गुरुवार, 23 जुलाई 2009
गे पर इतनी है तौबा क्यों
अगर स्त्री-पुरुष में सेक्स ही नैचरल है और जो यह नहीं करता, वह अननैचरल और मानसिक तौर पर बीमार है तो फिर ये सारे ब्रह्मचारी क्या हैं ? वे लोग जो सेक्स से ही दूर रहते हैं (या दूर रहने का ढोंग करते हैं), उन्हें तो हमारा समाज पूजता है, उनकी चरणसेवा करता है, उनके गुणगान करता है। तब किसी को याद नहीं आता कि ये लोग प्रकृति के नियमों के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह कैसा न्याय है कि ब्रह्मचारियों के अननैचरल बिहैवियर की हम पूजा करते हैं और होमोसेक्शुल्स के अप्राकृतिक व्यवहार की निंदा।
मजे की बात है कि धार्मिक संतो ने सबसे पहले इसका jordar विरोध किया है जैसे उनके मठों पर समलिंगियों ने हमला बोल दिया है इस कानून के आने से मठो के अस्तित्व पर क्यों खतरा लग रहा है ????? समाज को ही निर्णय लेने दे ,,कानूनी मान्यता मिल जाने मात्र से समाज इसे स्वीकार कर ले गा ???
अगर आप शादीशुदा हैं तो क्या आप नेचर के नियमों का पालन कर रहे हैं? आखिर किन कुत्ते-बिल्लियों में शादी होती है? किन मछलियों और मेढकों में एक ही पति या पत्नी से बंधे रहने की अनिवार्यता है? नहीं है। तो इसका मतलब यही हुआ कि शादी करके हम नेचर के नियम को तोड़ रहे हैं। लेकिन क्या हम उसे गलत मानते हैं? क्या शादी करने वाले को नीची नज़रों से देखते हैं?
मैं नहीं कह रहा कि शादी गलत है। समाज और परिवार के विकास में विवाह की ज़रूरत है और शायद आगे भी रहेगी। लेकिन उससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह नैचरल है। ठीक वैसे ही जैसे कि हमारा कपड़े पहनना नैचरल नहीं है, गुफाओं की जगह एयरकंडिशंड घरों में रहना नैचरल नहीं है, पैदल चलने के बजाय कार आ बस में चलना नैचरल नहीं है। यानी हम ऐसे बहुत से काम करते हैं जो नैचरल नहीं है। अपनी इच्छा और सुविधा के लिए हमने नेचर के नियमों को तोड़ा है, उसके उलटे जाकर काम किया है और आगे भी करेंगे।
कहने का मतलब यह कि अगर कोई नेचर के खिलाफ काम कर रहा है तो हम उसे गलत नहीं कह सकते। जैसे कोई ब्रह्मचारी सेक्स से दूर रहना चाहता तो मैं कौन होता हूं जो उसे कहूं कि नहीं भाई, तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। वैसे ही अगर कोई पुरुष किसी पुरुष के साथ प्यार या सहवास कर रहा है, तब भी मेरा कोई हक नहीं बनता कि मैं उसे रोकूं कि तू गलत कर रहा है। न मेरा न आपका।
होमोसेक्शुऐलिटी पर एक आरोप यह भी है कि यह प्रवृत्ति भारतीय रुझानों के खिलाफ है और पश्चिम से इंपोर्टिड है। इस शिकायत के दो हिस्से हैं। पहले भारतीय परंपरा की बात करें तो यह कहना बहुत मुश्किल है कि भारत में यह कबसे है और कितनी व्यापक है क्योंकि आम तौर पर लोग अपना यह रुझान उजागर नहीं करते। लेकिन भारतीय यौन दर्शन की दो महत्वपूर्ण विरासतों – कामसूत्र और खजुराहो की मूर्तियां इस बात की गवाह हैं कि समलैंगिकता हमारे देश के लिए कोई अनूठी अवधारणा नहीं है।
फ़िर ये हाय तौबा क्यों / भारतीय संस्कृति व समाज इतना बोल्ड है कि ख़ुद ही इसका इलाज ढूंढ लेगा
नव भारत से साभार
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
जय हो एस सी तूने लाज रख ली
मैं न तो विधि का ज्ञाता हूँ और न ही इसके बारे में ज्यादा पढ़ता ही हूँ लेकिन कुछेक फैसलों के बारे में मेरा माथा चकराता है कि क्या ऐसा भी होता है कि न्यायिक सक्रियता के इतने शोर शराबे में कुछ राजनितिक मामल्लों में सर्वोच्च संस्था कभी कभी इतनी तेजी दिखाती है मानो फलां मामले में दो चार दिनों में ही आर पार का फैसला हो जाएगा फ़िर सी बी आई को लताड़ पड़ती है कि उसने चार्ज शीट ही लचर बनाई और मामला फुस्स
भाई दिनेश राय द्विवेदी जैसे लोग इस बात को बेहतर ढंग से बता सकतें है कि क्या कैबिनेट से सार्वजनिक धन
के दुरुपयोग के या जन कल्याणकारी न होने के दावों को इस आधार पर कि वह कैबिनेट से duly pass है कोर्ट कोई एक्शन नहीं नहीं ले सकती यदि ऐसा है तो विगत कई एतिहासिक फैसलों में जहाँ कोर्ट ने सरकार के फसलों पर रोक लगाई थी क्या वे सभी कैबिनेट से पास नहीं हुए थे क्या ???
आज के निर्णय के बाद ऐसा लगता है कि कैबिनेट ही सर्वोच्च है मैंने सपना देखा है कि उसी पार्क में दिल्ली के कुछ और महानुभावों कि मूर्तियाँ लगाने का फैसला कैबिनेट ने ले लिया है तथा शीघ्र ही इन महानुभावों कि मूर्तियाँ लगेंगी तथा यू पी की राजधानी चिकमंगलूर करने का भी फैसला भी जल्द ही कैबिनेट की आगामी बैठक में पास होगा जिससे सर्व समाज के लोगों के लिए इसे खाली कर के पार्क में ११ लाख हाथियों की मूर्तियाँ लगाई जा सके ताकि राज्य के हर दस आदमी के हिस्से में एक हाथी की मूर्ति आ सके
हे प्रभु इन्हे माफ़ करना क्योंकि वे सब कुछ जानते है की उन्होंने क्या किया है
रविवार, 31 मई 2009
तम्बाकू रहित विश्व दिवस


क्या आप तम्बाकू के किसी उत्पाद गुटका सुरती सिगरेट आदि का सेवन करते हैं तो आज के दिन इन चित्रों को देखे और इसमे अपनी छवि भी जोड़ लें ये वो लोग हैं जिनको तम्बाकू ने अपना शिकार बनाया है
क्या आप इन चित्रों में अपने को देखना चाहते हैं तो आज ही विचार करें एक बात और
महत्वपूर्ण है की तम्बाकू का पौधा अकेला ऐसा पौधा है जिसके किसी भी भाग को कोई प्राणी नहीं गलती से३ भी नहीं खाता कई जगह किसान इसे अन्य फसलों से जानवरों को दूर रखने के लिए झाड़ की तरह प्रयोग करतें है इस तम्बाकू को एक फंगस व मनुष्य ही सेवन करता है
उ प्र में भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारी हल्ला बोल अभियान
कभी कभी अपने आस पास भी इतना सारा व्यंग्य और विद्रूपता मिल जाता है की श्री लाल शुक्ला के राग दरबारी जैसे कई उपन्यास सृजित हो जायें एक सरकारी बैठकजिसमे मुख्या मंत्री के आदेशों के अमल हेतु तथा गरीबों को कैसे फ़ौरन राहत मिले तथा ऐसा लगे की सरकार गरीबों मजलूमों की हिमायती है क्या बदलाव लाया जाए जिस पर शीर्ष प्रशाशनिक अधिकारीयों की एक महत्वपूर्ण बैठक के कुछ अंश आपके सामने रख रहा हूँ यह कोई कल्पना नहीं है सत्य है तथा जिन लोगो को इस बैठक में शिरकत करने का मौका मिला वे इसकी हकीकत समझते होंगे मैं शीर्ष दो अधिकारीयों की निजता को गुप्त रखते हुए मीटिंग के संवाद को पढ़ें
बड़े साहब -- भाई मीटिंग बुलाने का ये उद्देश्य है की कई ऐसे विभाग जो जनता से सीधे जुड़े हैं उनमे जनता का कोई काम बिना पैसे दिए नहीं हो रहा है ये विभाग मुख्य मंत्री जी की नजरों में हैं अतः इन विभाग के अधिकारीयों के जैसे पंचायत विकास समाज कल्याण , ब्लाक , तहसील , निर्माण विभाग को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी की जनता को कोई घूस न देनी पड़े
छोटे साहब --- सही कहा आपने सर मैं भी ये महसूस करता हूँ की कुछेक विभाग ऐसे हैं जिसमे भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है तथा बाबू व अफसर दोनों भाई चारा बना कर जनता व विभाग दोनों को चुना लगा रहे हैं
बड़े साहब --- भाई ये सब ऐसे नहीं चलेगा नहीं तो आप सब कड़ा दंड सहने को तैयार रहो हम लोग वो सब बात नहीं बताना चाहते जो हम लोग अपनी बैठकों में सुन कर आते हैं लेकिन यू विल बी इन हॉट वाटर इफ यू विल नत अय्बल to चेंज योर वर्क कल्चर ॥ that is last एंड फाईनल है न जाने अबकी सी em ke daure me kaun बचेगा या मरेगा
छोटे साहेब -- सर कब है दौरा
बड़ा साहब -- बहुत जल्द ही शायद १ माह में ये मीटिंग हॉल का ऐ सी भी अच्छा नहीं है मैं चाहता हूँ की इसमे चार पञ्च ऐ सी लग जाए कहन से इंतजाम किया जाए कुछ बताइए मुझे कहना पड़ेगा
छोटा साहिब --- अरे नहीं सर इसमे कौन सी बड़ी बात है मैं तो सोच रहा हूँ की इस मीटिंग हॉल की चारो दीवाल पर चार चार ऐ सी लगा दिया जाए मेनेज हो जाएगा सर , सप्लाई आफिसर परिवहन , विक्रीकर , निबंधन विकास पंचायत सभी विभागों से ऐ सी की व्यस्था तीन दिनों में हो जायेगी किसी को कुछ कहना हो तो अभी बता दे नहीं तो मैं अन्य विभागों से बात करूँ
एक सन्नाटा फ़िर बारी बारी से तथा समवेत स्वर से नहीं सर ये तो हो जाएगा सर आप ब्रांड बता दें सर
बड़ा साहब -- एल जी का ठीक रहेगा २ टन का हाँ एक बात और है इस मीटिंग हाल का फर्नीचर व कालीन भी पुराना हो गया है इसे भी बदल दिया जाए तो बेहतर होता
छोटा साहब --- जी सर मैं यही कहना चाहता था सर बहुत दिनों से हो जाएगा सर आपको चिंता करने की जरूरत नही मैं अभी वन विभाग के तिवारी को कहता हूँ आज मीटिंग में नहीं आया है
बड़ा साहब -- नहीं ये सब जरूरी चीजे हैं मीटिंग के लिए ... हाँ तो मैं फ़िर दोहरा दूँ की हम सबको कार्य संस्कृति बदलनी होगी गाँव का दलित गरीब का शोषण कौन कर रहा है उसे मौके पर जा कर चिन्हित कर इन बदमाशों को जेल में डालना होगा इसके लिए सभी अफसर कल से ही गाँव में जाना शुरू कर दें
एक बात का जरूर ध्यान दें की आपका बाबू जो घूस लिए बिना काम नहीं करता उस पर कसे अंकुश लगाया जाय मेरे स्तर से जो लिखना हो लिखवा लें लेकिन किसी भी हालत में ये सब बंद होना चाहिए
छोटा साहब --- जी सर यही तो सी एम् साहिबा चाहती हैं change we believe in ।
इसके बाद यह गुप्त मीटिंग समाप्त हो जाती है इसी संदेश के साथ की बदलाव दिखना चाहिए
राम जाने क्या क्या देखना बाकी है इस जनता को
रविवार, 24 मई 2009
कई इच्छाए जो टूट गयीं चित्रों की जुबानी
शुक्रवार, 22 मई 2009
जनादेश धत तेरे की

ये कैसा जनादेश मिल गया लगता है मूंग की खिचडी खा रहे मरीज को माल पुआ मिल गया हो अब बताइए मरीज की हालत क्या होगी देश को पता नहीं किसकी नजर लग गई जो ये जनादेश आ गया
वैसे जनादेश , सर्वानुमति आदि शब्दों को लोकप्रिय बनने वाली बी जे पी स्वयं सकते में है इस मूर्ख मने जाने वाली जनता ने लुटिया ही डुबो दी तमाम फ्रान्तिकारी नेतावो के स्वप्निल गर्भ जिसका ultrasound वे देख चुके थे उनका गर्भपात हो गया वह भी इस तरीके से की आँख से आंसू भी नहीं निकला
मैंने राम विलास जी से पूछा तो उन्होंने बताया की महा सेल के लिए उन्होंने MRP का टैग भी अपने कुरते में सिल्वा लिया था लेकिन सत्यानाश हो इस जनादेश का
लेफ्ट के लोगो की व्यथा कुछ और तरीके की थी तीन माहो से वे अपने कुरते घडे में सिकुराने के लिए डाले बठे थे तथा कपालभाती कर रहे थे जिससे आने वाले वक्त में मुंह फुला कर साँसों को रोका जा सके यह साधना भी बेकार गई कामरेड करात तो शीशे के सामने मुंह फोलाने व बिचकाने का क्रश कोर्स भी सीख चुके थे जो सरकार चलने में काम आती लेकिन सब बेकार हो गया
रही बात पी एम् इन वेटिंग की तो हाय रे किस्मत इतने दिन पहले से टिकट लिया हुआ था वेटिंग कन्फर्म होना तो दूर आर ऐ सी में भी नहीं कन्वर्ट हो सका आब जो नै शेरवानी का कपडा दरजी को दिया था उसका ६ क्च्छे सिलवाने पड़े हैं जो मोदी जैतली राजनाथ वन्काया नायडू सहनावज तथा शिवराज को देनी पड़ी हैं
मजबूती दिखने के लिए जिम वाले भाई का किराया भी बकाया चल रहा है बदन में दर्द अलग से हो रहा है जिम जाना जो छोड़ दिया ,अच्छा होता शरीर की मजबूती की जगह दिमागी मजबूती के लिए बच्चन वाला नवरत्न तेल ही लगता ठंढा ठंढा कूल कूल
वैसे मुझे लगता है की बच्चन जी को अपने ठंढे तेल की मालिश इन नेतावों की करनी चाहिए थी प्रोडक्ट की अच्छी बिक्री भी हो जाती तथा आमदनी भी हो जाती मेरे इतना कहना था की बच्चन उखड गए कहने लगे की क्या मैं घास खोद रहा हूँ भाई अमर सिंह के आर्डर पर सारी सप्लाई चौथे फ्रंटको कराने में ही परेशान हूँ तुम भी परेशान कर रहे हो लल्लू
प्रेम जोशी तेरे जज्बे को सलाम
इंदौर में विकास के नाम पर पुराने पीपल बरगद आदि बृक्षों को कटता देख कर जोशी जी ने इन पेडो को काटने के पूर्व ही इंदौर के बाहरी इलाकों में पुनः लगाने यानी retransplant करना शुरू कर दिया इन्होने एक संघठन बना रखा है जिसमे अपने संसाधनों के द्वारा जे सी बी मशीन खरीदी है तथा पेड़ को काटने के पूर्व उसकी बाकायदा पूजा करके उसके भारी वजन आदि को ध्यान में रख कर उसकी डालियों की छंटाई कर उसे जड़ से उखाड़ कर ट्रक्टर पर लाद कर अन्यत्र स्थान पर जिसका चयन वे स्वयं करते हैं वहां इसे पुनः स्थापित कर देते हैं
इस प्रकार इनके द्वारा करीब ११० ऐसे पुराने लगभग १०० - २०० वर्ष पुराने विशालकाय पेडो को बचाया है तथा उन्हें पुनर्जीवित कर इंदौर के बाहरी इलाकों के खाली स्थान पर लगाया है तथा इसके लिए इन्होने शहर में ही कई लोगों को प्रेरित करने का कार्य किया है जो निःस्वार्थ भावः से ये पुनीत कार्य कर रहे हैं , आज जब विकास के नाम पर पेड़ कट रहे हैं तथा उस स्थान पर कोई पेड़ भी नहीं लगता है तथा गर्मी के दिनों में छाया के लिए लोगों को अपने तथा अपनी मंहगी गाड़ियों को किसी ठूंठ से झाडी नुमा कथित पेड़ की आड़ में खड़ा करता देखता हूँ तो मुझे प्रेम जोशी के जज्बे को दाद देने का मन करता है
सड़को को ४ लेन व ६ लेन बनने के नाम पर छायादार वृक्षों को काट दिया गया तथा सडको के बीच में कनेर तथा मदार के जंगली झाडों को देख कर सरकारी सोच पर शर्म आती है आज जी टी रोड पर यही नजारा है तथा NHAI हर १०० किमी पर विकास के नाम पर पैसे वसूल कर रही है क्या इन्हे पेडो के महत्व समझाने के लिए कोई दूसरा रास्ता अख्तियार करना होगा गर्मी के दिनों में जी टी रोड पर यात्रा करते हुए लोगों की आँखे कब खुलेंगी
गुरुवार, 30 अप्रैल 2009
चिरकुट घोषणाओ की लस्सी मत पिलाईये
एक और बयान आया की आतंकवाद से सामना करने के लिए हम सेना को पकिस्तान की छाती में खंजर भोंकने के लिए भेज देंगे
अरे प्यारे लाल आर पार की लड़ाई में सेना को सीमा पर तैनात करके किस पंडित के शकुन का इन्तेजार कर रहे थे क्या सीमा वर्ती खेतों में लीद करने व कम्पोस्ट खाद बनने के लिए आपने सेना तैनात की थी कोई भी सैनिक कारवाही ऐसे होती है क्या आप इस बार जरदारी से तारीख पूछ कर जाना पब्लिक को जोनसन बेबी पावडर वाला बच्चा समझ रखा है क्या जो उसके मुंह में प्लास्टिक की चूसनी थमा रहे हो
माचिस की तीली पर नेता इन दिनों शेर को खड़ा करने का ख्वाब व तिलिस्म दिखा रहे है आई पी एल में सिक्सार भी इतना नहीं जाता जितनी ये फेंक रहे हैं अपने वादों की काली चादर लपेटो और दफा हो जावो पब्लिक को आलपिन से आमलेट खाने की बात न बतावो आलपिन मुंह में ही चुभेगी ये पिन आपके प्रवक्तावों को ही मुबारक हो दांत निपोरना बंद करो, ये मत भूलो की जनता असिक्षित भले ही हो लेकिन बेवकूफ नहीं इन्ही असिक्षितों ने ही कई बार चुनावों में इन पार्टयों के हसीं सपनों की हवा निकाल दी है जिस दिन शिक्षित लोगों का प्रतिशत वोट में तब्दील होगा उस दिन का नजारा क्या होगा पार्टी वालों तुम्हारे ये सारे गुब्बारे बिना हवा फूंके ही फूस हो जायेंगे
नजर लगी राजा ७ रेस कोर्स बंगले पर
प्रधान मंत्री के बंगले पर अनेक जीवो परजीवोपरभक्षियों जन व धन भक्षियों की नजर लग गई है कि ए दिन कोई न कोई बयां आते रहते हैं इसी बंगले के आस पास मलाई कि आस में एक बिल्ली भी घूम रही है यह बिल्ली मानती है कि दूध की हांडी में मुंह डालने के लिए यह कोई जरूरी नहीं कि आप गाय भैंस पालो ही , मलाई पर हक चतुर बिल्ली का ही होता है
उत्तर प्रदेश में ऎसी मलाई कई बार बी जे पी और समाजवादी पार्टी के गाय भेड़ों के दूध से चख चुकी इस बिल्ली को छीका टूटने व मलाई की सुगंध आ रही है लेकिन पार्टियाँ सतर्क हैं क्योंकि वह सत्ता की हांडी चौराहे पर फुड्वाना नहीं चाहती हैं जैसा कि बी जे पी व स पा ने देखी है वैसे इन दिनों खिसियानी बिल्ली ने चुनाव आयोग का ही खम्बा नोचना शुरू कर दिया है भइया नवीन चावला को २४ घंटे भी नहीं हुए थे आफिस में बैठे कि बिल्ली ने गुर्राना शुरू कर दिया कि चावला नहीं चाहते कि उनके हाथ में सत्ता आए
और दो साल पहले चुनाव आयोग निस्पक्ष होता तो उसे १०० सीटें और मिलती
आज फतह बहादुर और डी जी पी के हटाये जाने पर इतनी नाराजगी कि बिना कारण इन आदरणीय बहादुर अफसरों को क्यों हटा दिया गया किंतु वह शायद भूल रहीं है कि २००४ के चुनावों में जब मुख्या सचिव वाजपेयी व
डी जी पी को हटाया गया तो सबसे पहले बधाई इन्होने ही चुनाव आयोग को दिया था जहाँ तक कारणों का प्रश्न है मंच से अधिकारीयों के निलंबन कि सीधे घोषणा कसे होती है तथा कैसे तालियों के बीच ही ये घोषणा हो जाती है ये तो नियुक्ति सचिव श्री ..... बाज बहादुर अवश्य जानते होंगे , आज अपने पर आई तो संविधान व विधान कि याद आने लगी
जीभ लपलपाना छोड़ दो छीका अभी दूर है बिल्लो रानी
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
क्या हम नाकाम राष्ट्र नहीं है किन्ही अर्थो में ?????
अर्थात लोकतंत्र के तंत्र में इन जवानों और मासूमो की बलि देना सामान्य घटना है
देश के सारे जिलों में से १३% जिले नक्सल प्रभावित हैं जहाँ कुछ दृष्टि से सामानांतर सस्र्कार ही चल रही है सामान्य प्रशासन लुंज पुंज है तभी तो लातेहार में रेल गाड़ी बंधक हो जाती है और अपनी मर्जी से छोड़ दी जाती है
क्या लोकतंत्र से नाराज देश के सीधे सादे लोग जिनकी कोई बड़ी राज नीतिक आकंक्षाये भी नहीं है इस कदर हमने अपनी नालायाकियों और शोषण से उन्हें हथियार उठाने को क्यों मजबूर कर दिया है ??
इस पर केन्द्र और राज्य सरकारों का नजरिया भिन्न भिन्न है लेकिन एक बात तय है और मैं १०० % दावे के साथ कह सकता हूँ कि प्रशाशनिक पुलिस और वन बिभाग कि ज्यादतियों तथा शोषण के शिकार ये जन जातियां यदि हथियार उठा रहीं है तो कोई ग़लत नहीं कर रहीं है
मेरे जनपद के आस पास का इलाका भी नक्सल प्रभावित है सरकारी योजनायें खास तौर से केन्द्रीय योजनायें चल रहीं है लेकिन इसे लागु करने वाले अधिकारी आकंठ भ्रष्टाचार में दुबे हुए हैं नक्सल हिंसा के नाम पर कोई अधिकारी जमीनी हकीकत को जानने के लिए इन क्षेत्रो में जाना नहीं चाहता कागज पर कुएं हैण्ड पम्प गड़ रहे हैं लोगो का जीवन स्तर सुधारा जा रहा है अधिकारी इन कामगारों के श्रम मूल्य को भी हड़प जा रहे हैं अंग्रेजों ने भी इतनी लूट खसोट इन आदिवासियों का नही किया जितने इन देशी पिल्लों ने कर डाला है
विदेशों में जमा काला धन कि चर्चा बहुत हो रही है लेकिन इन क्षेत्रो में काम कर रहे पाखण्ड विकास अधिकारीयों तथा अन्यान्य जन कल्याण कारी गतिविधियों में तल्लीन अधिकारीयों के बीबी बच्चों के नाम से अकूत संपत्ति कहाँ से जमा हो रही है इसकी सुधि कौन लेगा पोश इलाकों में जब इन पाखंडी अधिकारीयों विधायकों के घर साईं बाबा कि मूर्ति और बुद्ध और अम्बेदकर कि मूर्तिया देखता हूँ तो इच्छा यही होती है कि इन कमला विमला सदन कि कमला व विमला को इन नक्सलियों के अड्डे पर भेज दिया जाए तो पता चले कि जिंदगी क्या होती है
हम पाकिस्तान को नाकाम राष्ट्र घोषित करने पर खुश हो रहे है जब कि हमारे घर में लोकतंत्र कि हत्या दिन प्रति दिन हो रही है और आबादी कि इतनी बड़ी संख्या इस कदर नाराज है कि जवानों कि देश में इतनी निर्मम हत्या चुनाव के दिन हो रही है और हम खुश है कि इस बार हिंसा कम हुई है
इस कदर सम्वेन्हीनाता और संवादहीनता से कहीं इस देश की हालत नेपाल जैसी न हो जाए मुझे ये डर सताता है इस विषय पर तमाम राजनितिक दलों की कोई सकारात्मक पहल इसे और चिंता जनक बना रही है
शनिवार, 7 मार्च 2009
महिला दिवस के नाम पर चिंतन
स्त्री, जो सदा से जीवन का मूल आधार रही है, उसे पुरुष ने कभी भी यथोचित स्थान नहीं प्राप्त करने दिया। यदि पुरुष ने स्त्री को कभी आदर भी दिया है या पूजा भी की है तो वह है उसका मां का रूप। पर सच तो यह है कि स्त्री मां होने से पहले भी कुछ है और वह है उसका स्त्री होना।
बीते युग से आज की तुलना करें तो स्त्री के दायरे फैले जरूर हैं, सीमाएं टूटी जरूर हैं, लेकिन सीमाएं मिटी नहीं हैं। कुछ हद तक सीमाओं का व सीमाओं में स्त्री का रहना उचित है, परंतु दुख की बात यह है कि यह सीमाएं पुरुष तय करता है।
जहां एक ओर स्त्री विमर्श पर ढेरों किताबें लिखी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर महिला दिवस का विज्ञापन अखबारों में अपनी जगह ढूंढने का वर्ष भर इंतजार करता रहता है। भारत भूमि को हम भले ही मां का दर्जा दे दें परंतु इस पर रहने वाला समाज सदा पुरुष प्रधान ही रहेगा, यह सोच केवल सदियों नहीं बल्कि युगों पुरानी है। युगों पुरानी होने के कारण ही शायद ये इतनी गहराई से समाज की नस-नस में समाई है।
देवताओं के इस देश में श्रीराम जी ने अपने नाम से पूर्व सीता का नाम लेने अर्थात् सियाराम बोलने को कहा। वहीं श्री कृष्ण ने अपने नाम से पहले राधारानी का नाम लेने को कहा, अर्थात् राधेश्याम के रूप में खुद को याद करने को कहा। लेकिन स्त्री के प्रति सम्मान की यह भावना आज आम जनजीवन में देखने को नहीं मिलती। लगता है जैसे स्त्री केवल नाम के लिए ही नाम से पहले जोड़ी गई है। हालात तो यह है कि बिना पुरुष के उपनाम के स्त्री का कोई अपना अस्तित्व ही नहीं माना जाता।
स्त्री पहचानी ही अपने उपनाम से जाती है कि वह किसकी पत्नी है, उसका सरनेम क्या है। और स्त्री यदि केवल अपना नाम ही बताए कोई उपनाम नहीं लगाए तो कई सवालों के घेरे में आ जाती है। उसका चरित्र संदेह के कटघरे में आ जाता है। यही नहीं किसी बच्चे के स्कूल-कालेज आदि के दाखिले के मामले में पिता यानी पुरुष के नाम को न केवल प्राथमिकता दी जाती है बल्कि उसका विवरण ही महत्व रखता है। रामायण एवं गीता जैसे महान ग्रंथ जिनकी हम पूजा करते व मिसाल देते हैं, उसकी बुनियाद में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीता एवं द्रौपदी नामक स्त्रियों का ही स्थान है। स्त्री, जो सदा से सदियों एवं युगों से जीवन का मूल आधार रही है, उसे पुरुष ने कभी भी यथोचित स्थान नहीं प्राप्त करने दिया। यदि पुरुष ने स्त्री को कभी आदर भी दिया है या पूजा भी की है तो वह है उसका मां का रूप। पर सच तो यह है कि स्त्री मां होने से पहले भी कुछ है और वह है उसका स्त्री होना। अब तक स्त्री को मां, बेटी, बहन एवं पत्नी आदि रूपों में तोड़कर ही देखा गया है। स्त्री विमर्श नारी
स्त्री को स्त्री के रूप में देखना व स्वीकारना आज तक नहीं हो पाया है। जब भी कभी पुरुष की काम वासना पर उंगली उठती है तो वह घिसा-पिटा उत्तर देकर अलग हो जाता है कि ‘जब मेनका के आगे विश्वामित्र की तपस्या नहीं टिक सकी तो हम तो साधारण इंसान है।’ लेकिन जब उसे किसी स्त्री के चरित्र पर उंगली उठानी होती है तो वह छूटते ही कहता है, ‘परीक्षा तो सीता जैसी देवी को भी देनी पड़ी थी, तुम क्या चीज हो’ आदि। दोनों ही सूरत में पुरुष स्वयं को बचाता फिरता है, जबकि स्त्री, पुरुष समाज के बेबुनियाद आरोपों की सफाई देने में जुटी रहती है। वह कभी गुमसुम तो कभी बातूनी हो जाती है और किसी पुरानी कहानी का नया किरदार बन कर रह जाती है।
मूल लेखक शशि कान्त
मंगलवार, 3 मार्च 2009
ये ससुरे कौन सी क्लास के आतंकवादी थे ??
आज के लाहौर में हुए श्रीलंका के खिलाड़ियों पर हुए आतंकवादी हमलों की घटना पर विचार करनेपर ऐसा लगता है की terrorist कैम्प के नर्सरी क्लास के आतंकवादी ने इस तरह की आतंकवादी घटना की है शर्म से सर झुका जाता है गिलानी साहेब और जरदारी का कि ऐसा नाकाम हमला जिसमे केवल अपने सिपाही और दो नागरिक मारे गए और मिशन फेल कर दिए .... आ थू सालो
क्या सोच कर आए थे कि जरदारी खुश होगा शाबाशी देगा सुवर के बच्चो वो ११ थे तुम १२ थे फ़िर भी खाली हाथ आ गए आ थू .............
हम क्या मुंह दिखायेंगे ओबामा और मोहतरमा क्लिंटन को कि हम भी आतंकवाद के शिकार हैं और उनसे अन्तिम लड़ाई लड़ रहे हैं अरे सालो एक भी खिलाड़ी नहीं मार पाए
ख़बर है कि उन डाक्टरों पर भी कार्यवाही हो सकती है या तालिबानियों का कहर उन पर हो सकता है जिन्होनो ने खिलाड़ियों का इलाज करते समय उन्हें जहर की सुई लगा कर नहीं मारा वरना कहने के लिए कुछ तो होता कि डाक्टरों कि तमाम कोशिशों के बावजूद हम फलां को बचा न सके ये पाकिस्तानी डाक्टर क्या हिन्दी फ़िल्म नहीं देखते है ? ये सब क्या डांस ही देखते हैं इन फिल्मों से इन्हे क्या विलेन कि हरामीपन व कमीनापन नहीं सीखना चाहिए था जो आज इनके देश के काम आता
इन आतंकवादियों की विफलता ने मुम्बई की सफलता को धो कर रख दिया
गिलानी व जरदारी दोनों के द्वारा इमोशनल अत्याचार करने व सियापा करने का एक अच्छा मौका इन नौ सीखिए आतंकी के कारण हाथ से जाता रहा आ ---- थू
पाकिस्तानी कप्तान ने कहा की श्रीलंका के खिलाड़ियों ने हंस कर बात की और वे इनसे माफ़ी माँगते है
हमारे यहाँ भी जब कोई गिरता है चोट भी लगती है तो वो हंस कर ही कहता है कि कोई खास चोट नहीं आई है अपने
आतंकी चचाजान से माफ़ी मांगो कि ये क्या कर दिया सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया सारी मुक्कमल तैयारी को नाकाम कर दिया इस नामुराद ड्राइवर ने और तुम्हारे बुझे हुए बमों ने ....
अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को चाहिए कि वो अपना मैच अफगानिस्तानी क्रिकेट टीम से स्वात घाटी में खिलवाये या अफगानिस्तान जा कर तालिबान क्रिकेट क्लब टी सी सी से खेले मनचाहा रिजल्ट मिलेगा
वैसे भी श्रीलंका क्रिकेट टीम लालच में क्रिकेट खेलने आई थी क्यों कि जब कोई टीम नहीं जारही थी तब ये मुंह फैला कर गए और रनों का पहाड़ भी खड़ा कर दिए तो इनका तो या हस्र होना ही था
मैं तो गिलानी साहब और जरदारी साहेब आई एस आई के इस शोगवार नाकामी पर उनके साथ हूँ अल्लाह ताला उन्हें इस शोग को सहन करने कि ताकत अता फरमाए
लेकिन मुझे डर इस बात का भी है कि कहीं जरदारी साहेब ये न कह बैठे कि ऐसे थर्ड क्लास के आतंकवादी उनके देश के हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसे नाकाम आतंकवादी भारत ही भेज सकता है तब क्या होगा यदि उसने किसी तिवारी, चौबे, मौर्या, सिंह का नकली पासपोर्ट बना कर ये सिद्ध कर दिया कि ये गोंडा या या छपरा के रहने वाले थे तब क्या होगा ................... खुदा खैर करे
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
वेलेंटाइन या विलेन टाइट चड्ढी मत भेजो कुडियों
जहाँ तक संस्कृति के ठीकेदारों का प्रश्न है ये तो प्रेम के पीछे ऐसे पड़े हैं मानो भारत वर्ष में चमत्कारों के द्वारा ही बच्चे पैदा होते रहे हैं जैसे कान से कर्ण , घडे से अगस्त्य , खंभे से नृसिंह , मैल से गणेश आदि सांस्कृत अवतार पैदा हुए संभवतः इसी कारण से जनसँख्या वृद्धि होती रही है क्यों कि यहाँ और विकल्प भी खुले हुए हैं
वेलेंटाइन डे के पक्षधर व विरोधी दोनों की मानसिकता पर हँसी आती है जिस समाज में पूरा एक माह फागुन मदनोत्सव के लिए जाना जाता हो वहां एक दिन के लिए इतना बवाल , ...........
फागुन में बुढ़वा देवर लगे कि परम्परा के सामने यह एक दिन, घोषित प्रेमियों की लुकाछिपी और गिफ्ट और फूल देने के नाम पर इतना मारा, मारी | क्यां कहूँ इन मूर्खों को जो इसे अपनी अस्मिता और गौरव या स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति से इसे जोड़ कर देखते हैं
सही पूछे तो अब प्यार करना जितना आसान हो गया है उतना पहले कभी नहीं था अब ख़त लिखने भेजने उसका उत्तर पाने का इन्तेजार की जहमत नहीं है फ़ोन से s.m.s भेजो पढो डिलीट करो m.m.s भेजो चैट करो
बस जरूरत है एक अदद मोबाइल या कंप्युटर की काम इतना आसान है फ़िर लव का इजहार करने देने और लात खाने की क्या जरूरत है
अतः सभी प्रेमी जनों को सलाह है कि सारा वर्ष ही वेलेंटाइन डे के रूप में मनाया करें एक दिन के लिए हल्ला गुल्ला करने कि जरूरत नहीं है कुछ दिनों के बाद ही होली आ रही है सारी दमित व कुत्सित वासना को शांत करने का एक सांस्कृतिक उपाय उस दिन इन राम सेना और बजरंग दल के घरों पर धावा बोल कर भाभियों से रंग खेले और मिठाई खाएं
ये चड्ढी भेजना तो इन बेहूदा बैलों को लाल कपड़े दिखने के बराबर है
रविवार, 25 जनवरी 2009
मजबूत दिल के साथ आओ प्रधान मंत्री जी

जल्दी स्वस्थ होने की कामना है आप मजबूत दिल से राज करें
और मजबूत इरादों से देशवासियों की तमन्नाओं को पूरा करें
हमें मालूम नहीं था कि रोग गंभीर था स्वस्थ हो करआप देश के अमन व चैन के दुश्मनों पर
टूट पड़े , और एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाले कर्मठ प्रधान मंत्री के रूप में जाने जायें , यही कामना है
बड़बोले प्रधानमंत्री कई देखे हैं आप से उम्मीद है कि पंजाब के वीरों की तरह आप शत्रुओं टूट पड़े
get well soon
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
ओबामा व भारत एक अबूझ पहेली
यह एक खतरनाक प्रस्थापना है और इसमें पाकिस्तान सरकार का प्रॉपेगैंडा ध्वनित होता है। दरअसल, कश्मीर समस्या की आड़ लेकर पाकिस्तान सरकार अभी तक आतंकवाद को दिए जाने वाले अपने खुले संरक्षण को जायज ठहराती आई है। 26 नवंबर को मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला यह साबित करने के लिए काफी है कि अमेरिका के डेमैक्रैटिक एस्टैब्लिशमंट को अब भारत-पाकिस्तान संबंधों को कश्मीर के लेंस से देखने की परंपरा छोड़नी होगी।
ओबामा को अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा ग्लोबलाइजेशन विरोधी राष्ट्रपति के रूप में देखा जा रहा है। बेरोजगारी की जैसी आंधी अमेरिका में चल रही है, उसमें नौकरियां बाहर न जाने देने की मजबूरी भी उनके सामने रहेगी। लेकिन अमेरिकी कंपनियों को अपनी चीजें और सेवाएं अगर ग्लोबल होड़ में टिकानी हैं, तो महंगे अमेरिकी श्रम का विकल्प उन्हें खोजना ही पड़ेगा।
ओबामा प्रशासन का रवैया आउटसोर्सिन्ग के बारे में चाहे जो भी हो, लेकिन तय है कि अगर अमेरिका ने बंद दरवाजे की नीति अपनानी शुरू की, तो यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में चल पड़ेगी। विदेशी बाजारों पर निर्भरता दुनिया के और किसी भी देश से ज्यादा अमेरिका की समस्या है, लिहाजा रोजगार बचाने की उनकी मुहिम वहां बेरोजगारी के और भी बड़े खतरे का सबब बन सकती है।
संक्षेप में कहें तो अमेरिका का अगला प्रशासन भारत के लिए अभी एक बंद किताब की तरह है। किसी अच्छी या बुरी धारणा से शुरू करने की बजाय इसके पन्ने पलटकर ही इसके बारे में कोई राय बनाना ठीक रहेगा।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर पर आधारित इस लेख से तो लगता है कि प्रणव बाबु को विक्स कि गोली खा खा कर अभी बोलना जारी रखना होगा
ओबामा केवल रंग बदला है दिल थोड़े !!!

ओबामा ओबामा का शोर सुनकर व कुछ पाश्चात्य मुखी भद्रजन ऐसे प्रसन्न हो रहे हैं जैसे कोई नए इसा मसीह का उदय हो गया है इसके पूर्व भी कई राष्ट्रपतियों की ताजपोशी के बारे में पढ़ा गया है लेकिन जैसा शोर शराबा इन दिनों दुनिया में व भारत में हो रहा है उसका कारण सिवाय राष्ट्रपति के काले रंग के और नजर नहीं आता
वैश्विक मंदी व अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त होने पर न तो ओबामा के पास कोई अलादीन का चिराग है न ही रूजवेल्ट जैसी कोई न्यू डील की पॉलिसी ही तो इतना इतराने की क्या जरूरत है
जिनके भाषण प्रभावशाली हो उनकी नीतियाँ भी उसी प्रकार की लोकप्रिय हों यह तो भारतीय नेतृत्व के शिखर पुरुषों के उदाहरणों से सिखा जा सकता है हमने ऐसे मृदुभाषी व जोशीले भाषणों का बाद में उल्टा असर यही देखा है की हम जब उनको याद करते हैं तो कहते है की फलां नेता जी का भाषण सुनने इतने लोग इकठे हुए बाद में उन्होंने क्या किया यह किसी को याद नही चाहे वो सत्ता पक्ष में रहे हों चाहे विपक्ष में
माना कि ओबामा बिना जातीय समीकरण के बिना आरक्षण के लाभ के, बिना यह घोषणा किए कि व दलित व शोषित समाज के हैं , सहानुभूति बटोरे बगैर सर्वोच्च पद पर पहुँच गए हैं
लेकिन भारत व एशिया के मामलों में ओबामा कि कोई चेंज कि पालिसी होगी ऐसा मुझे नहीं लगता
विश्वास न हो तो कुछ दिनों के बाद वो इराक का दौरा कर ले वहां फूलो कि वर्षा नहीं होने वाली
पाकिस्तान के प्रति नीतियों में कोई बदलाव के आसार नजर नहीं आते
काले रंग कि कोंडालीजा राईस हो चाहे गोरी सुघड़ देहयष्टि की धनी हिलेरी क्लिंटन मुझे तो दोनों के बयानों में कोई चेंज (परिवर्तन ) नहीं दिख रहा तो किस बात का चेंज
अमेरिकी बन्दर चाहे काला हो या लाल (सफ़ेद) घुड़की दोनों देते है व भारतीय हितों का नुकसान दोनों करते हैं अतः ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं
हमारे प्रणव बाबू को ऐसे ही चिल्ला चिल्ला कर पकिस्तान को कोसना पड़ेगा फ़िर क्लिंटन से बात कर चुप होना पड़ेगा
ओबामा हो या ओसामा किसी की प्रशस्ति गान से बात नही बनने वाली अतः हे संकर प्रजाति के नेता उठो व कुछ करो देश के लोग तुम्हे देख रहे हैं ओबामा व मिशेल को नहीं
शुक्रवार, 16 जनवरी 2009
शिक्षा के लिए कुंवारेपन की बोली सिर्फ़ १८ करोड़

मेरी नजर में अब तक अमेरिका की तस्वीर एक सुशिक्षित व सभ्य समाज की थी जहाँ उच्च शिक्षा के लिए दुनिया भर से लोग जाते हैं लेकिन उच्च शिक्षा के लिए किसी छात्रा को अपनी virginity कौमार्यता बोली लगनी पड़े व अमेरिका जैसे देश में रेडियो पर प्रसारित ख़बर सुन कर १०००० लोग बोली लगाये तथा यह बोली १८ करोड़ तक पहुँच जाए एक आश्चर्य ही है
कैलिफोर्निया के सैन डियागो की नताली देलन ने पहली बार जब सितम्बर २००८ में अपने कुवारेपन की बोली लगे तो सबसे पहली बार एक करोड़ सत्रह लाख रुपये की बोली लगी जो बढ़ते बढ़ते १८ करोड़ तक पहुँच गई अभी उसे और बड़ी बोली का इन्तेजार है
नताली बोली से प्राप्त धन का उपयोग फॅमिली एंड मेरिज थेरेपी की उच्च शिक्षा में लगना चाहती है
अब वह इस शिक्षा से क्या ज्ञान हासिल कर समाज को देगी यह तो समय ही बताएगा लेकिन ये बात तो तय हो गई की कुंवारेपन को लेकर अमेरिका में उसी प्रकार की जिज्ञासा है जैसी आदम व एव को थी |
लेकिन यह तो जरूर है कि नताली टाप करेगी क्योंकि अध्यापक तो ऐसे ही नंबर थोक में दे देंगे इस होनहार क्षात्रा को जो अपने कुनारेपन को सिद्ध करने के लिए कोई भी टेस्ट कराने के लिए तैयार भी है
क्या अमेरिका में शिक्षा के लिए ये भी करना पड़ता है मुझे तो अब कोई अमेरिकी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के चरित्र पर शंका होने लगी है क्या इतनी मंहगी शिक्षा है लानत है ऐसे देश पर जो कंपनियों के लिए बेल आउट पॅकेज दे सकता है मुशर्रफ़ को मदद कर सकता है वहां एक अबला को अपनी उच्च शिक्षा के लिए पहले तो इतना त्याग कर
गुह्यतिगुह्य कीमती वस्तु की रक्षा की फ़िर समय आने पर उसे नीलामी के लिए बाजार में बिड की उसे कन्या विद्या धन जैसी स्कीम से लाभ नहीं दे सकती अमर सिंह को वहां जा कर ओबामा को यह बात बतानी चाहिए और उस कन्या के साथ फोटो भी खिंचा लेनी चाहिए
रविवार, 11 जनवरी 2009
क्या टाप क्लास के नेता ख़त्म हो चुके हैं ?

जब मैं अपने देश के बारे में यह पड़ता हूँ कि वैज्ञानिक
टाप क्लास के हैं सुपर कंप्युटर टाप है फलां व्यक्ति टाप क्लास का है तो मेरे मन में ख्याल आता है कि क्या हमारे वैज्ञानिक आज के नेताओं के दिमाग में कोई ऐसा रसायन दाल देते जिससे इनकी सोचने समझाने कि शक्ति देश के प्रत्ति हो जाती| समाजवादी पार्टी कि लिस्ट में एक से एक रत्न आगामी चुनाव में जन प्रतिनिधि कि आस लगाये बैठे हैं ददुआ के भाई बाल कुमार , आर के पटेल , अशोक चंदेल , संजय दत्त या मान्यता दत्त यही हाल आपनी ब स पा का है खैर ये पार्टियां अपने को ऐसी वैतरणी पार कराने वाली परम पावन सत्ता मानती हैं कि हर डाकू चोर खुनी दागी अभागी
सब पार्टी ज्वाइन करते ही वाल्मीकि व अजामिल कि श्रेणी में आ जाते हैं | अभी यू पी के मंत्री ने फ़रमाया कि गांधी व तिलक भी अपराधी थे तो आज के राजनितिक आपराधियों को टिकट देना कोई ग़लत नहीं है
आख़िर जनता के पास विकल्प क्या है लेकिन क्या यह सच नहीं है कि जनता भी ऐसे नेताओं को पसंद करती है जो इनके ग़लत कामो को दबंगई व गुंडई से करा दे , जिससे मिलने के पहले बन्दूक धारियों से व गुंडा तत्वों को अपना परिचय देना पड़े , आज कल ऐसे ही विधायक व एम् पी चुनना हम पसंद करतें है ताकि हमारी शान बनी रहे
क्या यह सही नहीं है कि जिन लोगो के भरोसे हम अपने मासूम बच्चो व बच्चियों को एक दिन के लिए नहीं छोड़ सकते ऐसे ही थर्ड क्लास के लोगों को चुन कर हम पुरा देश व प्रदेश ५ वर्षो के लिए सौंप देते हैं
टाप क्लास के नेता व प्रतिनिधि के मामले में हम कब वर्ड फेम हासिल करेंगे ?????
बुधवार, 31 दिसंबर 2008
महिला ने किया महिला से रेप ????
पहली बार बानो व उसके भाई पर लड़की भगाने के आरोप में धारा ३६३ व ३६६ के तहत पहले जेल भेजा फ़िर जमानत पर छूटने के बाद दरोगा ने 363 के तहत बानो नामक महिला पर ममता को अवैध ढंग से कब्जा कर रखने का आरोप लगा दिया इस पर जमानत पर रिहा होने के बाद उसी थाना प्रभारी ने तीसरी बार ममता के साथ बलात्कार करने के आरोप में उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया | तीनो बार जज एक ही थेश्री बाल मुकुंद |
मजिस्ट्रेट साहिब ने तीसरी बार उसी महिला को रिमांड पर छोड़ने का आदेश देते हुए यह देखने का कष्ट नहीं किया की रिमांड होना चाहिए था कि नहीं जब कि मजिस्ट्रेट को सी आर पी सी कि धारा १६७ में यह अधिकार था कि वह महिला को जेल भेजने से मन कर दे
महिला अभी जेल से छुटी है आरोप से मुक्त नहीं हुई |उस पर बलात्कार का मुक़दमा चल रहा है
अब एक दूसरा पहलू देखे जिस राज्य कि मुख्य मंत्री ख़ुद कुंवारी स्त्री हो उसी राज्य के पुलिस के आला अधिकारी उस पुलिस थाना कोतवाली के शहर कोतवाल चंद्र शेखर सिंह के विरूद्ध कोई शिकायत नहीं होने की बात कह कर उसके विरुद्ध कोई कारवाई नहीं करने कि बात कह रहे हैं
आई पी सी के कुल 511 दफाओं में केवल यही एक धारा ऐसी है जो महिला के लिए शायद सम्भव नहीं है क्यों कि प्रकृति ने महिला का जैव शास्त्रीय ढांचा ही ऐसा बनाया है कि वह इस प्रकार का अपराध चाह कर भी नहीं कर सकती है
मगर वाह रे यू पी पुलिस तुमने तो हद ही कर दी ऐसा नही कि राज्य कि ये पहली घटना हो पहले भी 1995 गाजियाबाद में एक नाबालिग लड़की के सामूहिक बलात्कार के मामले में एक पति - पत्नी और उसके दो नाबालिग बच्चो को पुलिस जेल भेज चुकी है
पुलिस के डर से यह महिला लिखित में शहर कोतवाल कि शिकायत नहीं कर रही है वैसे जज साहिब ने पुलिस से यह सिध्ध करने को कहा है कि वह बताये कि एक महिला द्वारा दूसरे महिला के साथ ऐसा अपराध कैसे किया गया होगा
गुरुवार, 25 दिसंबर 2008
जूता का महिमा मंडन बंद करें
भारत में भी कुछ मुसलमान संगठनो ने खुशिया मनानी शुरू कर दिया | इस पूरे प्रसंग पर मुझे सलमान रशदी व डेनिश पत्रकार के प्रति जारी फतवे तथा उस पर बढ़ चढ़ कर बयां बाजियां याद आ रही हैं जिसमे उत्तर प्रदेश के मंत्री जी ने पत्रकार के सर काट कर लाने वाले को ५१ लाख रुपये इनाम की घोषणा की थी
इन घटनाओं पर टीका टिपण्णी के बाद कुछ सवाल के जबाब नहीं मिल रहे हैं
क्या विरोध का लोकतान्त्रिक तरीका यही है | क्या सभ्य कहे जाने वाले किसी समाज को इस प्रकार की हरकत का महिमा मंडन इसी प्रकार करना चाहिए ?
यदि उस पत्रकार ने जूते की जगह चाकू या बम फेंका गया होता तो भी दुनिया व भारत के मुसलमान और इस प्रकार के विरोध के तरीके को पसंद करने वाले हिंदू क्या इसी तरीके से खुशी का इजहार करते | क्या यह सभ्यता का तकाजा है की मेहमान बन कर आए व्यक्ति वो चाहे शत्रु ही क्यों न हो उसका विरोध जूता फेंक कर या बम फेंक कर किया जाए
यदि इसी प्रकार की घटना पाकिस्तानी प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति के किसी भारत दौरे पर हो जाए तो कितनेमुसलमान उस जूते को जो पाक प्रधान मंत्री / राष्ट्रपति पर फेंका गया हो उसकी नीलामी या बोसा ( चुम्बन ) करनेको तैयार होंगे तथा उससे शादी का आफर देने को कितने हिंदू या मुसलमान तैयार होंगे | प्रश्न अवश्य काल्पनिकहै किंतु इसका उत्तर आसान नहीं है
मकबूल फ़िदा हुसैन की नंगी पेंटिंगों पर शिव सेना के विरोध को या किसी अन्य घटना के हिंसात्मक विरोध की हम आलोचना करते हैं तथा बुश पर फेंके गए जूते को महिमा मंडित कर विरोध के इस तरीके को जायज करार कर रहे हैं
बुश की इराक़ नीति चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो सद्दाम भी कोई फ़रिश्ते नहीं थे कुवैत पर आक्रमण हो चाहे कुर्द विद्रोहियों का दमन सभी पापो का अंत होना ही था चाहे उसका कोई निमित्त बने |
लेकिन इराक में घटना का भारत के लोगों के द्वारा इस प्रकार समर्थन देना और खुशी प्रकट करना शायद यह प्रकट कर रहा है की अभी हम लोगों ने लोकतान्त्रिक विरोध का तरीका सिखा नहीं है चाहे कितना ही पुराना लोकतंत्र क्यों न हो जाए | अभी सहिष्णु बन कर विरोध की ताकत का अंदाजा हमें नहीं है
यही विरोध हमें आए दिन झेलना पड़ता है क्या किसी नीति विशेष का हिंसात्मक विरोध जायज है क्या स्वन्त्रतता के संगर्ष से हमने यही सबक सीखा है


