सोमवार, 1 सितंबर 2008

आज की कविता

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)

संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।
(यह कविता स्वर्गीय धूमिल की रचना है ) आज के दौर में इतना बेबाक कविता पढने के बाद आप शायद अंदाजा लगा सकें की आने वाला समय कैसा होगा , शायद अच्छे दिमागों का सी टी स्कैन करा कर कोमा में रख दिया जाएगा लोगबाग मर्सिया पढेंगे इन अच्छे दिमागों की इस अवस्था पर ..........
इसी पर एक कविता जेहन में उभर रही है
इस शहर की सभ्यता हद है
हर चने की झाड़ बरगद है ,
कुर्सिया चुम्बक नहीं यारों
बैठने वाला ही अंगद है
तो इन अंग्दों को नमस्कार करते हुए व्यस्था की जय जैकार करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूँ

1 टिप्पणी:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना प्रेषित की है।