शुक्रवार, 27 जून 2008

उपलब्धि

चेचक परविजय के बीस वर्षपूरे हुए ।यह समाचार आया है। कि इस बीच---आतंकवाद और उग्रवाद नेप्रतिवर्षहजारों कोजीवन-बंधन से मुक्त कराया है। हम प्रगति पर हैं॥ । अब इन्सानकीड़े-मकोड़ों के हाथों नहीं मारा इन्सानइन्सान के हाथ मरने का गौरव पाता है।

शनिवार, 31 मई 2008

क्या जमाना ख़राब है (गजल)

क्यों कह रहे हो तुम कि जमाना ख़राब है
आदमी भी क्या यहाँ पे कम ख़राब है

हमसे ही जमाना , ज़माने से हम नहीं
अच्छे कहाँ है हम कि जमाना ख़राब है

सर आदमी का आदमी ही काटता है यहाँ
फ़िर आदमी ही कहता है जमाना ख़राब है

दुनिया संवारने को क्या तुमने कुछ किया
जो कह रहे हो कि जमाना ख़राब है

औरो के मुंह की रोटी , आंखो के ख्वाब को
जो छिनते कहते वही , जमाना ख़राब है

क्या तुमने कभी ख़ुद के गरिबां मे है झाँका
जो हमसे कह रहे हो कि जमाना ख़राब है

क्या फैसलाकुं नजरें हाकिम ने पाई है
हर फैसले पे कहतें है जमाना ख़राब है

माना ख़राब है ये जमाना मगर कहो
किसकी वजह से ये सारा जमाना ख़राब है

फैसलाकुं -- फैसला करने वाली

जीने की बात करते हो

जीने की बात करते हो रिश्तों को तोड़ कर
क्या जिन्दगी को नापोगे किस्तों में जोड़ कर
इस जिन्दगी के जोड़ , घटना , गुणा , और भाग
शिद्दत से मिलेंगे खड़े हर एक मोड़ पड़
यूं तो भला लगे है हर इक हमसफ़र हमें
पर क्या कहा कहें वह जाए है जब दिल को तोड़ कर
बदसूरती दुनिया की नहीं देखने की चाह
मुमकिन नहीं है जीना मगर आँख फोड़कर
यादों के साँप काढ़ के फ़न हैं खड़े हुए
इस जिन्दगी की हर गली कूचे के मोड़ पर
यही इस गजल की है खूबी कि हर कोई
उठ जाता बीच मे ही सुनता छोड़ कर
जीवन की पर्त - पर्त है रख दी उधेड़ कर
दिखलाये मुझे अब कोई ये पर्त जोड़ कर

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008

महंगाई से निपटने के सरकारी उपाय

अभी कुछ दिनों पहले सरकार ने मंहगाई से निपटने के लिए जमाखोरों पर छापे डालने के लिए कहा तो मुझे बरसों पहले परसाई जी की रचना याद आ गई कतिपय परिवर्तनों के बावजूद सरकार की मानसिकता और सरकारी तंत्र की सक्रियता पर कोई अन्तर नहीं आया है प्रस्तुत है उसी रचना के पार्श्व मे यह कथा

सरकार के विचारों को सुन कर मेरा देश प्रेम जाग उठा और मैंने ठान लिया की कलक्टर साहिबा से आज मिल कर उन व्यापारियों की लिस्ट दूंगा जो माल दबा कर बैठे हें तथा महंगाई ब्रिधि कर रहे हैं चौराहे पर पुलिस का सिपाही कह रहा था साले श्रीमान जी उधर से न जा कर इधर से जाइये मैं अचरज में था की सत्ता परिवर्तन के बाद पुलिस मे इस कदर परिवर्तन कारन जानना चाहा तो पता चला की नए sp साहिब का फरमान है की पुलिस सभी से विनम्रता से सलूक करेगी तथा जल्द ही लोग इसे महसूस करेंगे तथा जनता और पुलिस में सहयोग बढ़ेगा \खैर श्रीमान माँ च्चो आदि विनम्रता सूचक सब्दों को सुनते हुए मैं जिले के कलक्टर साहिबा के कमरे मे पंहुचा तथा मैंने उनसे कहा की सरकार ने जमाखोरों के विरुद्ध अभियान मे जनता से सहयोग माँगा है तो मैं यह दो नाम दें रहा हूँ कृपा कर के इनके विरुद्ध कारवाही करिये

कलक्टर साहिबा बहुत खुश हुई तथा बोलीं आका नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरो॰ मे लिखा जायेगा सरकार की ऐसी मंशा है की ऐसे सभी लोगों का नाम जल्द ही प्रईमारी इतिहास की पुस्तकों मे छाप दिया jaayen बेसिक साहिब को जरूर नोट कर उन्होंने मैंने पूछा मादाम जी कब कारवाही होगी
unhone कहा की अभी मैं ऐ दी ऍम से जांच करुंगी यदि आपकी सूचना सही निकली टू उनको नोटिस भेजी जायेगी फ़िर उनके जबाब के आधार पर कोई कारवाही होगी
मैंने कहा इसकी क्या जरूरत है उन्होंने कहा यह सरकारी काम है उसके कुछ कायदे कानून है सरकार कायर नही है की चुपके से जा कर किसी के गोदाम में छापा मार दे सरकार टू चुनौती देगी ललकार कर वार करने में विस्वास करती है हमने चुरियाँ नही पहन रखी हैं सचमुच मी कलक्टर के हाथ में चुरियाँ नही थी नोकिया का नया सेट था
मैंने कहा की हुजुर ताब तक टू देर हो जायेगी और ये सेठ अपना माल छुपा कर इधर उधर कर देंगे टैब क्या आप उनके खाली गोदामों मी झख मारेंगी वे गुस्सा कर बोलीं सरकार उचक्का नहीं है जो उचक उचक कर कहीं भी पहुँच जाए सरकार काफी गंभीर है इस लिए कोई काम जल्दबाजी में नही करेगी ऐसे मुझे ऊपर से आर्डर मिलें हैं आप जाएं आपको इसके बारे में आपको पत्रों से बताया जायेगा
खर जो पत्रों की कापी मुझे मिली उसमे सेठो ने अपने फार्मोंको सही ठरते हुए बताया की खाद्य मंत्री के नगर आगमन पर उन्हें सम्मानित करने का उन्होंने जो काम किया था उसी से जल कर विरोधियों ने यह शिकायत की है
इसके अलावा वे एक क्लब के मेंबर भी है जहाँ कलक्टर साहिबा के सामाजिक प्रयासों के लिए मंत्री जी से सम्मानित करने की योजना बनी है विरोधी गन इसका विरोध के लिए इस ओछी हरकत पर उतर आयें है इसकी तस्दीक आप ऍम अल सी साहेब से कर सकतीं है हम सभी रूलिंग पार्टी के सी एम् साहिबा के जनम दिन पर ५५ किलो लडू बातें थे हो सकता है इससे भी येही सिद्ध होता है की इन आरोपों मे कोई दम नहीं है फिर भी आप चाहें टू जांच कर सकतीं है वैसे सरकार ने अख़बारों से ले कर चपरासी तक जो भी रेट तय किया है उसका तथा चंदे की जो भी रकम तय होती है हम उसका पालन करतें है टू हमारे पास अनाज दबाने का प्रश्न ही नहीं उठता
कलक्टर साहिबा ने हमारे ऊपर ही जांच बैठा दी की मैंने उनको गुमराह कर सरकार कीअभियान को भटकाने का प्रयास किया
नैतिक मूल्य ----' जो सरकारी नहीं है वही असरकारी है '

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

आरक्षन का आनंद्वोत्सव मनाएं

बधाई हो अर्जुन सिंह तथा सुप्रीम कोर्ट के महान जजों आज आपने एक एतिहासिक फैसला सुना कर वाकई मन को मोहने का ही काम किया है आज तक ओ बी सी के educatonal institution मे रिज़र्वेशन का कोटा न होने से देश को जो हानि हुई है उसे देश कभी नही भूल सकेगा \ लेकिन एक बात समझ में नहीं आती जब कोर्ट में रिज़र्वेशन की बात सरकार उठाती है तो आप सभी judges इसके लिए तैयार नहीं होते एक और फैसला मुझे याद आता है कोई १५ वर्ष पूर्व की बात है सुप्रीम कोर्ट ने पान मसाला व गुटका के pouch तथा डिब्बों की विक्री पर रोक लगा थी ( अम्बु मणि जी ध्यान दें ) तब कुछ देश भक्त पान व गुटका कंपनियों के मालिको ने माननीय कोर्ट से mercy अपील कर यह अनुरोध किया था की जो माल वह पहले से तैयार कर रखें हैं उसको बेचने की अनुमति दे दी जाए उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का दिल ऐसा पसीजा की फिर pouch पर प्रतिबन्ध नहीं लगा तथा अब तो गुटखा status symbol हो गया है ऊँचे लोग उंची पसंद सवाल है कितना ऊँचा क्या सबसे उच्च ? खैर सभी को इस न्याय का सम्मान तो करना ही होगा ऊँचे लोग उंची पसंद हम रजनीगंधा खाने वाले ऐरो गैरों को मुंह नहीं लगाते हैं वाकई मजा आ गया लेकिन क्रीमी लेयर को क्यों वंचित कर दिया जा रहा है मलाई तो सबको ही पसंद है तब खुरचन सिंह की खुरचन कौन चाहेगा वाह क्या सबूत है सफेदी का इस समय इस निर्णय ने महँगाई की बात को पीछे कर दिया २० २० की जीत की तरह इंडिया इज शाइनिंग

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

कौन वी आई पी ?

एक घटना यद् आती है प्रसंग उन दिनों का है जब गोस्वामी तुलसी दास राम कथा सुनाते थे \ उन दिनों अकबर के नव रत्नों मे से एक अब्दुर्र रहीम खानखाना भी राम कथा का श्रावण करने तुलसी दास के राम कथा के पंडाल मे धीरे से पीछे बैठ कर भक्ति का रस पान करते थे एक दिन गोस्वामी जी ने उन्हें पहचान लिया और कहा की आप जैसा भक्त व सही दरबार का नवरत्न सामान्य दर्शको के पीछे बैठ कर भजन सुने अच्छा नहीं लगता टू इस पर रहीम ने विनम्रता से जबाब दिया की जहाँ राम की चर्चा हो रही हो वहाँ रहीम की क्या औकात रहीम जहाँ है वोही उसकी थिक जगह है अर्थात जहाँ भगवान् की बात हो वहाँ सारे अहम् का त्याग कर के ही जाना चाहिए यदि हम भगवान् के पास भी अहम् के साथ जातें हैं तो समपर्ण कैसा और त्याग कैसा ?
पर आज कल जो भी ऊँचे पदों पर आसीन हैं या प्रशाशन के पदाधिकारी हैं वो धार्मिक स्थलों पर भी अपने वी आई पी होने का एहसास जताते हुए पूजा संपन्न करते है भले उससे जनता को परेशानी हो उससे उन्हें कोई मतलब नहीं है बस उनके वी आई पी सम्मान को ठेस नहीं लगाना चाहिए अभीप्रधान मंत्री के वनारस दौरे मे प्रशाशन की तरफ़ से श्रधालुओं को जो दूर दूर से आए हुए थे उन्हें तीन घंटो के लिए बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने से वंचित कर रखा जब सारी चेकिंग के पश्चात् ही कोई प्रवेश पा सकता है मन्दिर प्रंगन मे मात्र फूल और प्रसाद हाथों मे लेकर तो क्या खतरा था या प्रशासन को वी आई पी पने को बचाने का या आम जनता जिसे जनता जनार्दन भी कहा जाता है उससे वी आई पी को दूर रखने की कवायद सारे गलियों को सुबह से ही सील कर दिया गया था अघोषित कर्फ्यू का माहौल बना दिया गया क्या मिलिटरी या तानाश्हओं वाले देशो मे इससे भिन्न व्यस्था रहती होगी क्या प्रजातंत्र की यही विवशता है की गवर्नमेंट / गवर्नमेंट सेवक अपने को स्वम्भू वी आई पी मान कर भगवान् के यहाँ भी अपनी दादागिरी करें इनका बस चले तो ये (छोटे वी आई पी पुलिस और प्रशाशन के जनता के सेवक ) बाबा विश्वनाथ को किसी हरकारे /सिपाही को भेज कर अपने बंगले मे बुला लेते की बाबा चले आओ ,वी आई पी इन्तेजार नही कर सकते बाबा के यहाँ कौन वी आई पी है यह प्रश्न कौंध रहा है बाबा या जनता या ये अहम् को पुष्ट करते तथाकथित सेवको की फौज क्या ये रहीम के प्रकरण से कुछ सीख नहीं सकते

सोमवार, 10 मार्च 2008

महिला दिवस

महिला दिवस के अवसर पर एक कविता

नारी के सम्मान में देते सभी दलील ,
पोस्टर छपते रात दिन पूरे अश्लील
हैं पूरे अश्लील शर्म से आंखे झुकती ,
फिर भी नग्नता की गति न रूकती
कौन कब कली मसल दे फुलवारी के ,
आदर्शवाद का ढोल बजाते हैं नारी के
बच के रहना नारी इन नर मक्कारो से
मंचो से जो देते आह्वान देविमय नारों का

शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008

हिन्दी की दुर्गति

आज हिन्दी भाषा की त्रुटियो से आपको परिचित करना चाहता हूँ हिन्दी को बीर गति पहुँ चाने में सभी हिन्दी प्रेमियो का महती योगदान है प्रस्तुत है कुछ नमूने रेलवे टिकट घर पर लिखा है कृपया टीकट लेने लाइन मी खड़ होयें |मन करता है कि खिड़्की पर बैठे बाबुनुमा जीव को खींच लिया जाय |इसी प्रकार बस स्टेशन पर लिखा हुआ है धम्रपान न करें | जाहिर है धूम्र नही लिखा है तो धूम्र पान से कौन रोक सकता है सौचालय जायें तो सोच सोच कर शौच करना ही पडेगा | महिला मूत्रालय के स्थान पर लिखा है महिला मंत्रालय | यदि कोई विदेशी जिसे हिन्दी आती हो तो वह सोचेगा कि महिलाओ ने इतनी तरक्की कर ली है कि हर बस स्टेशन पर उनका मंत्र्यालय है वैसे नारी सशक्तिकरण में या सेक्सीकरण में ट्रेन के सौचालायो का बहुत योगदान है कुछ लोग तो कला व जीवन कि उत्पत्ति के लिए ही इन जगहों पर कलम व लेखनी से समाज को दिशा दे रहे है | रेल मंत्रालय को लाभ पहुचाने मे इनका भी योगदान महान है |
एक नाटक की समीछा में सूत्रधार के जगह मूत्रधार छाप देने से सहज ही हास्य की उत्पत्ति हो जाती है दो कवियात्रिओं कि तुलना करते हुए लिखा गया कि अमुक का स्तन दूसरे से ऊँचा है तथा विस्तृत है | बाद में ध्यान आता है कि तुलना स्तर की हो रही थी स्तन की नही इसी क्रम बंगाली डॉक्टर का किस्सा बहुत मजेदार है एक बंगाली डॉक्टर महिला मरीज से tung के स्थान पर हमेशा टांग दिखाऊ बोलते थे जब शर्माते हुए महिलाओं ने टांग दिखाने शुरू किए तो उन्होंने सुधार कर जुबान के स्थान पर जोबन दिखाओ कहना सुरु कर दिया तो पिटाई हो गयी | एक बार वह नब्ज पकर कर अपने सहायक से किसी दवा के बारे में पूछते हुए बोले पा गल हो "इशारा था पा गए " पर मरीज घबरा कर बोला पागल नहीं हूँ बुखार हुआ है | हिन्दी माँ के साथ ऐसा बलात्कार के विरूद्ध क्या कोई कानून नहीं बनाना चाहिए

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

राज क्यों हो गयी खाज

राज को खाज हो गयी है राज की राजनीती पर करारा व्यंग्य अशोक चक्रधर ने किया है
ठीक-ठाक रेशे गुंथें, रस्सी हो मज़बूत,

पत्थर को भी रेत दे, ताकत बने अकूत।

ताकत बने अकूत, मगर हम लोग अभागे,

अलग-अलग कर लेते हैं, प्रांतों के धागे।

चक्र सुदर्शन, 'राज'-नीति अलगाव ना करे,

रस्सी हो कमज़ोर, नहीं यह ठीक, ठाकरे!

अशोक चक्रधर

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

कितने सिंह ?


अभी अभी सिंहो की गणना समाप्त हुई है जिसमे सिंहो की घटती आबादी पर चिंता की जा रही है
कुल १४११ सिंहो की गिनती हुई है | हमारे प्रधान मंत्री जी भी चिंतित हैं कल एक आवश्यक बैठक में उन्होंने इस पर गहरी चिंता भी जताई| पर एक आईडिया यह है सिंह साहब कि क्यों नहीं आप राजनितिक सिंहो को इसमे सामिल कर लेते बस इन्हें जू और अभायारन्य में भेज दिया जाय यह सिंह आबादी बढाने में और शेरानियो को पटाने में बहुत काम आयेंगे आप अपने को इसमे मत गिनियेगा टू ये रही लिस्ट सिंहो की जिसे तत्काल बुक कीजिये जंगलों मे अर्जुन सिंह ,अमर सिंह , मुलायम सिंह यादव) अजित सिंह भैरों सिंह ,शिवपाल सिंह (यादव) हरभजन सिंह मिस काँटी सिंह और आखिरी में नटवर सिंह बूटा सिंह | कृपया जल्द से जल्द इस लिस्ट में और पॉलिटिकल सोशल तथाकथीत सिंहो और गीदरों को जंगल में भेजने का कार्ये करें जंगल में शेरों की सेहत जरूर सुधर जायेगी

रविवार, 10 फ़रवरी 2008

vyanga

a news published in times of india " i am not a bikaau maal" said MAYAWATI in patna rally
maya ji who told you a MALL. it is your in imagination.
neither you look like a mall nor anyone want to buy the mall collect by you.
do u remember when you look like a mall? who dare to think you like a mall.
there was many definitions of a mall but none of them fit on you. yes mall gari (goods train) is similar to you in which lot of so called sarva samaj leaders were booked on that

बुधवार, 6 फ़रवरी 2008

यस सर , जी सर

जब मैं जवान हुआ और बी.ए. करने के बाद एक फर्म में अफसर हो गया तो मेरा आज्ञाकारी व्यक्तित्व बॉस की आज्ञा के लिए बराबर ललायित रहता। 'यस सर', 'यस सर' हर बात पर कहने की ऐसी आदत लगी कि जब बॉस ने कहा कि एयर इँडिया की उड़ान बड़ी अच्छी होती है, तो मैने 'यस सर' कहकर एयर इँडिया का टिकट बॉस के साथ जाने के लिए मंगवा लिया, यद्यपि मैं इस टिकट का हकदार नहीं था, और मेरे पास उतने पैसे भी नहीं थे, जिसके कारण मुझे कर्ज लेना पड़ा। एक दिन बॉस न कहा "थम्स-अप बड़ा स्वादिष्ट होता है!" मैं 'यस सर' कहकर बिना दूसरे पेय को चखे ही थम्स-अप पीने लगा तथा बॉस को खुश करने के लिए दफ्तर के लोगों को भी इसे पीने की आदत लगवाई। मेरी दोस्ती उन लोगों से ज्यादा हुई जो 'यस सर' को पूरी तरह जीवन में साधे हुए थ और 'यस सर' कहने की दौड़ में जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा करते थे। 'यस सर' एक मंत्र है-विघ्नविनाशक, मंगलकारी मंत्र! जपते चलो।

कुछ लोगों को 'यस सर' से एलर्जी भी होती है। अतः ऐसे लोगों को फौरन भांपकर उनके लिए इस वाक्य का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा काम बिगड़ने का खतरा है। मेरे एक विद्वान मित्र को आकाशवासी मं रिकार्डिंग के लिए आमंत्रित किया गया। रिकार्डिंग के समय कार्यक्रम अदिशासी आदतन उनक प्रत्यक जवाब में 'यस सर' दोहराने लगा। वह उत्तेजित हो उठे और कार्यक्रम से उनका मन उचटने लगा। केन्द्र निर्देशक भी रिकार्डिंग रूम में ही खड़े थे। उन्होंने श्थिति को समझा और कार्यक्रम अधिशासी को 'यस सर' कहने से मना किया। इसके बाद ही मित्र का तनाव कम हुआ और रिकार्डिंग पूरी हुई। 'यस सर' का अत्यधिक प्रयोग सत् पुरुष सुनना पसंद नहीं करते। यह दोगर बात है कि सच का आतंक होता है, झूठ मित्र की तरह होता है।

कुछ लोग 'यस सर' का प्रयोग टरकाने के लिए भी करते हैं। बहुधा आफिस में यदि कोई अपने कार्य के बारे में दरयाफ्त करता है तो संबंधित लिपिक टरकाने के लिए कह देता है-" यस सर, आपका काम हो रहा है।" यदि आप अचानक किसी अवांछित जगह पर पहुंच गए हो तो स्वागतकर्ता 'यस सर' कहते हुए आपको इस तरह से घूर सकता है, मानो कह रहा हो-' मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?' 'यस सर' के ऐसे आदरभाव में 'भाव' महत्वपूर्ण होता है।

'यस सर' से संबंधित एक घटना याद आती है, जो अपने में बड़ी शिक्षाप्रद है। एक दिग्गज सेनापति न अपने पुत्र के आपरेशन के लिए, जिसे हृदय रोग था, एक बड़ी रकम की सहायता मुख्यमंत्री से मांगी। मुख्यमंत्री ने तुरंत मुख्य सचिव को आर्थिक सहायता दिलवाने के लिए कहा। मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री से कहा-'यस सर!' मुख्य सचिव ने स्वास्थ्य सचिव से मुख्यमंत्री की बात कही। स्वास्थ्य सचिव ने कहा 'यस सर!' स्वास्थ्य सचिव ने स्वास्थ्य निर्दशक को वह आदेश पहुंचाया- उन्होंने कहा- 'यस सर!' स्वास्थ्य्य निर्देशक ने उसी तरह उप निर्देशक को कहा। उन्होंने भी कहा-'यस सर!' पूरा तंत्र जैसे सहायता के लिए बेचैन हो गया।

कुछ दिन बाद स्वंत्रता सेनानी की पुनः मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। मुख्यमंत्री ने कहा "आपरेशन सफल हुआ न, बच्चा तो अब स्वस्थ होगा? किंतु एक बात, प्राप्त हुए रुपयों के खर्चे का ब्यौरा, रसीद के साथ सरकार को भज दें, जिससे हिसाब-किताब ठीक रहे।" स्वतंत्रता सेनानी ने दुखी होकर कहा-" रुपये कहां मिले, ऊपर से नीचे तक 'यस सर' हो गया।" मुख्यमंत्री ने आश्चर्य व्यक्त किया-"नहीं मिले? मैं तुरंत मुख्य सचिव को बताता हूँ।" मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव स रौब से पूछा-" इन्हें लड़के के आपरेशन के लिए रकम क्यों नहीं मिली?" मुख्य सचिव ने कहा- " सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य सचिव से पूछता हूँ।" स्वास्थ्य सचिव ने कहा- "सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य निदेशक से पूछता हूँ।" निदेशक ने कहा- " सॉरी सर, मैं उप निदेशक से पूछता हूँ।" उप निदेशक ने कहा-"सॉरी सर, मैं आफिस में पता लगाता हूँ।" इतना सुनकर बचारे स्वतंत्रता सेनानी ने मुख्यमंत्री से कहा-" महाशय! पहले 'यस सर' था, अब 'सॉरी सर' ऊपर से नीचे तक है। कृपा करके इन्हें ज्यादा तकलीफ न दें, इस बीच मेरा बच्चा नीचे से ऊपर चला गया।...यस सर।"

गुलामी के समय की शासन प्रणाली, संचिका परिचालन विधि तथा डेस्क सिस्टम की लीक पर चलने वाली मानसिकता की उपज है - 'यस सर', और 'सॉरी सर'। ये दोनों मौसेरे भाई, नौकरशाही में एलीटिज्म को कायम रखते हुए नौकरशाही का, व्यवस्था के प्रति बिकने का व्यापार चालू रखते हैं। आज के प्रशासन तंत्र की संरचना इन मुहावरों से इस तरह प्रभावित है कि दफ्तरों में इनके प्रयोग की अनावश्यक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना मुश्किल हो गया है। एक तीसरा शब्द युग्म है-'एक्सक्यूज मी', जो प्रेम-त्रिकोण बनाने के लिए 'यस सर' ' सॉरी सर' के साथ जुट जाता है तथा सूखे पांव वैतरणी पार करवाने में लोगों का सहायक होता है। इस शार्टकट के जमाने में इन तीनों से बनी त्रिवेणी में स्नान कर 'हर-हर गंगे' कहते हुए कोई भी अपना अभिष्ट सिद्ध करने में सफल होगा। यह जान जाइये कि इन तीनों में कहीं कोई अकड़ नहीं, अहंकार नहीं, अनास्था नहीं, वरन् विनय, करुणा और सेवा के भाव हैं, जो पत्थर को भी मोम बना देते हैं।

आज के इस बहुरंगे युग में 'यस सर' जैसा बहुरंगा संक्षिप्त वाक्य शायद ही मिले। 'यस सर' आज के युग की एक आत्मिक नहीं, यांत्रिक अभिव्यंजना है, जिसका प्रयोग अत्यंत भ्रामक और छलपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसके अर्थ के सत्यापन के लिए आपको अपने मन को टटोलना होगा, व्यक्ति की परख करनी होगी तथा परिस्थितियों को भांपना पड़ेगा। व्यवहार में 'यस सर' का न तो कोई निश्चित अर्थ है, न ही उपयोग; फिर भी हमारी जिह्वा से यह चासनी की तरह टपकता है। विनम्रता प्रदर्शन के लिए यह सबसे फुर्तीला मुहावरा बन गया है। भले ही हमारी आवाज में दम न हो, हमारा शब्द-ज्ञान काफी कमजोर हो, किंतु सफलता तलवे चाटेगी, यदि 'यस सर' के सार्थक प्रयोग से हम भिज्ञ हो, क्योंकि 'यस सर' कहना सामाजिक शिष्टाचार का एक अंग बन गया है। यदि भरोसा न हो तो आप इस 'यस सर' को भूलकर देखें, मेरा दावा है कि यह दुनिया भी आपको बिसार देगी। इस 'यस सर' में जादू है। इसका प्रयोग करके कई अफसरों ने अपने मंत्री को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है और राजनीतिक दबाव के बावजूद इस 'यस सर वादी' अफसर की ' अवसरवादिता' चलती रहती है। 'यस सर' वह सोने की तलवार है, जिसमें धार नही होती, केवल चमक होती है।

'यस सर' के संबंध में अब तक जो मैं कह रहा था, वह समाज के वर्तमान और प्रत्यक्ष रूप का विश्लेषण करता है, किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। जरा इसकी परंपरा दर्शन और मनोविज्ञान पर विचार किया जाए तो अनेक तथ्य उपलब्ध होंगे। फिर आप खुद भी 'यस सर', 'नो सर ' का अर्थ पटल खोलने में समर्थ हो सकेंगे। 'यस सर' अथवा ' जी हां' एक स्वीकृति सूचक अभिव्यंजना है। चाहे-अनचाहे इस व्यंजना के प्रयोग में 'जी हां' का अर्थ ' जी नहीं' हो जाता है। अलंकार शास्त्र में कभी-कभी प्रयुक्त शब्द का अर्थ उल्टा हो जाता है, जैसे पंडित का अर्थ मूर्ख और पहलवान का अर्थ दुर्बल हो जाता है। कभी-कभी मौन भाषा का प्रयोग भी आवश्यक हो जाता है। कहा गया- 'मौनं स्वीकृति लक्षणम्'। अर्थात 'नो सर'। बड़ा मुश्किल है समझना। शब्दों के पीछे अर्थछाया की जो रेखा बनती है, वही महत्वपूर्ण है। यह रेखा एक अबूझ पहेली-सी है।

बुद्ध से अनेक प्रश्न पूछे गए थे। जैसे 'ईश्वर है?', 'ईश्वर नहीं है?' 'आत्मा है?', ' आत्मा नहीं है?' ' पुनर्जन्म होता है?', 'पुनर्जन्म नहीं होता है?' इन सभी प्रश्नों के उत्तर में बुद्ध मौन रहे। शिष्यों ने इस मौन की व्याख्या की। कहा-' बुद्ध के मौन का अर्थ है-' हां' (यस सर)। दूसरे पक्ष ने कहा- बुद्ध के मौन का अर्थ है-'नहीं' (नो सर)। मौनं स्वीकृति लक्षणम्। मौनं अस्वीकृति लक्षणम्। इसी आधार पर बुद्ध को एक पक्ष ने अऩीश्वरवादी, अनात्मवादी, पुनर्जन्म- विरोधी माना, तो दूसरे पक्ष ने इसी मौन के आधार पर ईश्वरवादी, आत्मवादी और पुनर्जन्मवादी मान लिया। शताब्दियों तक विवाद बना रहा।

बहुत बाद में नागार्जुन ने इसका समाधान प्रस्तुत किया। कहा-' सारे प्रश्न ही गलत थे। अतः गलत प्रश्न (फैलेसस क्वेश्चन) का उत्तर हां या ना में नहीं हो सकता।' प्राश्चिकों ने पूछा ' जैसे?' नागार्जुन ने कहा-' यदि मैं आपसे एक प्रश्न करूँ और आप हां या ना में जवाब देकर देखिए। प्रश्न है-क्या आपने अपनी मां को झाड़ू से पीटना बन्द कर दिया? आप हां और ना कुछ नहीं कह सकते। दोनों गलत होंगे, क्योंकि प्रश्न ही गलत है। इसलिए ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म जैसे गढ़े हुए शब्द अननुभूत तथा अदृष्टपूर्व हैं।' जैसे कोई कहे-आपने आपने नदेज्दा फ्योदोरीसना को देखा है? कोई क्या उत्तर देगा? रूसी भाषा का यह शब्द उत्तरदाता के लिए अपरिचित है। अतः'यस सर', ' नो सर' दोनों बेमानी हैं। वैस कहा भी जाता है कि विकल्पहीन सच, आपको कहीं का नहीं छोड़ता। और आज तमाम दुनिया निर्मूल और भ्रांत प्रश्नों पर बिना समझे-बूझे 'यस सर', 'नो सर' कहे जा रही है। झूठे प्रश्न, झूठे उत्तर। लेकिन मलुष्य तो विवक्षु प्राणी है। वह बोलना चाहता है। दूसरे वह किसी-न-किसी के अधीनस्थ है। अधीनस्थता ना नहीं जानती । वह हां कहलवाती है। 'यस सर' एक विवश सरेंडर है, यही ठकुरसुहाती और आत्मप्रवंचित खुशामद-भरी वाणी है। हम 'यस सर' की दासता में फंसे हैं। सभी दास हैं। ये दास भक्तिकाल के सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास, केशवदास, मलूकदास, रविदास नहीं, वरन् बॉस-दास हैं। (jeetendra sahay creation on lekhni)

बुधवार, 30 जनवरी 2008

ब्राह्मण हूँ मैं इस तरह

मैं हिन्दू हूँ, जी हाँ एक हिन्दू,
कुछ गलत रुढ़ियों एवं प्रथाओं का एक बिन्दु,
हाँ मैं एक हिन्दू।
ना-ना-ना,
हिन्दू तक तो ठीक था, पर जानते नहीं,
मैं हिन्दू में ही हूँ, ब्राह्मण, पंडित, चंदनधारी,
अच्छे कर्मों का अधिकारी।
छूना मत मेरा भोजन वर्ना वह अपवित्र कहलाएगा,
मैं रह जाऊँगा भूखा-भूखा, जानते नहीं,
तुझे मेरा भोजन छीनने का पाप लग जाएगा।
मैं भी जानता हूँ, इस अन्न को तूने ही उगाया है,
कूट-पीसकर चावल बनाया है,
ये मिर्च व मसाले हैं तेरे खेत के,
नमक को भी तूने ही सुखाया है।
जहाँ तक है इस बरतन का सवाल,
तूने ही दिया इसको यह आकार।
कुछ भी हो तुम क्षुद्र ही तो हो,
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ।
ये ठीक है इस कूप को खोदने में,
हर जीव को जल देने में,
तूने खून-पसीना एक किया,
पर अब अपना लोटा डुबा,
इस वक्त इसे ना करो अपवित्र,
पहले मुझे जल भर लेने दो,
हींकभर पी लेने दो, वर्ना
मैं जल बिन मीन हो जाऊँगा।
देखो कितनी तेज बारिश है,
मैं भीग रहा हूँ, निकलो झोपड़ी से बाहर,
मैं कैसे बैठूँ तेरे साथ, अपवित्र हो जाऊँगा।
ब्राह्मण हूँ।
मैंने कब कहा कि ये कपड़े,
जो मैंने पहने हैं, तूने नहीं बनाए,
अरे साफ कर दिए तो क्या हुआ,
यह अपवित्र हुआ ?
पर मेरे छूने से पवित्र हुआ,
मैं इतना देखता चलूँ तो पागल हो जाऊँगा,
देख ! इसे अब मत छूना, मैं ब्राह्मण हूँ।
आओ बैठो पैर दबाओ, थोड़ा ठंडा तेल लगाओ,
करो धीरे-धीरे मालिश, दूँगा तूझे ढेर आशीष,
पर तुम मुझको छूना नहीं, अपवित्र हो जाऊँगा।
ब्राह्मण हूँ।
मैं मानता हूँ, तेरे बिन मैं जी नहीं सकता,
हर वक्त, हर क्षण मुझे तेरी जरूरत है,
जबतक तू ना देता बनाकर शादी का डाल,
नहीं हो सकता मेरा शुभविवाह।
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ।
मेरी माँ भी कहती थी, मेरे पैदा होने के वक्त,
तू माँ के पास रह रही थी, अरे यह क्या ?
मेरे जमीं पर गिरने के वक्त तो,
माँ दर्द से छटपटा रही थी,
उस समय तू मुझे सीने से लगाए,
प्रेम से चूमचाट रही थी।
पर देख अब मुझे मत छूना, ब्राह्मण हूँ।
मैंने धारण किए जनेऊ, माथे पर चंदन,
करूँगा प्रभु का पूजन,
पर तू कर पहले मेरा पूजन,
मैं ब्राह्मण हूँ।
मैं स्पष्ट कहता हूँ,
तेरी कृपा से ही जिंदा रहता हूँ,
पर इससे क्या, यह तेरा एहसान नहीं,
मेरा ही एहसान है तुझपर।
मैं ब्राह्मण हूँ, हूँ, हूँ। छूना मत।
अपवित्र हो जाऊँगा।
* original poem by k. p saxena "doosre"

सोमवार, 28 जनवरी 2008

अमिताभ की बात

आज अखबारों में खबर छपी है कि बिग बी ने अपनी बहु ऐश्वर्या के नाम से महिला डिग्री कालेज का भूमि पूजन किया है बाराबंकी मी जमीन के मामलें मी किरकिरी कराने के बाद यह विचार कहाँ से आ गया सोचने कि बात है
बिग बी कहलाने वाले महानायक ?(किस रुप में पता नहीं ) ने आज तक समाज के लिए क्या योगदान किया है यह तो वह खुद ही बता सकते हैं सुनामी में भी उनका रिलीफ फंड में कोई दान का किस्सा सुनाने में नही आता तो अमर सिंह के जन्म दिन पर यह शुभ काम का ख्याल कैसे आ गया ? बहु कि प्रतिक्रिया सटीक है अछा होता यदि यह स्कूल हरी वंश जी या तेजी बच्चन के नाम पर रहता क्या जबाब है किन्तु बिग बी के तो पिता तुल्य मुलायाम है भाई अमर हैं तो पुरखो का नाम कैसे याद आता खैर आशा करनी चाहिऐ कि मुलायम के जन्म दिन पर कोई और नेक काम बिग बी के द्वारा हो !! लेकिन ये चार चार एक्स cm क्या कर रहे थे वहाँ । जहाँ चार यार मिल जाएँ .....

कैलाश गौतम की कवितायेँ

अच्छा है संसार में यह किस्मत का खेल

कातिल को कुर्सी मिले फरियादी को जेल



सब कुछ उल्टा हो गया आज कार्य व्यापार

थाने मी जन्माष्टमी आश्रम में हथियार

दूध दुहे बलता भरे गए शहर की ओर,

दिन डूबा दारू पिए लौटे नन्द किशोर

गाँधी लोहिया जे पी करते पश्चाताप,

कैसे अनुयाई हुए अरे बाप रे बाप



बिके हुए है लोग ये कैसे करे विरोध ,

कभी आपने सुना है हिजड़ा और विरोध



भ्र







मंगलवार, 8 जनवरी 2008

some funny definition

Some Good jokes

Different Phases of a man:
After engagement: Superman
After Marriage: Gentleman
After 10 years: Watchman
After 20 years: Doberman

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There is only one perfect child in the world and every mother has it.
There is only one perfect wife in the world and every neighbor has it
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Prospective husband: Do you have a book called "Man, The Master of
Women"?
Sales girl: The fiction department is on the other side, sir.
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The world's thinnest book has only one word written in it:
"Everything"
and the book is titled: "What Women Want!"
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A man who surrenders when he's WRONG, is HONEST.
A man who surrenders when he's NOT SURE, is WISE.
A man who surrenders when he's RIGHT, is a HUSBAND

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Girlfriends r like chocolates, taste good anytime.
Lovers r like PIZZAS, Hot n spicy, eaten frequently.
Husbands r like Dal RICE, eaten when there`s no choice
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Man receives telegram: Wife dead-should be buried or cremated?
Man: Don't take any chances. Burn the body and bury the ash.
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Q: Why dogs don't marry?
A: Because they are already leading a dog's life!
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Fact of life: One woman brings you into this world crying & the
other ensures you continue to do so for the rest of your life!
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Q: Why doesn't law permit a man to marry a second woman?
A: Because as per law you cannot be punished twice for the same


offence
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What men want: A woman who can cook, a woman who earns good money, a
woman who loves him & a system to make sure that those 3 women never
meet each other!
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Lady 2 her maid: Oh Kanta, I have reason to suspect that my husband
is having an affair with his secretary."
Kanta : I don't believe it! U r just saying that 2 make me jealous!"
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Man: I want a divorce. My wife hasn't spoken to me in six months.
Lawyer: Better think it over. Wives like that are hard to get!
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The bride, upon her engagement, went to her mother & said, "I've
found a man just like father!"
Mother replied, "So what do u want from me,
sympathy?"
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सोमवार, 7 जनवरी 2008

स्त्री मुक्ति चर्चा

स्त्री पुरुष संबंधो पर राजेंद्र यादव की बेलाग टिप्पणियो ने हिन्दी जगत में हमेशा तूफान खड़ा किया है पर उनकी बातें हमेशा सोचने को विवश करती हैं

१ स्त्री को हजारो साल से देह के सिवा कुछ नहीं माना गया सारे साहित्य कलाओं में स्त्री के सारे उपमान कुच- नितम्ब -कटि के ही मिलेंगे बहुत कम जगह स्त्री के मन की बात की गयी है जब तक स्त्री अपनी देह से बाहर नही निकलेगी उसके बारे मी खुद फैसला नहीं लेटी तब तक उसकी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है

२ - पुरुष ने divide and rule का पहला प्रयोग स्त्री पर ही किया इससे एक हिस्सा दुसरे हिस्से पर शासन करने में मदद करता है हमनें स्त्री को दो हिस्सों में बांटा है स्त्री कमर से उपर आनंद है कविता है कमर से नीचे स्त्री नरक का द्वार है

३- मूलतः पुरुष स्त्री से डरता है इसी लिए उसके बारे में अजीब कल्पनाएँ गढ़ता रहता है जैसे स्त्री सुपर सेक्स है स्त्री मे काम वासना आदमी से आठ गुना ज्यादा होती है पुरुष स्त्री को संतुष्ट नहीं कर सकता है इसी लिए वोह उसे कुचलता रहता है आज तक आपने कभी स्त्री की काम वासना बढ़ाने के लिए दवाओं का विज्ञापन देखा है इन्टरनेट की कुछ साइट्स अपवाद हो सकतीं
स्त्री वास्तव में हमारे लिए आज भी देह पहले है कुछ और बाद में हम उसके अंगो के लिए क्या क्या उपमानों का प्रयोग करते हैं संस्कृत में पिन पयोधरा ,बिम्बधारी क्षीण -कटी बिल्व - स्तनी सुभगा आदि
सारी संस्कृति सारी नैतिकता सारा धर्म स्त्री की देह पर ही आकर क्यों टिका हुआ है अजीब बात है स्त्री का जरा सा सरीर दिख जाए तो अश्लील है ग़लत है संस्कृति के खिलाफ है सारा धर्म और संस्कृति का ठेका सिर्फ़ स्त्री देह के ही इर्द गिर्द क्यों घूमता है समझ में नहीं आता कभी किसी पुरूष के लिए किसी ने नहीं कहा की उसकी इस हरकत से संस्कृति खतरे में है अगर आदमी बाजार में दीवार के सहारे जिप खोल कर खड़ा हो जाए तो कोई बात नहीं किंतु यदि किसी मजबूरी में औरत येही काम छिप कर भी करे तो अश्लील घनघोर अश्लील यदि आँचल से दूध पीते हुए बालक ने जरा सा आँचल हटा दिया तो स्त्री बदचलन और अश्लीलता की वाहक हो जाती है
कृपया इस पर विचार करें की ये दोहरी मानसीकता कब तक चलेगी

गुरुवार, 3 जनवरी 2008

ज़माने की बात

तोड़ने से प्रण पितामह डर रहें हैं

इसलिए शकुनी सियासत कर रहे हैं
राज का खुशहाली का पूछा तो बताया
लोग निष्ठा की तिजारत कर रहें हैं
रोशनी पर तफसरा अन्धो के आगे
आप कैसी हिमाकत कर रहे है
जो छिपे बैठे थे कल तक बीहड़ों में,
आज जलसों की सदारत कर रहें हैं
इस कदर सच बोलना अच्छा नहीं हैं ,
क्यों जमानें से अदावत कर रहे हैं

जिंदगी का मसला

अधूरेपन का मसला जिन्दगी भर हल नहीं होता ,
कहीं आँखे नहीं होती कहीं काजल नहीं होता
रहे आदत पसीना पोंछने की आस्तीनों से ,
मयस्सर हर घड़ी महबूब का आँचल नहीं होता
अजब सी बात है इस सौ बरस की जिन्दगी मे भी ,
जिसे जिस पल की चाहत है वही इक पल नहीं होता