शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

व्यंग्य कविता

छुपे हैं चोर थाने में , पकड़ने हम किसे जायें
दरोगा बन गया साला अकड़ने हम कहाँ जायें

लगा है शौक पढने का हमें यारों बुढापे में
बंधी भैंसे मदरसे मैं तो पढने हम कहाँ जायें |

खुजा कर सर किया गंजा , न आई बात भेजे में
लिया जब जन्म अगडों में पिछड़ने हम कहाँ जायें |

बिजली है , न पानी है ना सीवर है न सड़कें है
बसाया घर बनारस में , तो उजड़ने हम कहाँ जायें|

कटें है सीरियलो में दिन गुजारी रात फिल्मों में
जो घर में हो डिश टीवी बिगड़ने हम कहाँ जायें

पढ़ी है जब से लोगो ने पे कमिशन न्यूज अखबारों में
बढाये दाम बनियों ने , तो बताने हम कहाँ जायें |

सभी बेटों ने कर लिया एम् सी ऐ , और एम् बी ऐ ,
बेचते पार्ट एच सी एल के , बतानें हम कहाँ जायें |

एक दोहा
रहिमन अब वे पुलिस कहाँ ,धीर वीर गंभीर ,
थाने - थाने देखिये हरिजन और अहीर |
( ये दोहा किसी जाति विशेष के प्रति विरोध के लिए नहीं है बल्कि थानों में दरोगाओं के जातिवार नियुक्ति को ले कर कोटा सिस्टम के प्रति टिपण्णी है | अतः सुधी पाठकों से क्षमा याचना सहित )

1 टिप्पणी:

सत्याजीतप्रकाश ने कहा…

यार पसंद आ गई तुम्हारी कविता, लिखते रहो.