शनिवार, 31 मई 2008

जीने की बात करते हो

जीने की बात करते हो रिश्तों को तोड़ कर
क्या जिन्दगी को नापोगे किस्तों में जोड़ कर
इस जिन्दगी के जोड़ , घटना , गुणा , और भाग
शिद्दत से मिलेंगे खड़े हर एक मोड़ पड़
यूं तो भला लगे है हर इक हमसफ़र हमें
पर क्या कहा कहें वह जाए है जब दिल को तोड़ कर
बदसूरती दुनिया की नहीं देखने की चाह
मुमकिन नहीं है जीना मगर आँख फोड़कर
यादों के साँप काढ़ के फ़न हैं खड़े हुए
इस जिन्दगी की हर गली कूचे के मोड़ पर
यही इस गजल की है खूबी कि हर कोई
उठ जाता बीच मे ही सुनता छोड़ कर
जीवन की पर्त - पर्त है रख दी उधेड़ कर
दिखलाये मुझे अब कोई ये पर्त जोड़ कर

1 टिप्पणी:

arvind mishra ने कहा…

बहूत खूब ,आपका कवि मन अब कुलांचे मारने को बेताब है -इसे अब बेलगाम छोडिये ,नही तो आप को ही यह लगाम लगा देगी ,क्या बढिया लाईनें मारी है -इसमे कुछ देवरिया भी होगा ?