शनिवार, 7 मार्च 2009

महिला दिवस के नाम पर चिंतन

महिला दिवस के अवसर पर भारतीय पक्ष की वेब साईट पर छपे इस लेख को आभार प्रदर्शन के साथ इस ब्लाग पर इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि इस पर सही अर्थों में चिंतन होना चाहिए

स्त्री, जो सदा से जीवन का मूल आधार रही है, उसे पुरुष ने कभी भी यथोचित स्थान नहीं प्राप्त करने दिया। यदि पुरुष ने स्त्री को कभी आदर भी दिया है या पूजा भी की है तो वह है उसका मां का रूप। पर सच तो यह है कि स्त्री मां होने से पहले भी कुछ है और वह है उसका स्त्री होना।

बीते युग से आज की तुलना करें तो स्त्री के दायरे फैले जरूर हैं, सीमाएं टूटी जरूर हैं, लेकिन सीमाएं मिटी नहीं हैं। कुछ हद तक सीमाओं का व सीमाओं में स्त्री का रहना उचित है, परंतु दुख की बात यह है कि यह सीमाएं पुरुष तय करता है।

जहां एक ओर स्त्री विमर्श पर ढेरों किताबें लिखी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर महिला दिवस का विज्ञापन अखबारों में अपनी जगह ढूंढने का वर्ष भर इंतजार करता रहता है। भारत भूमि को हम भले ही मां का दर्जा दे दें परंतु इस पर रहने वाला समाज सदा पुरुष प्रधान ही रहेगा, यह सोच केवल सदियों नहीं बल्कि युगों पुरानी है। युगों पुरानी होने के कारण ही शायद ये इतनी गहराई से समाज की नस-नस में समाई है।

देवताओं के इस देश में श्रीराम जी ने अपने नाम से पूर्व सीता का नाम लेने अर्थात् सियाराम बोलने को कहा। वहीं श्री कृष्ण ने अपने नाम से पहले राधारानी का नाम लेने को कहा, अर्थात् राधेश्याम के रूप में खुद को याद करने को कहा। लेकिन स्त्री के प्रति सम्मान की यह भावना आज आम जनजीवन में देखने को नहीं मिलती। लगता है जैसे स्त्री केवल नाम के लिए ही नाम से पहले जोड़ी गई है। हालात तो यह है कि बिना पुरुष के उपनाम के स्त्री का कोई अपना अस्तित्व ही नहीं माना जाता।

स्त्री पहचानी ही अपने उपनाम से जाती है कि वह किसकी पत्नी है, उसका सरनेम क्या है। और स्त्री यदि केवल अपना नाम ही बताए कोई उपनाम नहीं लगाए तो कई सवालों के घेरे में आ जाती है। उसका चरित्र संदेह के कटघरे में आ जाता है। यही नहीं किसी बच्चे के स्कूल-कालेज आदि के दाखिले के मामले में पिता यानी पुरुष के नाम को न केवल प्राथमिकता दी जाती है बल्कि उसका विवरण ही महत्व रखता है। रामायण एवं गीता जैसे महान ग्रंथ जिनकी हम पूजा करते व मिसाल देते हैं, उसकी बुनियाद में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीता एवं द्रौपदी नामक स्त्रियों का ही स्थान है। स्त्री, जो सदा से सदियों एवं युगों से जीवन का मूल आधार रही है, उसे पुरुष ने कभी भी यथोचित स्थान नहीं प्राप्त करने दिया। यदि पुरुष ने स्त्री को कभी आदर भी दिया है या पूजा भी की है तो वह है उसका मां का रूप। पर सच तो यह है कि स्त्री मां होने से पहले भी कुछ है और वह है उसका स्त्री होना। अब तक स्त्री को मां, बेटी, बहन एवं पत्नी आदि रूपों में तोड़कर ही देखा गया है। स्त्री विमर्श नारी

स्त्री को स्त्री के रूप में देखना व स्वीकारना आज तक नहीं हो पाया है। जब भी कभी पुरुष की काम वासना पर उंगली उठती है तो वह घिसा-पिटा उत्तर देकर अलग हो जाता है कि ‘जब मेनका के आगे विश्वामित्र की तपस्या नहीं टिक सकी तो हम तो साधारण इंसान है।’ लेकिन जब उसे किसी स्त्री के चरित्र पर उंगली उठानी होती है तो वह छूटते ही कहता है, ‘परीक्षा तो सीता जैसी देवी को भी देनी पड़ी थी, तुम क्या चीज हो’ आदि। दोनों ही सूरत में पुरुष स्वयं को बचाता फिरता है, जबकि स्त्री, पुरुष समाज के बेबुनियाद आरोपों की सफाई देने में जुटी रहती है। वह कभी गुमसुम तो कभी बातूनी हो जाती है और किसी पुरानी कहानी का नया किरदार बन कर रह जाती है।

मूल लेखक शशि कान्त

2 टिप्‍पणियां:

दीपक भारतदीप ने कहा…

सच बात तो यह है कि स्त्री पुरुष को अलग अलग देखना ही गलत है। मानव जाति के रथ के दोनों पहिये हैं। अब यह हो सकता है कि इधर का पहिया उधर लग जाये। मगर दोनों तरफ पहियों का रहना जरूरी है।
दीपक भारतदीप

Arvind Mishra ने कहा…

Interesting !