रविवार, 27 सितंबर 2009

राखी सावंत से समाजशास्त्रीय सवाल जबाब

साधो एक दिन रात में टी वी का कार्यक्रम देखते देखते सो गया तो मुझे ऐसा आभास हुआ कीमैं राखी जी से सामाजिक मूल्यों पर उनका साक्षात्कार ले रहा हूँ इस साक्षात्कार से मेरे शरीर केहर ज्ञान चक्षु मानो खुल गए तथा सारी थकावट दूर हो गई उस सवाल जबाब का सिलसिला शुरूकरते हैं ( राखी जी से क्षमा याचना सहित कि इनकी यह फोटो फोटो राखी जी के सामाजिकप्रतिमानों के विपरीत लगे हैं )
प्रश्न --- क्या आप यह मानेंगी कि आपका अंग प्रदशन नई पीढ़ी पर दूषित प्रभाव डाल रहा है ?
राखी- (खिलखिलाते हुए) देखिए हमारे अंग प्रदर्शन का समाज के सभी वर्गों पर बडासकारात्मक असर डाल रहा है पहले बच्चों को लेते हैं- बच्चे पेड़ पर नहीं उगाए जाते, फैक्ट्री मेंनहीं ढाले जाते, बिस्तर पर बनाए जाते हैं, भोले बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासाएं होती हैं, वे छोटेक्यों हैं, बड़े बड़े क्यों हैं, वे इस दुनिया में कहां से आए, मां बाप , कुटुम्बी, टीचर उन्हें सही उत्तरदेना गन्दी बात समझते हैं-हमारे अंग प्रदर्शन से उन्हें काफी जानकारी मिल जाती है, जो उनके मानसिक विकासमें बहुत काम आती है। जहां तक यंग लड़के लड़कियों का प्रश्न है तो उनके लिए हमारा अंग प्रदर्शन एक वरदान है।इससे उनमें साहस और आत्मविश्वास, खासतौर से लड़कियों को तो अपनी बाडी की ताकत और कीमत का अन्दाजलग जाता है।

अब लीजिए काम धंधे में फंसे और पिसते वर्ग को तो हमारा अंग प्रदर्शन पल-भर की चैन देता है प्रदर्शन उनकेघुटन भरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका है, तपते रेगिस्तान में शीतल छांव है। मैं एक ट्रेड सीक्रेट बताती हूं, खर्चकरने की पावर के चलते यह वर्ग हमारी इंडस्ट्री का मेन टारगेट है। मुझे इस वर्ग से बहुत ही उम्मीद रहती है जबएक मध्य वर्ग का व्यक्ति मेरे शो को ऐसे ध्यान से देखता है जैसे सत्य नारायण की व्रत कथा मे सन्कलप ले करकथा सुन रहा हो तो मुझे लगता है कि मेरा जीवन कला के प्रति समर्पण सफ़ल हो गया

अब बात करें स्त्री की, हम उन्हें पुरुष की गुलामी से छुटकारा पाने का आसान मंत्र दे रहे हैं, शरीर के सटीक प्रयोगसे, वे जो चाहें जहां चाहें, हर चीज़ हासिल कर सकती हैं। आशिकी से लेकर नौकरी तक , ग्लैमर की दुनिया से लेकरपालिटिक्स हर जगह यह मन्त्र अमोघ बाण का काम करता है।

रही बात बुजुर्ग पीढ़ी की, उनकी छोड़िए। जब से दुनिया बनी है तभी से नई पीढ़ी के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, चलने-फिरने हर बात में माथा पीटते हैं। खुद अपने टाइम में मजे मार लिए और हमें उस मजे सेरोकते हैं। हम जानते हैं कि उम्र के चलते अंगूर खट्टे हैं वरना क्या-क्या नहीं करते। दरअसल यह जनरेशन गैप है, इसलिए हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। तरस आती है उनकी सोच पर

प्र्श्न------ लेकिन आप यह जरूर मानेंगी कि सेक्स के भौंडे प्रदर्शन से समाज में सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिकमूल्यों में गिरावट रही है।
राखी -- प्लीज माइंड योर लैंगवेज। अंग प्रदर्शन एक कला है, भौंडा वह होता है जिसके मूल में मूर्खता हो, फूहड़ताहो, अव्यवस्था हो। हमारा हर मिनि प्रदर्शन योजनानुसार आकर्षक और शानदार होता है। उसको भौंडा कहनाअपनी नासमझी ज़ाहिर करना है। मैने अभी आपको अँग प्रदर्शन के लाभ गिनाए हैं।
जहां तक आपके इन सोकाल्ड मूल्यों का सवाल है तो मेरी राय है कि आप लोग पहले अपने इन मूल्यों को मजबूतबनाइये। एक आँख मिचकाने या जरा सा बाडी हिला देने से जो मूल्य भरभरा कर गिर पड़ें, उन्हें कोई नहीं बचासकता। आप धर्म की बात कर रहे हैं, लाखों की भीड़ के बीच से नागा साधु त्रिवेणी नहाने जाते हैं। नैतिकता कादोहरापन देखिए, खजुराहो और कोणार्क की मिथुनरत मूर्तियां और पैरिस के चित्रों की तारीफ में जिनकी जुबाननहीं थकती, वही हमारी अर्धनग्नता पर नाक भौं सिकोड़ते हैं। पतन-पतन कर छाती पीटते हैं। अरे नग्नता तोनग्नता है, चाहे पत्थर में हो, कागज पर हो या सशरीर सामने हो! यदि उन्हें आपने कला का दर्जा दिया है तोआपको हमारे अंग प्रदर्शन को कला मानना ही होगा जीवित कला हा हा हा -----
प्रश्न.- मैडम बुरा मानें आप लोगों पर नंगई इतना हाबी है कि कला जैसे पवित्र शब्द को गन्दगी में घसीट रही हैं?
राखी-(टोकते हुए) ...मैं कला में गन्दगी नहीं घसीट रही हूं, थोथी कूपमंडूकता को झिंझोड़ रही हूं। दोहरेपन कीनकाब उघाड़ रही हूं जो औरत को देखते ही बिस्तर पर बिछाने की कल्पना में डूबने उतराने लगते हैं। और ऊपर सेकला पारखी, समाज सुधारक जैसे मुखौटे लगा लेते हैं। यह दोहरा माप दन्ड नही चलेगा
प्रश्न.- आप अंग प्रदर्शन को आप किस सीमातक जायज समझती हैं ?
राखी.- जिस सीमा तक लोगों को अच्छा लगे...आप अपनी सीमा बताइये
प्रश्न. -यानी लोगों के चाहने पर आप और छोटी साईज के कपडे पहनने मे विश्वास करती है ?.
राखी- मैं समझ गयी आप अंग प्रदर्शन की सीमा को क्वांटिफाई करना चाहते हैं। देखिए यह तो आप जानते ही होंगेकि वेश्या की नग्नता कौड़ियों में बिक जाती है, जबकि हमारी अर्धनग्नता हमें लाखों-करोड़ों दिला देती है।लुकाछिपी के इस खेल में कपड़ों की सीमा जरूरत के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। दरअसल यह अर्थशास्त्र काप्रश्न है, आप जितना इसको समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझते जाएंगे। चलिए एक सूत्र देती हूं विश्व भर कीविग्यापन-दुनिया का बजट करोड़ों नहीं अरबों में है और वह समूची दुनिया औरत के कपड़े पहनने, उतारने कीबैसाखी पर टिकी है, ड्रेस का साइज उसी के मुताबिक तय होता है।
प्रश्न- लोग आपकी आलोचना करते हैं आपको इसका बुरा नहीं लगता ?
राखी- (हल्की मुस्कुराहट) बुरा लगने का तो प्रश्न ही नहीं होता, बल्कि यह तो हमारी सफलता की निशानी है।जितनी अधिक चर्चा होगी, उतनी पब्लिसिटी मिलेगी। नाम ना हुआ तो क्या बदनाम तो हुए पब्लिसिटी आगे बड़ेबड़े काम दिलाती है और फिर तरक्की की राह में रोड़े अटकाना, बढ़ते की टांग खींचना लोगों की
कठमुल्लों की पूछिए, हर चेंज और तरक्की पर हाय-तौबा मचाना उनकी फ़ितरत है, उनका बस चलता तोइन्सान को गुफा-युग से बाहर नहीं निकलने देते, उनकी बकवास का हम कतई परवाह नहीं करते
सवाल जबाब की यह कडी बीच मे ही रह गयी क्यो कि मेरी नीद टूट गयी थी सवेरा हो चुका था और बर्तन मान्जनेवाली राखी (राख) चहिये थी सो वह राखी कहा है चिल्ला रही थी मै उस राखी की तलाश मे बाहर निकल गया था

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सरकार सुप्रीम कोर्ट समलैंगिकता

काफी पशोपेश के बाद सरकार ने उच्चतम न्यायालय के समलैंगिकता के प्रश्न पर अपना रुख स्पष्ट करने के सवालपर चुप्पी साध ली तथा कोर्ट को सहयोग करने की बात कह दी कुछ दिन पूर्व ऐसा लगता था की सरकार में बैठेलोग खास तौर से मोइली साहिब इसके बारे में स्पष्ट रूख करेंगे लेकिन लगता है की सरकार पर समलिंगी समर्थकहोने का ठप्पा लग जाए इस कारन से और इससे वोट बैंक भी नही जुडा है इस कारन से सरकार पीछे हट गई मेरेख़याल से वोट बैंक तो बड़ा है लेकिन उसको लेकर कोई वारिस बन कर दल सामने नहीं है इस मुद्दे पर विचारक जगदीश चतुर्वेदी का यह लेखांश पठनीय विचारणीय है
"अधिकांश राजनीतिक दल भी अपनी तलवारें लेकर मीडिया के मैदान में गए हैं और इस सबसे समलैंगिकताके बारे में गलत समझ पैदा की जा रही है। हिन्दी उर्दू की साझा परंपरा में दो महत्वपूर्ण लेखिकाएं हैं जिन्होंनेसमलैंगिकता के सवाल पर बेहतरीन रचनाएं लिखी हैं। उर्दू में इस्मत चुगताई ने सन 1941 में 'लिहाफ' कहानीलिखी थी और हिन्दी में पहला लेस्बियन उपन्यास आशा सहाय ने 'एकाकिनी' के नाम से 1947 में प्रकाशित कियाथा। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार शिवपूजन सहाय ने इस उपन्यास की भूमिका लिखी थी। असल में समलैगिंकतातयशुदा लिंग विभाजन के आधार पर प्रेम की धारणा को चुनौती है। समलैंगिकों को सामाजिक व्यवस्था में सबसेज्यादा उत्पीड़न और अपमान झेलना पडता है। हमारे समाज में सेक् और प्रेम दोनों ही उत्पीड़न करने के बहानेहैं। इसमें भी यदि समलैंगिक प्रेम है तो खैर नहीं। समलैंगिकता का देहभोग से कम और एक ही समानधर्मा लिंग केसाथ प्रेम का संबंध ज्यादा है। समलैंगिक संसार अनुभूतियों का संसार है। यह पाप या पुण् की कोटि से परे है।यहस्वाभाविक संसार है। यह दो प्राणियों या मित्रों का मिलना है। इसी प्रसंग में 'काम' या सेक् की भारतीय धारणा परविचार करना सही होगा। वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' के दूसरे अध्याय में 'काम' की धारणा पेश करते हुए लिखा है '' स्पर्शविशेषविषयात्वस्याभिमाननिकसुखानुबिद्धा फलवत्यर्थ प्रतीति : प्राधान्यात्काम:'' अर्थातचुम्बन,आलिंगन,प्रासंगिक सुख के साथ गाल,स्तन,नितम् आदि विशेष अंगों के स्पर्श से आनन् की जो प्राप्िहोती है वह 'काम' है। इस प्रसंग में ही दूसरी महत्वपूर्ण बात जो वात्स्यायन ने रेखांकित की है ि कामशास्त्र कोकिसी निपुण व्यक्ि से जानना चाहिए।
मीडिया में बार बार ऐसी बातें कही जा रही हैं जिससे यह आभास पैदा किया जा रहा है कि सेक् तो स्वाभाविकहोता है उसके लिए शिक्षा की कोई जरूरत नहीं है,देखो पशु भी सेक् करते हैं वे तो ज्ञान अर्जित करके सेक् नहींकरते। वात्स्यायन ने इस धारणा को भी चुनौती दी है। वात्स्यायन का मानना था सेक् शिक्षा प्रत्येक व्यक्ि कोदी जानी चाहिए और सेक् शिक्षा से व्यक्ि भय,लज्जा, और पराधीनता से मुक् होता है। आनंद ,सुखी औरसम्पन् बनता है। मजेदार बात यह है कि जो लोग समलैंगिकता के सवाल पर गुलगपाडा मचा रहे हैं वे ही सेक्शिक्षा का भी विरोध कर रहे हैं। वात्स्यायन के टीकाकारों ने लिखा है सेक् शिक्षा से दायित्वबोध, परोपकार औरउदात् भावों का जन् होता है। अपने सहचर के प्रति श्रद्धा,विश्वास, हित कामना और अनुराग में व़ृद्धि होती है।सेक् शिक्षा के अभाव में अनबन,कलह, असन्तोष, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार आदि पैदा होता है। जो लोगसमलैंगिकता के सवाल पर दिल्ली उच् न्यायालय के निर्णय से गुस्से में तनतनाए मीडिया में बोल रहे हैं अथवाइसके बुरे नतीजों के बारे में आगाह कर रहे हैं उनमें अधिकांश फंडामेंटलिस् हैं अथवा तथाकथित लिबरल दल केलोग हैं। फंडामेंटलिस्टों और साम्प्रदायिक संगठनों या धार्मिक संगठनो के नेताओं से सिर्फ इतना ही निवेदन है किवे कृपया अपने धर्म को जाकर संभालें ,सेक् और प्रेम उनका क्षेत्र नहीं है।"
समलैंगिकता असल में पहचान,अनुभूति और मानवाधिकार का मामला है,यह देह व्यापार अथवा देहभोग तक हीसीमित मामला नहीं है। समलैंगिक अधिकार का सवाल मूलत: पितृसत्तात्मक विचारधारा के खिलाफ खुलीबगावत है। यह राजनीतिक नजरिया है। पुरूष वर्चस् का विरोध करना इसका प्रधान लक्ष् है। समलैंगिक हमेशाअपनी काम संबंधी भूमिका का अतिक्रमण करता है। समलैंगिक एक नयी परिभाषा और नयी
‍‍‍ ‍‍ ‍‍ ‍‍‍‍ ‍‍ ‍‍ ‍‍‍ ‍‍‍ ‍‍‍‍ ‍‍‍‍ भावानुभूति कों सामने लेकर आए हैं
यह ऐसा अनुभव है जिसे सामान् जीवन में महसूस करना संभव नहीं है। फलत: समलैंगिक हमें असामान्लगता है ,समाज के बाहर प्रतीत होता है।यही वह विचारधारात्मक बिंदु है जिसे दिल्ली उच् न्यायालय ने पहचानाहै। इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि पहचान के सवाल जब भी उठते हैं सामाजिक हंगामा होता है परंपरापंथी सड़कोंपर जाते हैं। किंतु बाद में वे भी ठंडे पड़ जाते हैं। समलैंगिकता के सवाल पर भी यही होगा। समलैंगिकता सेपरिवार टूटने वाले नहीं है और युवावर्ग पथभ्रष् होने वाला नहीं है। दिल्ली उच् न्यायालय का फैसला सिर्फ एकफैसला नहीं है बल्कि असाधारण फैसला हैसमलैंगिकता के सवाल पर कानूनी फैसला हजारों आत्माओं की त्रासदयात्रा के गर्भ से पैदा हुआ है। यह समलैंगिकों के लिए नव् उदार वातावरण की मलहम है। यह लोकतांत्रिक फैसला है इसका व्यापक स्वागत किया जाना चाहिए साथ ही इस संबंध में कानूनी फेरबदल भी किया जानाचाहिए।"
देखना है
‍‍ ‍‍‍‍ ‍ ‍‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍ सुप्रीम कोर्ट के paale में गेंद को कौनगोल करता है सरकार तो ऑफ़ साइड हो चुकी है
जगदीश चतुर्वेदी से साभार

पाक ब्लागरो का भदेसपन

पूर्व के पोस्ट श्राद्ध कैसे कैसे पोस्ट कराने के बाद नेट पर घूमते घूमते एक समाचार पर नजर पड़ी की भारत पाकसीमा पर २००० वेश्याएं भारतीय फौजों के अवसाद दूर कराने के लिए लगाई जा रहीं है
इस ख़बर को पढ़ कर मैं एक बार चौंका कि माना कि सैनिक अवसाद में रहते हैं तथा आत्म हत्याएं भी करते हैंजैसा कि दुर्खिम ने अपने अध्ययन में भी यह सिध्ध किया है कि परिवार से दूर एकाकी जीवन जी रहे सैनिकों मेंआत्महत्या कि प्रवृत्ति अधिक होती है भारतीय सैनिक इसके अपवाद नहीं , लेकिन किसी देश ने सैनिकों के जीवनको बचाने के लिए ऐसा अभिनव प्रयोग किया हो ऐसा मैंने कहीं पढ़ा नहीं था
लगे हाथ जब मैं इस साईट pakalerts.wordpress.com पर गया तो पूरी ख़बर विस्तार से पढ़ी सोचने लगा किपाक सेना इसके जबाब में क्या बार्डर पर जनखों कि फौज खड़ा करेगी जिससे उनके फौजियों का मनोबल बढ़ता रहे
दूसरे दिन इस ख़बर कि हकीकत जानने के लिए जब कई साईट देखा तो पता चला कि महिला बी एस ऍफ़ के २०००महिला सैनिक इंडो पाक बार्डर पर तैनात हो रहीं हैं जिसकी प्रतिक्रिया में यह सब लिखा गया है
इसी साईट पर हिन्दुओं के कर्म काण्ड के कुछ बड़े ही घ्रृणास्पद चित्र जो लाशों के अन्तिम क्रिया के दौरान नदियों मेंया आस पास बिखेरे रहते हैं उसे दिखाया गया है इन चित्रों को प्रकाशित कराने के पीछे एक ही मकसद था हिन्दुओंके कर्म काण्ड कि खिल्ली उडाना


लेकिन यह सत्य कड़वा है हमें मृतक व्यक्तियों के अन्तिम संस्कार करने के पूर्व यह अवश्य ध्यान देना होगा किउसके अधजले अवशेष बचे जिसे ये नाटकबाज दिखा दिखा कर किसी धर्म का मजाक बना सके चूँकि किसीमानव कि लाश कि नुमाइश नही होनी चाहिए इसलिए हम सबको इसका विरोध इस साईट पर करना ही चाहिएवैसे इस साईट पर कमेन्ट आदि पढ़ कर ऐसा लगा कि ये जान बुझ कर हिन्दुओं को भला बुरा कहने कि धर्मान्धतासे प्रेरित है यहाँ स्वच्छ संदेश वालों को स्वच्छ संदेश देना चाहिए कि क्या इस्लाम में मृत लाशों कि बीभत्सता कोदिखने कि कोई विवशता है क्या ?????
क्या कहूँ ऐसे ओछी मानसिकता वाले पाक ब्लागरों को ......
औरों को अमृत देने का दंभ नहीं अच्छा है
अपने मन का विष यदि पच जाए तो काफ़ी है

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

श्राध्ध कैसे कैसे ????



इस समय पितृपक्ष चल रहा है मान्यता है कि इस माह में पितरि लोक का द्वार खुल जाता है जिसमे पितृ लोग मृत्यु लोक में आते हैं तथा अपने पुत्रों प्रपौत्रों से श्राद्ध के रूप में पिंड दान स्वीकार करते हैं तथा ब्राहमणों को किया हुआ दान उन्हें प्राप्त होता है सभी धर्मों में अपने पूर्वजों को याद कराने के लिए उन्हें श्रद्धा देने के लिए कोई न कोई तिथि निर्धारित कि गई है हिंदू धर्म में इसके लिए एक पक्ष १५ दिनों कि व्यवस्था कि गई है
समय बदल रहा है शहरों में जिनके पिता जीवित नहीं है उसमे से कुछ लोग प्रतीकात्मक रूप से मूछ मुड़वा कर इस पक्ष कि इति श्री कर लेते हैं लेकिन वे तो हमेशा ही clean shaved सफाचट रहतें है तो पता ही नहीं चलता कि वास्तव में वे अपने पूर्वजो के सम्मान में मुछों का वलिदान किए हैं या सुंदर व पके हुए बाल छिपाने के लिए
वाराणसी हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है पिशाच मोचन नामक जगह पर इन दिनों देश के दूर दराज से आए श्रद्धालु श्राद्ध कराने के लिए आ रहे हैं तथा पंडा लोग अपने अपने मायाजाल में इन श्रद्धालुओं को मुड़ने का भी काम करते रहते हैं अब जो इतनी दूर से वाराणसी आया है कुछ तो लिहाज करेगा ही लेकिन सत्यानाश हो इन लालची पंडो का जो यजमान कि जेब देखे विना ही नाना प्रकार के अलभ्य वस्तुओं कादान का संकल्प करा कर बाद में रुपये ऐंठते हैं
अब जब दाल के भावः सराफा बाजार कालम के निकट ही दिखाते हों विश्वास न हो तो अखबार का पन्ना देखे पीली धातु के निकट ही इस पीली चीज का भावः लिखा रहता है ऐसे में यजमान दाल घी व चीनी आदि का वार्षिक खपत जो पितरों के नाम पर संकल्प कराई जा रही है उस्केव नाम पर सौ , सवा सौ दे कर अपना पिंड छुड़ाना चाहता है लेकिन ये मरदूद यजमान को भय दिखा कर इन सब चीजो के नाम पर पितरों के अशंतुष्ट होने तथा शाप देने कि बात कह कर शोषण कराने पर लगे हुए हैं
१५ दिन के लिए पुरातन काल से खाद्यान कि गारंटी प्राप्त इन पंडों को कौन समझाए कि ज़माने के हिसाब से ख़ुद को बदलिए पंडा जी अब यजमान को भी कहना पड़ रहा है कि बाबु जी को दाल घी से एलर्जी थी तथा वे तो सुखी घास कि रोटी करेला खाते रहे सो दाल घी का दान तो उनकी आत्मा को कष्ट ही पहुँचायेगा यजमान जनता है कि वो झूठ बोल रहा है लेकिन वो अच्छी तरह से जनता है कि पितर लोग इस लोक में कर महंगाई को जान चुके होंगे सो समझौता कर ही लेंगे \ और स्वर्ग हो चाहे नरक वहां तो खाद्यान का कोई संकट होगा ही नही आख़िर हमारे पूर्व खाद्य कृषि मंत्री घास तो खोद नहीं रहे होंगे
जब एक शरद पवार हमें निराश न होने कि सलाह दे रहे हैं तो आजादी के बाद दिवंगत हुए कई मंत्री समूह स्वर्ग / नरक में अच्छी व्यवस्था तो किए ही होंगे मुझे तो लगता है कि पितर लोग इस पक्ष में खाने के लिए नहीं बल्कि हालीवुड बालीवुड में मुहूर्त में भाग लेते होंगे कि बनारस के ट्रेफिक जाम में फंस कर धुंवा के बीच कच्चे जौ का आटा लेने आते होंगे
अरे जिन बच्चो ने जीते जी पानी नहीं पिलाया भले मरते समय डाक्टर से पानी कि बोतल चढवा दी हो उसका क्या लेना क्या लादना | बच्चे भी समझ रहे हैं इस लिए थोड़े में ही श्राद्ध निपटाना चाहते हैं अब ऐसी विकट परिस्थितियों में नीचे की कविता ही सबका मार्ग दर्शन करेगी जो बहुत पहले रीती काल में लिखी गई थी आशा है पंडा व यजमान दोनों इससे लाभान्वित होंगे तभी दोनों की व धर्म की लाज बचेगी
दाम की दाल छदाम के चाउर घी अँगुरीन लैँ दूरि दिखायो
दोनो सो नोन धयो कछु आनि सबै तरकारी को नाम गनायो
विप्र बुलाय पुरोहित को अपनी बिपता सब भाँति सुनायो
साहजी आज सराध कियो सो भली बिधि सोँ पुरखा फुसलायो

सोमवार, 31 अगस्त 2009

क्या कहूँ इस श्लोक पर

संस्कृत साहित्य में एक से एक गूढ़ उक्तियाँ भरी हुई हैं जिन्हें जानने के बाद किसी अन्य की सलाह बेकार लगानेलगती है संस्कृत की एक किताब हाथ में पढ़ने को आई तो भर्तृहरि का यह श्लोक मिला

तावन्महत्वं पांण्डित्यं कुलिनत्वं विवेकिता |
यावज्ज्वालितम नाङेषु हतः पंचेषुपावकः ||
अर्थात बड़प्पन , पांडित्य कुलीनता और विवेक मनुष्य में उसी समय तक रहते हैं जब तक शरीर में कामाग्नि प्रज्ज्वलित नही होती
इस अर्थ ने मुझे सभी प्रकार के हो रहे काम अनर्थो के प्रति गुण सूत्र दे दिया और एक सवाल छोड़ दिया क्यावास्तव में यह अग्नि ऐसी है जिसमे जल कर सभी गुण नष्ट हो जाते हैं व्य्वाहारविद क्या कहते हैं यह जिम्मा मैंअपने सुधी मित्रों पर छोडता हूँ जिनके पास इसका उत्तर अवश्य होगा

बुधवार, 26 अगस्त 2009

क्वचिदन्न्योपि पर चर्चा ?? सुंदरी का क्या करूँ ??

मेरे पुराने मित्र ने अपने क्वचिदन्न्योपि नामक चिट्ठे पर कुछ इस अंदाज से मेरी चर्चा की , कि मुझे भी कुछ दिनोंतक व्यामोह हुआ कि मैं रसिकप्रिय तथा आधुनिक सन्दर्भों में कुछ कुछ हृतिक रोशन जैसा हूँ लेकिन कुछ दिनों केचिंतन के बाद मुझे ऐसा लगा कि भाई अरविन्द जी को यह सब कुछ मेरे ब्लाग पर सुंदरी के लगे चित्र तथा गे आदिपर छपे लेख से ऐसा भ्रम हो गया
वैसे मैंने इस विषय पर अपनी टिप्पणी से अवगत करा दिया है रही बात सुंदरी के चित्र की तो निजी जीवन मेंअहिंसा का संदेश देने का इससे सबल क्या उदाहरण क्या होगा सुंदर चीजो के देखने मात्र से औरों में प्रेम अहिंसाका ही भाव जगता है इसी लिए तो स्त्री पुरूष अपने को सजाते संवारते हैं अब मैं तो यही चाहता हूँ कि चहुँ दिश् प्रेम फैले हो सकता है इसी बात पर मुझे शान्ति का कोई पुरस्कार ही मिलजाए
अब ये भी कोई बातहुई कि जीवन कि निस्सारता को लेकर मुंह लटकाए बैठे हैं बकौल अकबर इलाहाबादी
गुजर कि जब हो सूरत गुजर जाना ही बेहतर है
हुई जब जिंदगी दुश्वार , मर जाना ही बेहतर है

अब फ़िर इसी सुंदरी के चित्र पर फ़िर लौटता हूँ क्या ये जीवन में आशा का संचार नहीं भरती कि जीवन में इतनीनिराशा भरो जितनी वास्तव में है इस आभासी ब्लाग जगत के विचरण में कुछ पल तो सुख के बिता लिया जाएवरना जीवन क्या है बुद्ध ने दुखमय कह कर किनारा कर लिया लेकिन संस्कृत के एक श्लोक जो भर्तिहरि ने लिखा हैवास्तव में सही चित्रण करता है बानगी देखें
क्वचिद्विद्वदगोष्ठि क्वचिदपि सुरमात्तकलहः|
क्वाचिदवीणानादः क्वचिदपि हा हेति रुदितम |
क्वचिद्रम्या रामा
क्वचिदपि जराजर्जरतनु ...
नॄं जाने संसारः किममॄतमयः किं विषमयः || भर्तिहरि
अर्थात कहीं विद्वानों कि गोष्ठी होती है तो कहीं मदोन्म्मत लोगो का उधम दिखाई देता है कहीं वीणा का नाद सुनाई देरहा है , तो कहीं हाहाकार के साथ क्रंदन | कहीं सुंदरी रमणी और कहीं जरा जीर्ण शरीर वाले मिलते हैं | पता नहींयह संसार अमृतमय है या विषमय |
तो ये गूढ़ असार संसार में शोक या हर्ष दोनों सत्य नहीं है पर मित्र ,जब ईश्वर ही सद् चित आनंद है तो हम सब उसईश्वर के अंश अपने छोटे से जीवन में सुख आनंद को क्यों तलाश लें भले वह आनंद सुंदरी के चित्र से ही मिलजाए, हो सके तो यही दर्शन अपनाए सुखी रहे जहाँ से कोई छोटा सा भी सुख का कण मिले उठा ले दूसरो में बांटे उसको भी आनंदित करें
संस्कृत में लिपि कि त्रुटी हुई हो तो सुधिजन क्षमा करेंगे

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

परदेसियों से न ओठवा मिलाना



पुरानी फ़िल्म का ये गाना कुछ संशोधन के साथ गाने से स्वाइन फ्लू से बचाव संभव है विदेशियों से ज्यादा प्रेम चूमा चाटी से अपुन को ही खतरा ही खतरा है मुझे तो मनमोहन सिंह तक ये बात किसी तरह से पहुंचानी है की विदेशियों से थोडी दूरी बना कर ही रहने में सदा फायदा है आपने कहा था कि बुश को पूरा भारत प्यार करता है प्यार करे पर अपने देश को देश के नेता से यदि विदेशी नेता या नेत्री के चक्कर में पडोगे तो वही हाल होगा जो जसवंत सिंह को हुआ
जिन्ना फ्लू ने जान तो बख्श दी किंतु रातोरात योनि परिवर्तन कर जसवंत को हनुमान (वानर योनि ) से रावण (राक्षस योनि ) में बदल डाला मैं तो इस बयान को पढ़ कर चकित हो गया आख़िर ये हनुमान थे तो जामवंत की ताजपोशी में क्यों जुटे हुए थे जामवंत की देखा -देखी जिन्नाह जैसे यक्ष की प्रशंशा करोगे तो यही सब होगा न
भा जा पा में सीता के पास हनुमान क्यों नही जाते इसलिए की राम नाथ क्षमा करें स्वयं राज नाथ की यह राजाज्ञा थी लेकिन सीता कहाँ है तथा हनुमान क्यों नहीं सीता को लेकर भीष्म पितामह के पास क्यों नही जाते या क्यों नहीं घोषणा कर देते कि वे राज चरित मानस भी लिखने वाले हैं पर ये सीता कौन हैं ?? ये सवाल अनुत्तरित ही है कहीं ऐसा तो नहीं कि सीता को भी निकाल कर शूपर्ण नखा कि सत्ता चल रही हो शुपर्ण नखा से स्वाइन फ्लू कि फ़िर याद आ गई
फ़िर विदेशियों से किस न करने कि बात पर लौटें वास्तव में इनसे दूर रह कर आँख लड़ाया तो जा सकता है लेकिन विना किसी मास्क या साधन प्रयोग किए इनसे अंतरंगता दिखाना खतरनाक ही है बल्कि आत्म घातक ही है
ये विष कन्याये या पुरूष तो वाइरस पुरूष व कन्या निकली देखें चित्र व विश्वास करे मानवों में ऐसे ही स्वाइन फ्लू के वाइरस सुवरों से आते हैं सो विदेशियों से ओठ मिलाना छोडिए देशी अपनाइए एन आर आई से भी दूरी बना कर रहिये भले ही वो कितना ही सजीला गठीला सुवर कि तरह हृष्ट पुष्ट क्यों न हो उससे विवाह की बात तो सोचना ही पाप है हे शिव इस नगरी में पर्यटकों से आयातित इस गिफ्ट आइटम व गर्ल्स से सभी को बचाना तेरा ही सहारा है

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

स्वाइन फ्लु की ऐसी की तैसी (ऐसे निपटे इस बीमारी से )


क्या आपके पास ये सब है ????
सुलगता जिस्म
नशीली आँखें
कंपकंपाते गुलाबी होंठ
थरथराता बदन
कंपकंपाती सीटी सी आवाज

अगर ये सब आपके पास है .......... तो
घबराए नहीं
आपको स्वाइन फ्लू है !!
इलाज की अपेक्षा प्यार बेहतर है जिंदगी ऐसे खुल कर जियें ,वायरस इसे देख कर ख़ुद ही शरीर से भागजाएगा

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

हस्तिनापुर में बूटा सिंह की जय हो

सत्ता व सुंदरी का सुख उठाने की कला कोई बूटा सिंह जी से सीखे वैसे मई उनके पूरे जीवन की घटनाओ को जब देखता हूँ तो यही पता हूँ कि उन्होंने अपने सत्य को कभी नहीं छोड़ा उनका सत्य था कुर्सी चाहे वो राज्यपाल की हो गृह मंत्री की , या वर्तमान संबैधानिक पद की | इस सत्य के लिए आपने सब कुछ का त्याग किया इमान ,धर्म शर्म सभी का | सत्य का रास्ता कठिन अवश्य होता है किंतु बड़ा ही फलदाई होता है सत्य को ऐसे ही पकड़ा जाता है आज की युवा पीढी को आपके आदर्शो पर चलना चाहिए वर्तमान में जार्ज भाई साहिब भी इसी प्रकार सत्य को पकड़ कर राज्य सभा में पहुँच गए है भले ही वहां शपथ भी नहीं बोल पाए लेकिन मरते मरते भी देश की सेवा का जो व्रत लिया है उसे वो छोडेगे नहीं दोनों बुजुर्गों में सत्य को पकड़ने का फेविकोल बहुत ही मजबूत है बूटा सिंह उम्र से बुजुर्ग हो गए तो क्या हुआ, दिल से वह जवान हैं, तभी तो वह भरपूर सत्ता सुख प्राप्त करना चाहते हैं। सत्ता और सुविधा से उन्हें इतना लगाव है कि उनके बगैर जीवन को ही व्यर्थ मानते हैं। वैसे भी पद और सुविधाओं के बगैर जीने का मतलब ही क्या है।

भइया उमर अब्दुल्लाह को देखो जरा सा आरोप क्या लगा, तुरंत पद छोड़कर जाने लगे। वह तो गनीमत रही कि राज्यपाल ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया वरना बेवजह सत्ता और सुविधाओं से वंचित हो जाते। बूटा सिंह इस उम्र में भी नैतिक जिम्मेदारी वगैरह के थोथे आदर्शों में नहीं पड़ते, फिर क्या जरूरत थी उमर को यह सब सिर पर लादने की। पीडीपी के मुजफ्फर बेग चिल्लाते रहते, उमर को भी कहना चाहिए था कि कुछ भी हो जाए, पर इस्तीफा नहीं दूंगा। खैर अब तो जो हो गया सो हो गया।

बूटा सिंह कांग्रेस के युवा नेताओं को बहुत कुछ सिखा सकते हैं। वह उन्हें बता सकते हैं कि कुर्सी से लगन कैसे लगाई जाए। पद और सुविधा के लिए मर-मिटने का जज्बा कैसे पैदा किया जाए। कैसे आरोपों की बौछारों के बीच भी अविचल रहा जाए। बूटा सिंह ने कुर्सी के लिए जान देने की बात कहकर कुर्सी की गरिमा बढाई है हस्तिनापुर की परम्परा अभी भी जीवित है मुझे तो इसी बात पर गर्व है कि कांग्रेसी होने के बावजूद उन्हें देश की प्राचीन सत्ता - संस्कृति का इतना ख्याल है जय हो बूटा सिंह जी

बुधवार, 5 अगस्त 2009

सास द्वारा लात मारना बहू के प्रति क्रूरता नहीं

सास- बहू के जगत्व्यापी शाश्वत झगडो के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सास के बहू को लात मारने को क्रूरता की श्रेणी में नहीं माना है बल्कि इसे अन्य अपराधों की श्रेणी में माना जा सकता है वैसे भी भारतीय संस्कृति में माता ,पिता गुरु व पति के चरण रज स्वर्ग दिलाने का मध्यम है इस्लाम में भी माँ के पैर तलों जन्नत की बात कही गई है फ़िर उस चरण से पिटाई तो आत्मकारक मोक्षदायिनी है तथा संस्कृति की पोषक है उसे क्रूर कैसे माना जा सकता है यही सन्दर्भ सासू माता के मामले में भी लागू होता है
सास बहू के सीरिअल बनाने वाले चाहे तो इस घटना से २० - २५ एपिसोड की कहानी तो आसानी से बना कर जोड़ ही सकते हैं जिसमे अंत में सास को विजय मिलती तथा बहू को शर्मिंदा होते तथा माफ़ी माँगते अंत में दिखाया जाए तथा सास उसे क्षमा करते हुए कहे कि बहू वो तो मेरा कर्तव्य था जो मैंने निभाया तुमको इसमे खामी लगी खैर अब सब कुछ ठीक हो गया जय श्री राधे कृष्ण की

पूरी ख़बर नीचे सन्दर्भों के साथ पढ़ें


सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी (बहू) को अपीलकर्ता सास द्वारा पैर से ठोकर मारने और उसकी माता को झूठी बताने पर उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत दंडित नहीं किया जा सकता है बल्कि इसे अन्य अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा।

पीठ ने कहा कि इसी प्रकार बहू द्वारा अपीलकर्ता सास पर अपने पुत्र का कान भरने, प्रयोग में लाए गए कपड़े और हमेशा नसीहत देने जैसे मामलों को भारतीय दंड संहिता की धारा 489ए तक दंडनीय अपराध नहीं माना जाएगा। पीठ ने कहा कि यहां तक की पुत्र की दूसरी शादी करने और तलाक की धमकी देने को भी आईपीसी की धारा 498ए के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत किसी महिला के खिलाफ क्रूरता के मामले में उसके पति या पति के रिश्तेदार को दंडित किया जा सकता है और सजा की अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है और उसे अर्थ दंड भी लगाई जा सकती है।

इस मामले में, बहू मोनिका ने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले अपने पति विकास शर्मा, उसके माता-पिता भास्कर लान एवं विमला के खिलाफ क्रूरता तथा विश्वास भंग करने का मामला दर्ज किया था। मोनिका विकास की दूसरी पत्नी है। विकास ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया था जिससे उसके दो बच्चे हैं। शादी के कुछ समय बाद विकास और मोनिका के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए और मेलमिलाप की तमाम कोशिशों के विफल होने के बाद मोनिका ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर आईपीसी की धारा 498ए (क्रूरता) और धारा 406 (विश्वास भंग) के तहत मामला दर्ज किया।

पटियाला कोर्ट ने मोनिका के पति और ससुरात पक्ष के खिलाफ समन जारी कर दिया था। जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के खिलाफ पति और ससुराल पक्ष की अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीमकोर्ट के समक्ष आया था।
एक बार फ़िर जय हो कहने का मन कर रहा है लेकिन क्यों कहूँ यदि कह दिया तो मेरी माँ ही खुश हो सकती है और तो नहीं

रविवार, 2 अगस्त 2009

जय हो सुप्रीम कोर्ट की

इन दिनों मै जब भी ब्लॉग पर कुछ लिखने बैठता हूँ तो उसी समय कुछ ऐसे एतिहासिक फैसले हो जाते हैं कि न चाहते हुए भी उसकी ख़बर पर ही लिखने को बाध्य होना पड़ जाता है बहुत पहले एक सरकारी मीटिंग में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि कोर्ट का चले तो वह इस बात पर भी स्टे लगा सकती है कि किसी बच्चे का जन्म हो अथवा न हो हमें तो हर हाल में स्टे आदेशों का पालन करना है तब यह बात हँसी में उडा दी गई लेकिन रेप कि हुई शिकार लड़की को माँ बनाना /बनना चाहिए इस पर न्यायालय के फैसले से हतप्रभ अवश्य हूँ न्यायालय का सम्मान करते हुए इस न्यूज़ पर नजर डालें तो वकीलों के तर्क व उस पर फसलों कि एक बानगी मिलाती है कि किस प्रकार वकील गण इन फसलों में अहम् भूमिका निभाते हैं
सौरभ द्विवेदी से साभार
सुप्रीम कोर्ट के तीन जज
वकील की दलीलों के कायल हो गए और फैसला दे दिया कि रेप की शिकार हुई लड़की को भी मा

ं बनने का हक है। हक शब्द सुनते ही भावनाएं उमड़ने लगती हैं
, रक्षकों के कान चौकन्मगर अहम सवाल यह है कि क्या मानसिक अस्थिरता की शिकार उस लड़की ने यह हक मांगा है ! क्या वह अपनी इच्छा से मां बनी है ?

किसी वहशी ने नारी निकेतन चंडीगढ़ में उसके साथ रेप किया , गर्भ ठहर गया और अब वकील साहिबा दलील दे रही हैं कि मां बनना उसका हक है और अदालत को उससे यह हक नहीं छीनना चाहिए। हम भी इस दलील के कायल हैं कि निजी मामलों में स्टेट या अदालत का कम से कम हस्तक्षेप हो। मगर अहम सवाल यह है कि यहां उस लड़की की बात हो रही है , जो समाज और स्टेट की जिम्मेदारी है। वह लड़की अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती और की निकेतन में रहकर जीवन गुजार रही है। रेप के मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी माना था कि इस स्थिति में अबॉर्शन ही एकमात्र विकल्प है , मगर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया।

महिला के अबॉर्शन का विरोध कर रहीं वकील साहिबा ने तर्क दिया कि वह पहले से ही इस दुनिया में अकेली है और इस बच्चे के पैदा होने से उसे खालिस अपना कोई मिल जाएगा। बहुत ही अच्छा तर्क है। वैसे भी मां सुनते ही हमारी भावुकता हिलोरे लेने लगती है। सही बात है , आखिर उस बेचारी औरत का कोई तो अपना होगा। मगर , इस सवाल का जवाब कौन देगा कि मानसिक रुप से अस्थिर इस औरत के बच्चे को पालेगा कौन , स्टेट , अदालत या दूसरी कोई सरकारी संस्था ?

अगर बच्चा बेटी हुआ तो उसे नारी निकेतन में सक्रिय वहशियों से कौन बचाएगा ? कहीं उसका भी रेप हो गया तो ? हो सकता है कि आपको मेरा तर्क अतिवादी लगे मगर क्या यह सच नहीं है कि बच्चा अनाथों की तरह , दूसरों की दया बटोरता पलेगा ? और जब डॉक्टरों के तर्क से सहमत होकर अदालत भी यह मान रही है कि यह महिला अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती , तो वह बच्चे की परवरिश कैसे करेगी ? कैसे उसे अपनी ममता की छांह में लेगी और दुनिया की धूप से बचाएगी ?

राखी सावंत और राहुल गांधी पर बहस करने वाले हम भारतीयों को यह मसला गैरजरूरी लगता है ? मां दुनिया का सबसे सुंदर और पवित्र शब्द है और जन्म देना प्रकृति को विस्तार देने जैसा। मगर तभी जब यह अपनी इच्छा से किया गया हो , दुर्घटनावश या बिना सहमति के नहीं। अगर लड़की मानसिक रूप से स्वस्थ होती और किन्हीं परिस्थितियों में हुए रेप के चलते उसे गर्भ ठहरता , तो यह पूरी तरह से उसका अपना फैसला होता कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं।