाई कर उसे जड़ से उखाड़ कर ट्रक्टर पर लाद कर अन्यत्र स्थान पर जिसका चयन वे स्वयं करते हैं वहां इसे पुनः स्थापित कर देते हैं
इस प्रकार इनके द्वारा करीब ११० ऐसे पुराने लगभग १०० - २०० वर्ष पुराने विशालकाय पेडो को बचाया है तथा उन्हें पुनर्जीवित कर इंदौर के बाहरी इलाकों के खाली स्थान पर लगाया है तथा इसके लिए इन्होने शहर में ही कई लोगों को प्रेरित करने का कार्य किया है जो निःस्वार्थ भावः से ये पुनीत कार्य कर रहे हैं , आज जब विकास के नाम पर पेड़ कट रहे हैं तथा उस स्थान पर कोई पेड़ भी नहीं लगता है तथा गर्मी के दिनों में छाया के लिए लोगों को अपने तथा अपनी मंहगी गाड़ियों को किसी ठूंठ से झाडी नुमा कथित पेड़ की आड़ में खड़ा करता देखता हूँ तो मुझे प्रेम जोशी के जज्बे को दाद देने का मन करता है
सड़को को ४ लेन व ६ लेन बनने के नाम पर छायादार वृक्षों को काट दिया गया तथा सडको के बीच में कनेर तथा मदार के जंगली झाडों को देख कर सरकारी सोच पर शर्म आती है आज जी टी रोड पर यही नजारा है तथा NHAI हर १०० किमी पर विकास के नाम पर पैसे वसूल कर रही है क्या इन्हे पेडो के महत्व समझाने के लिए कोई दूसरा रास्ता अख्तियार करना होगा गर्मी के दिनों में जी टी रोड पर यात्रा करते हुए लोगों की आँखे कब खुलेंगी

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

पाक का खटराग हमले भारत सरकार ने कराए थे

पाकिस्तान मीडिया की ख़बर सुन कर ऐसा लगा की काश कोई उधम सिंह जैसा क्रन्तिकारी रहता तो इन फटे मुंह और न जाने क्या क्या फटे अंगो वाले दुर्जनों कि ऐसी तैसी कर देता तो ये शरारत बंद हो जाती वास्तव में हमारे मनीषियों ने ठीक ही कहा है की शठे शाठ्यम समाचरेत | हिम्मत देखें ( खड्ग हस्तेन दुर्जन )पूरे समाचार की विडियो क्लिप hotklix.com पर देखें यहाँ zaid-hamid फरमा रहे है कि भारत ने अमेरिका के तर्ज पर ९/११ करना चाहा तो लेकिन उनका फ्राड बेनकाब हो गया | आतंकवादियों कि सूरत पाकिस्तानियों से नहीं मिलती
सूरत के लिए तो इनकी माँ से ही पूछना पड़ेगा कि इनकी पैदाइश १९७१ कि जंग के दौरान फटे बमों के बीच अप्राकृतिक रूप से तो नहीं हो गई थी| क्या पाकिस्तानियों के मुंह में बड़ी सी लकीर होती है जैसे नवाज शरीफ साहब के मुंह पर है या आम पाकिस्तानियों की शक्लें लंगूरों कि तरह होती हैं ये इन जनाब ने नहीं बताई
ये कहतें है कि हमले भारत सरकार ने मुम्बई में करवाए , करकरे का कत्ल भारतीय सेना व बी जे पी ने करवाए क्योंकि वह उसका पर्दाफाश करने ही वाले थे
कौन बताये कि यदि हमला करना ही होता तो तुम्हारे यहाँ जो फिदायीन हमले होते है उसके दस गुने हमले हो चुके होते
शिशुपाल कि कहानी पढो सबक मिल जाएगा कि भगवान् कृष्ण को भी उस आततायी का संहार करने के लिए उसकी सौ गालियाँ सहनी पड़ी थीं हम लोग श्रीकृष्ण कि तरह भगवान् तो नहीं है लेकिन पचास के आस पास आंकडो तक पहुंचाते ही तुम्हारा संहार हो जाएगा | मनमोहन कि गिनती और अंक गणित कमजोर है न अमर सिंह उसका हिसाब किताब देख रहे है जिस दिन सही गिनती हो जायेगी उस दिन पता चलेगा zaid hamid कि भारतीय फौज के हमले कैसे होतें है