रविवार, 25 जनवरी 2009

मजबूत दिल के साथ आओ प्रधान मंत्री जी


जल्दी स्वस्थ होने की कामना है आप मजबूत दिल से राज करें
और मजबूत इरादों से देशवासियों की तमन्नाओं को पूरा करें
हमें मालूम नहीं था कि रोग गंभीर था स्वस्थ हो करआप देश के अमन व चैन के दुश्मनों पर
टूट पड़े , और एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाले कर्मठ प्रधान मंत्री के रूप में जाने जायें , यही कामना है
बड़बोले प्रधानमंत्री कई देखे हैं आप से उम्मीद है कि पंजाब के वीरों की तरह आप शत्रुओं टूट पड़े
get well soon

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

ओबामा व भारत एक अबूझ पहेली

अमेरिकी विदेश नीति पर केंद्रित पत्रिका 'फॉरेन अफेयर्स' को दिए गए इंटरव्यू में बराक ओबामा ने अपनी दक्षिण एशियाई नीति का खुलासा किया है। इसके मुताबिक पाकिस्तान सरकार अफगानिस्तान से सटी अपनी सीमा की निगरानी पर अपना पूरा ध्यान तभी दे पाएगी, जब वह भारत से सटी अपनी पूर्वी सीमा की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो। ओबामा इसके लिए कश्मीर मसले का समाधान जरूरी मानते हैं और इस काम में अपनी तरफ से हर संभव सहायता के लिए तैयार हैं।

यह एक खतरनाक प्रस्थापना है और इसमें पाकिस्तान सरकार का प्रॉपेगैंडा ध्वनित होता है। दरअसल, कश्मीर समस्या की आड़ लेकर पाकिस्तान सरकार अभी तक आतंकवाद को दिए जाने वाले अपने खुले संरक्षण को जायज ठहराती आई है। 26 नवंबर को मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला यह साबित करने के लिए काफी है कि अमेरिका के डेमैक्रैटिक एस्टैब्लिशमंट को अब भारत-पाकिस्तान संबंधों को कश्मीर के लेंस से देखने की परंपरा छोड़नी होगी।

ओबामा को अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा ग्लोबलाइजेशन विरोधी राष्ट्रपति के रूप में देखा जा रहा है। बेरोजगारी की जैसी आंधी अमेरिका में चल रही है, उसमें नौकरियां बाहर न जाने देने की मजबूरी भी उनके सामने रहेगी। लेकिन अमेरिकी कंपनियों को अपनी चीजें और सेवाएं अगर ग्लोबल होड़ में टिकानी हैं, तो महंगे अमेरिकी श्रम का विकल्प उन्हें खोजना ही पड़ेगा।

ओबामा प्रशासन का रवैया आउटसोर्सिन्ग के बारे में चाहे जो भी हो, लेकिन तय है कि अगर अमेरिका ने बंद दरवाजे की नीति अपनानी शुरू की, तो यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में चल पड़ेगी। विदेशी बाजारों पर निर्भरता दुनिया के और किसी भी देश से ज्यादा अमेरिका की समस्या है, लिहाजा रोजगार बचाने की उनकी मुहिम वहां बेरोजगारी के और भी बड़े खतरे का सबब बन सकती है।

संक्षेप में कहें तो अमेरिका का अगला प्रशासन भारत के लिए अभी एक बंद किताब की तरह है। किसी अच्छी या बुरी धारणा से शुरू करने की बजाय इसके पन्ने पलटकर ही इसके बारे में कोई राय बनाना ठीक रहेगा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर पर आधारित इस लेख से तो लगता है कि प्रणव बाबु को विक्स कि गोली खा खा कर अभी बोलना जारी रखना होगा

ओबामा केवल रंग बदला है दिल थोड़े !!!


ओबामा ओबामा का शोर सुनकर व कुछ पाश्चात्य मुखी भद्रजन ऐसे प्रसन्न हो रहे हैं जैसे कोई नए इसा मसीह का उदय हो गया है इसके पूर्व भी कई राष्ट्रपतियों की ताजपोशी के बारे में पढ़ा गया है लेकिन जैसा शोर शराबा इन दिनों दुनिया में व भारत में हो रहा है उसका कारण सिवाय राष्ट्रपति के काले रंग के और नजर नहीं आता
वैश्विक मंदी व अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त होने पर न तो ओबामा के पास कोई अलादीन का चिराग है न ही रूजवेल्ट जैसी कोई न्यू डील की पॉलिसी ही तो इतना इतराने की क्या जरूरत है
जिनके भाषण प्रभावशाली हो उनकी नीतियाँ भी उसी प्रकार की लोकप्रिय हों यह तो भारतीय नेतृत्व के शिखर पुरुषों के उदाहरणों से सिखा जा सकता है हमने ऐसे मृदुभाषी व जोशीले भाषणों का बाद में उल्टा असर यही देखा है की हम जब उनको याद करते हैं तो कहते है की फलां नेता जी का भाषण सुनने इतने लोग इकठे हुए बाद में उन्होंने क्या किया यह किसी को याद नही चाहे वो सत्ता पक्ष में रहे हों चाहे विपक्ष में
माना कि ओबामा बिना जातीय समीकरण के बिना आरक्षण के लाभ के, बिना यह घोषणा किए कि व दलित व शोषित समाज के हैं , सहानुभूति बटोरे बगैर सर्वोच्च पद पर पहुँच गए हैं
लेकिन भारत व एशिया के मामलों में ओबामा कि कोई चेंज कि पालिसी होगी ऐसा मुझे नहीं लगता
विश्वास न हो तो कुछ दिनों के बाद वो इराक का दौरा कर ले वहां फूलो कि वर्षा नहीं होने वाली
पाकिस्तान के प्रति नीतियों में कोई बदलाव के आसार नजर नहीं आते
काले रंग कि कोंडालीजा राईस हो चाहे गोरी सुघड़ देहयष्टि की धनी हिलेरी क्लिंटन मुझे तो दोनों के बयानों में कोई चेंज (परिवर्तन ) नहीं दिख रहा तो किस बात का चेंज
अमेरिकी बन्दर चाहे काला हो या लाल (सफ़ेद) घुड़की दोनों देते है भारतीय हितों का नुकसान दोनों करते हैं अतः ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं
हमारे प्रणव बाबू को ऐसे ही चिल्ला चिल्ला कर पकिस्तान को कोसना पड़ेगा फ़िर क्लिंटन से बात कर चुप होना पड़ेगा
ओबामा हो या ओसामा किसी की प्रशस्ति गान से बात नही बनने वाली अतः हे संकर प्रजाति के नेता उठो व कुछ करो देश के लोग तुम्हे देख रहे हैं ओबामा व मिशेल को नहीं

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

शिक्षा के लिए कुंवारेपन की बोली सिर्फ़ १८ करोड़


मेरी नजर में अब तक अमेरिका की तस्वीर एक सुशिक्षित व सभ्य समाज की थी जहाँ उच्च शिक्षा के लिए दुनिया भर से लोग जाते हैं लेकिन उच्च शिक्षा के लिए किसी छात्रा को अपनी virginity कौमार्यता बोली लगनी पड़े व अमेरिका जैसे देश में रेडियो पर प्रसारित ख़बर सुन कर १०००० लोग बोली लगाये तथा यह बोली १८ करोड़ तक पहुँच जाए एक आश्चर्य ही है
कैलिफोर्निया के सैन डियागो की नताली देलन ने पहली बार जब सितम्बर २००८ में अपने कुवारेपन की बोली लगे तो सबसे पहली बार एक करोड़ सत्रह लाख रुपये की बोली लगी जो बढ़ते बढ़ते १८ करोड़ तक पहुँच गई अभी उसे और बड़ी बोली का इन्तेजार है
नताली बोली से प्राप्त धन का उपयोग फॅमिली एंड मेरिज थेरेपी की उच्च शिक्षा में लगना चाहती है
अब वह इस शिक्षा से क्या ज्ञान हासिल कर समाज को देगी यह तो समय ही बताएगा लेकिन ये बात तो तय हो गई की कुंवारेपन को लेकर अमेरिका में उसी प्रकार की जिज्ञासा है जैसी आदम व एव को थी |
लेकिन यह तो जरूर है कि नताली टाप करेगी क्योंकि अध्यापक तो ऐसे ही नंबर थोक में दे देंगे इस होनहार क्षात्रा को जो अपने कुनारेपन को सिद्ध करने के लिए कोई भी टेस्ट कराने के लिए तैयार भी है

क्या अमेरिका में शिक्षा के लिए ये भी करना पड़ता है मुझे तो अब कोई अमेरिकी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के चरित्र पर शंका होने लगी है क्या इतनी मंहगी शिक्षा है लानत है ऐसे देश पर जो कंपनियों के लिए बेल आउट पॅकेज दे सकता है मुशर्रफ़ को मदद कर सकता है वहां एक अबला को अपनी उच्च शिक्षा के लिए पहले तो इतना त्याग कर
गुह्यतिगुह्य कीमती वस्तु की रक्षा की फ़िर समय आने पर उसे नीलामी के लिए बाजार में बिड की उसे कन्या विद्या धन जैसी स्कीम से लाभ नहीं दे सकती अमर सिंह को वहां जा कर ओबामा को यह बात बतानी चाहिए और उस कन्या के साथ फोटो भी खिंचा लेनी चाहिए










रविवार, 11 जनवरी 2009

क्या टाप क्लास के नेता ख़त्म हो चुके हैं ?


जब मैं अपने देश के बारे में यह पड़ता हूँ कि वैज्ञानिक
टाप क्लास के हैं सुपर कंप्युटर टाप है फलां व्यक्ति टाप क्लास का है तो मेरे मन में ख्याल आता है कि क्या हमारे वैज्ञानिक आज के नेताओं के दिमाग में कोई ऐसा रसायन दाल देते जिससे इनकी सोचने समझाने कि शक्ति देश के प्रत्ति हो जाती| समाजवादी पार्टी कि लिस्ट में एक से एक रत्न आगामी चुनाव में जन प्रतिनिधि कि आस लगाये बैठे हैं ददुआ के भाई बाल कुमार , आर के पटेल , अशोक चंदेल , संजय दत्त या मान्यता दत्त यही हाल आपनी ब स पा का है खैर ये पार्टियां अपने को ऐसी वैतरणी पार कराने वाली परम पावन सत्ता मानती हैं कि हर डाकू चोर खुनी दागी अभागी
सब पार्टी ज्वाइन करते ही वाल्मीकि व अजामिल कि श्रेणी में आ जाते हैं | अभी यू पी के मंत्री ने फ़रमाया कि गांधी व तिलक भी अपराधी थे तो आज के राजनितिक आपराधियों को टिकट देना कोई ग़लत नहीं है

आख़िर जनता के पास विकल्प क्या है लेकिन क्या यह सच नहीं है कि जनता भी ऐसे नेताओं को पसंद करती है जो इनके ग़लत कामो को दबंगई व गुंडई से करा दे , जिससे मिलने के पहले बन्दूक धारियों से व गुंडा तत्वों को अपना परिचय देना पड़े , आज कल ऐसे ही विधायक व एम् पी चुनना हम पसंद करतें है ताकि हमारी शान बनी रहे
क्या यह सही नहीं है कि जिन लोगो के भरोसे हम अपने मासूम बच्चो बच्चियों को एक दिन के लिए नहीं छोड़ सकते ऐसे ही थर्ड क्लास के लोगों को चुन कर हम पुरा देश प्रदेश वर्षो के लिए सौंप देते हैं
टाप क्लास के नेता प्रतिनिधि के मामले में हम कब वर्ड फेम हासिल करेंगे ?????

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

महिला ने किया महिला से रेप ????

शीर्षक पढ़ कर चकित मत होइए उत्तर प्रदेश की पुलिस ने लखनऊ के हजरतगंज थाने में दो बच्चो की माँ २८ वर्ष की बानो नामक महिला पर ममता नामक 18 वर्ष की युवती पर धारा 376 के तहत बलात्कार का आरोप ही लगा डाला
पहली बार बानो व उसके भाई पर लड़की भगाने के आरोप में धारा ३६३ व ३६६ के तहत पहले जेल भेजा फ़िर जमानत पर छूटने के बाद दरोगा ने 363 के तहत बानो नामक महिला पर ममता को अवैध ढंग से कब्जा कर रखने का आरोप लगा दिया इस पर जमानत पर रिहा होने के बाद उसी थाना प्रभारी ने तीसरी बार ममता के साथ बलात्कार करने के आरोप में उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया | तीनो बार जज एक ही थेश्री बाल मुकुंद |
मजिस्ट्रेट साहिब ने तीसरी बार उसी महिला को रिमांड पर छोड़ने का आदेश देते हुए यह देखने का कष्ट नहीं किया की रिमांड होना चाहिए था कि नहीं जब कि मजिस्ट्रेट को सी आर पी सी कि धारा १६७ में यह अधिकार था कि वह महिला को जेल भेजने से मन कर दे
महिला अभी जेल से छुटी है आरोप से मुक्त नहीं हुई |उस पर बलात्कार का मुक़दमा चल रहा है
अब एक दूसरा पहलू देखे जिस राज्य कि मुख्य मंत्री ख़ुद कुंवारी स्त्री हो उसी राज्य के पुलिस के आला अधिकारी उस पुलिस थाना कोतवाली के शहर कोतवाल चंद्र शेखर सिंह के विरूद्ध कोई शिकायत नहीं होने की बात कह कर उसके विरुद्ध कोई कारवाई नहीं करने कि बात कह रहे हैं
आई पी सी के कुल 511 दफाओं में केवल यही एक धारा ऐसी है जो महिला के लिए शायद सम्भव नहीं है क्यों कि प्रकृति ने महिला का जैव शास्त्रीय ढांचा ही ऐसा बनाया है कि वह इस प्रकार का अपराध चाह कर भी नहीं कर सकती है
मगर वाह रे यू पी पुलिस तुमने तो हद ही कर दी ऐसा नही कि राज्य कि ये पहली घटना हो पहले भी 1995 गाजियाबाद में एक नाबालिग लड़की के सामूहिक बलात्कार के मामले में एक पति - पत्नी और उसके दो नाबालिग बच्चो को पुलिस जेल भेज चुकी है
पुलिस के डर से यह महिला लिखित में शहर कोतवाल कि शिकायत नहीं कर रही है वैसे जज साहिब ने पुलिस से यह सिध्ध करने को कहा है कि वह बताये कि एक महिला द्वारा दूसरे महिला के साथ ऐसा अपराध कैसे किया गया होगा

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

जूता का महिमा मंडन बंद करें

आज कल बुश पर फेंके गए जूते की हर जगह चर्चा है हर जगह मुसलमानों ने इसका महिमा मंडन करना शुरू कर दिया है | कोई जूते की नीलामी में लाखो डालर देने को तैयार है तो कोई अपनी लड़की की शादी करने को तैयार है
भारत में भी कुछ मुसलमान संगठनो ने खुशिया मनानी शुरू कर दिया | इस पूरे प्रसंग पर मुझे सलमान रशदी व डेनिश पत्रकार के प्रति जारी फतवे तथा उस पर बढ़ चढ़ कर बयां बाजियां याद आ रही हैं जिसमे उत्तर प्रदेश के मंत्री जी ने पत्रकार के सर काट कर लाने वाले को ५१ लाख रुपये इनाम की घोषणा की थी
इन घटनाओं पर टीका टिपण्णी के बाद कुछ सवाल के जबाब नहीं मिल रहे हैं

क्या विरोध का लोकतान्त्रिक तरीका यही है | क्या सभ्य कहे जाने वाले किसी समाज को इस प्रकार की हरकत का महिमा मंडन इसी प्रकार करना चाहिए ?
यदि उस पत्रकार ने जूते की जगह चाकू या बम फेंका गया होता तो भी दुनिया व भारत के मुसलमान और इस प्रकार के विरोध के तरीके को पसंद करने वाले हिंदू क्या इसी तरीके से खुशी का इजहार करते | क्या यह सभ्यता का तकाजा है की मेहमान बन कर आए व्यक्ति वो चाहे शत्रु ही क्यों न हो उसका विरोध जूता फेंक कर या बम फेंक कर किया जाए
यदि इसी प्रकार की घटना पाकिस्तानी प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति के किसी भारत दौरे पर हो जाए तो कितनेमुसलमान उस जूते को जो पाक प्रधान मंत्री / राष्ट्रपति पर फेंका गया हो उसकी नीलामी या बोसा ( चुम्बन ) करनेको तैयार होंगे तथा उससे शादी का आफर देने को कितने हिंदू या मुसलमान तैयार होंगे | प्रश्न अवश्य काल्पनिकहै किंतु इसका उत्तर आसान नहीं है
मकबूल फ़िदा हुसैन की नंगी पेंटिंगों पर शिव सेना के विरोध को या किसी अन्य घटना के हिंसात्मक विरोध की हम आलोचना करते हैं तथा बुश पर फेंके गए जूते को महिमा मंडित कर विरोध के इस तरीके को जायज करार कर रहे हैं
बुश की इराक़ नीति चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो सद्दाम भी कोई फ़रिश्ते नहीं थे कुवैत पर आक्रमण हो चाहे कुर्द विद्रोहियों का दमन सभी पापो का अंत होना ही था चाहे उसका कोई निमित्त बने |
लेकिन इराक में घटना का भारत के लोगों के द्वारा इस प्रकार समर्थन देना और खुशी प्रकट करना शायद यह प्रकट कर रहा है की अभी हम लोगों ने लोकतान्त्रिक विरोध का तरीका सिखा नहीं है चाहे कितना ही पुराना लोकतंत्र क्यों न हो जाए | अभी सहिष्णु बन कर विरोध की ताकत का अंदाजा हमें नहीं है
यही विरोध हमें आए दिन झेलना पड़ता है क्या किसी नीति विशेष का हिंसात्मक विरोध जायज है क्या स्वन्त्रतता के संगर्ष से हमने यही सबक सीखा है

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

पाक का खटराग हमले भारत सरकार ने कराए थे

पाकिस्तान मीडिया की ख़बर सुन कर ऐसा लगा की काश कोई उधम सिंह जैसा क्रन्तिकारी रहता तो इन फटे मुंह और न जाने क्या क्या फटे अंगो वाले दुर्जनों कि ऐसी तैसी कर देता तो ये शरारत बंद हो जाती वास्तव में हमारे मनीषियों ने ठीक ही कहा है की शठे शाठ्यम समाचरेत | हिम्मत देखें ( खड्ग हस्तेन दुर्जन )पूरे समाचार की विडियो क्लिप hotklix.com पर देखें यहाँ zaid-hamid फरमा रहे है कि भारत ने अमेरिका के तर्ज पर ९/११ करना चाहा तो लेकिन उनका फ्राड बेनकाब हो गया | आतंकवादियों कि सूरत पाकिस्तानियों से नहीं मिलती
सूरत के लिए तो इनकी माँ से ही पूछना पड़ेगा कि इनकी पैदाइश १९७१ कि जंग के दौरान फटे बमों के बीच अप्राकृतिक रूप से तो नहीं हो गई थी| क्या पाकिस्तानियों के मुंह में बड़ी सी लकीर होती है जैसे नवाज शरीफ साहब के मुंह पर है या आम पाकिस्तानियों की शक्लें लंगूरों कि तरह होती हैं ये इन जनाब ने नहीं बताई
ये कहतें है कि हमले भारत सरकार ने मुम्बई में करवाए , करकरे का कत्ल भारतीय सेना व बी जे पी ने करवाए क्योंकि वह उसका पर्दाफाश करने ही वाले थे
कौन बताये कि यदि हमला करना ही होता तो तुम्हारे यहाँ जो फिदायीन हमले होते है उसके दस गुने हमले हो चुके होते
शिशुपाल कि कहानी पढो सबक मिल जाएगा कि भगवान् कृष्ण को भी उस आततायी का संहार करने के लिए उसकी सौ गालियाँ सहनी पड़ी थीं हम लोग श्रीकृष्ण कि तरह भगवान् तो नहीं है लेकिन पचास के आस पास आंकडो तक पहुंचाते ही तुम्हारा संहार हो जाएगा | मनमोहन कि गिनती और अंक गणित कमजोर है न अमर सिंह उसका हिसाब किताब देख रहे है जिस दिन सही गिनती हो जायेगी उस दिन पता चलेगा zaid hamid कि भारतीय फौज के हमले कैसे होतें है

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

नेता उवाच कमीनापंथी की भी हद है

दो दिन के बाद नेताओं ने क्या क्या कहा तो पता चलेगा की ये कितने नपुंसक है
१-" नेता मुर्दाबाद कहने वाले लोग अलगाववादियों की तरह है |ये लोक तंत्र में शामिल लोगों के प्रति अविश्वास पैदा कर रहे है " मुक्तार अब्बास नकवी
नकवी साहिब काश्मीर में जो नारे लगते हैं उसके बारे में आपने अपने मुंह में क्या लगा लिया है लोक तंत्र का ठेका आपने जनभावनाओं के प्रति बयां बाजी करने के लिए बचा रखी है ऐसा लगता है की आपका जन्म संविधान की किताब के किसी झिंगूर से हुआ है जो लोकतंत्र को चाट रहा है

"मंत्री का काम समुद्र के तटों की रखवाली करना नहीं न ही जगह जगह चौकीदारी करना वह केवल पॉलिसी बनाता है " शकील अहमद (गृह राज्य मंत्री )
आप तो जैसवाल जी के साथ खो खो खेलो तथा पॉलिसी के नाम पर जूते पालिश करो जीभ से आला कमान का


अगर शहीद मेजर का घर नहीं होता तो यहाँ कुत्ता भी झांकने नहीं आता " अच्युतानंद (केरला के मुख्य मंत्री )
आपका नाम अच्युतानंद के जगह पर च्युतानंद क्यों नहीं रख दिया जाए | आप समझते हैं शहीद को जिंदगी भर तो लोगों को लाल सलाम के नाम पर कटवाते रहे| यदि मुख्य मंत्री नहीं होते तो कोई कुत्ता तुम्हारे मुंह पर शू शू कर चुका होते सुरक्षा गर्द हटा कर देखो केरला से कश्मीर तक लाइन लग जायेगी कुत्तों की आपके मुंह पर शू शू करने की आपके मुंह का बवासीर ठीक हो जाता
महाराष्ट्र मनुख वाले कुवीर्यजनित किन्नरों का बयां नहीं छाप रहा हूँ क्यों की महाराष्ट्र के महापुरुषों ने हमें मना कर रखा है

रविवार, 30 नवंबर 2008

वेलकम चिदंबरम साहब ,टा टा पाटिल साहिब

टाटा के ताज पर हमला क्या हुआ हमारे आदरणीय गृह मंत्री जी को मंत्र्यालय को टा टा कहना पड़ गया | आंतक वादियों के गोली का एक और शिकार घायल गृह मंत्री के रूप में आया अब देखना ये है कि घायल पड़े हुए इस वी आई पी को सरकार क्या राहत देती है आगामी चुनाव में परिवार के एक सदस्य को टिकट या कुछ और ...
वैसे गृह मंत्री कि बात करें तो पाटिल साहिब भी उन्ही शेर दिल गृह मंत्री कि फेहरिस्त में हैं जो हाल के वर्षों में नेक नामियाँ कमा रखें हैं जैसे मुफ्ती मोहम्मद , बूटा सिंह ,जैल सिंह , नरसिम्हा राव , लौह पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी जी आदि आदि
जब आतंकवादियों का हमला चल रहा था तो किसी पाटिल साहब का ही बयां आया कि मेरे पहुँचने के पहले ही आंतक वादी भाग चुके थे नवभारत टाईम्स में ख़बर पढ़ते ही मुझे लगा कि चलो कोई आतंक वादी पाटिल से डरा तो ..पता नहीं वे आर आर पाटिल थे या एस आर पाटिल परन्तु ख़बर सही नहीं थी उस समय लडाई चल रही थी वैसे ये आर आर पाटिल उप गृह मंत्री महाराष्ट्र आंतक वादियों कि संख्या ही गिन गिन कर भूल जा रहे हैं
न हमें एस आर पाटिल कि जरूरत है न आर आर पाटिल कि हमें तो आर - पार पाटिल कि आवश्यकता है अब देखना है चिदंबरम साहिब क्या गुल खिलाते है कहीं आतंकवाद को समृद्ध देशों का प्रतीक न मान बैठें क्यों कि अब तक ये साहब भी भरमाते ही रहे है कि अब मुद्रा स्फीति घटा , अर्थव्यस्था मजबूत है ,शेअर मार्केट मजबूत है फंडामेंटल मजबूत हैं फ़िर कहतें है कि शेअर मार्केट अर्थव्यस्था का सूचक नहीं है
अब तुम्हारे हवाले है चिदंबरम ,चाहे ठंडा रखो या गरम
ये बयां मत देना की there is no adverse effect of terrorist killing on our growing economy .it is still growing at the rate of 7 t0 8 % मुरुगन तुम्हारी रक्षा करें

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

दो राज में फर्क क्यों

राहुल राज पर इल्जाम लगा कर मार दिया गया की वह राज ठाकरे को सबक सिखाने के लिए एक पिस्टल
ले कर जा रहा था बाम्बे पुलिस ने बड़ी ही बहादुरी से अंजाम घटने के पूर्व ही हमलावर को मुठभेड़ में मार गिराया |
लेकिन यही पुलिस जब राज ठाकरे को गिरफ्तार कर कोर्ट के सामने बहादुरी से पेश कराती है तो देश द्रोह जैसे अपराध को धारा १५१ आई पी सी में पेश कराती है ताकि नेता जी को आसानी से जमानत उसी दिन मिल जाए
जनता सब समझ रही है चाचा चोर के खिलाफ पाजी भतीजा को खड़ा करके चाचा को सबक सिखाने कि चालों को
चाचा को भी इन्ही नम्पुसकी हरकतों ने सिरफिरों का नेता बना डाला | भतीजों ने भी ऐसा कर दिखाया है राहुल राज को अनायास कत्ल कर राज को अनावश्यक महत्व दिलाया जा रहा है | इस कौम में इतना जल्दी उफान नहीं आता जैसा कि राहुल के मामले में बताया जा रहा है यदि न विश्वास हो तो याद करें जब बाबरी मस्जिद को बचानी के लिए गोलियां चली तो धार्मिक उन्माद के उन क्षणों में जब हिंदू खून को चाय के केतली में बार बार खौलाया जा रहा था तब एक पार्टी के नेता के बारें में अक्सर कहा जाता था कि सच्चा हिंदू इनको छोड़ेगा नहीं, हिन्दुओं के खून का बदला जरूर लेगा लेकिन कभी भी इन नेता जी पर किसी ने एक पत्थर भी नहीं फेंका , न कोई काला झंडा ही कहीं दिखाया गया होगा
हाँ नेता जी कि सियासत जरूर चमक गई एक दशक से वर्ग विशेष की हिमायत इन्हे हासिल है ऐसा माना जाता है कुछ इसी तरह कि सियासत खेली जा रही है महाराष्ट्र में इस राज नामक खाज के मामले में .............. खुदा बेडा गर्क करे इन नालायक सियासतदानों का

क्या धुम्रपान ऐसे रूकेगा ?


२ अक्टूबर से धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगा कर सरकार यह संदेश देना चाहती है की वह इसे सख्ती से लागू कर आम आदमी को स्वास्थ्य के प्रति सही मायनों में चिंतित है | लेकिन अम्बुमणि जी कोई भी सरकार समाजसुधारक नहीं हो सकती है समाज सुधार करना कभी भी सरकार का काम न पहले कभी था और न आगे कभी रहेगा चाहे वह सामाजिक बुराई हो या धार्मिक , नैतिक या आर्थिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कुरीतियाँ , भारतीय समाज रूढिवादी व परिवर्तन विरोधी रहा है पेप्सी व कोका कोला में कौन सा विटामिन परोसा जा रहा है कि उसके विज्ञापनों व इस्तेमाल के फायदों व नुकसानों के बारे में चिंतन नहीं हो रहा है बाबा रामदेव अवश्य इसके पीछे पड़े हैं लेकिन तम्बाकू व शराब के बारे में उनका विरोध कहीं दिखता नहीं जो शरीर को खोखला करतें है क्यों कि प्रचार के लिए ये सब बातें बहुत से महापुरुषों ने धर्म प्रवर्तकों ने ज्ञानियों ने धर्मग्रंथों में इसकी निंदा की है लेकिन इन नशा का कभी अंत नहीं हुआ लोग धर्म के विरोध में भी जा कर इन नशे की चीजों के गुलाम हो गए | तब ऐसी पुरानी चीजों के बहिष्कार का खतरा उठा कर इन बाबा जी लोगों को मीडिया क्या प्रचार करेगा शायद यही सोच कर ये बाबा लोग शांत रहतें है
तम्बाकू किसी रूप में भी नुक्सान दायक है जरूरत है प्रचार माध्यमों के द्वारा सतत विरोध के प्रचार कर मानसिकता में बदलाव लेन की जो एक जटिल प्रक्रिया है | इस देश में पता ही नहीं चलता है की किसी जन जागरण अभियान ( सरकारी ) का वास्तव में कितना प्रभाव या कुप्रभाव जनता पर पड़ता है चाहे सर्व सिक्षा अभियान हो या पोलियो उन्मूलन या एड्स विरोधी मुहीम सभी अभ्यनों से जाग्रति तो अवश्य आती है किंतु आदतों में दृढ़ता भी आ जाती है मिसाल के लिए एड्स विरोधी जागरूकता से ज्ञान तो बढ़ा किंतु एड्स के मरीज संख्या में वृद्धि होती जा रही है हालत उस नौसिखिये की है जो ट्राइल व एरर मेथोड़ से सबक सीखता है यहाँ हालत ठीक ऐसी ही है
सरकार को भूटान जसे देश से सीखना चाहिए जहाँ २००२ से ही तम्बाकू के किसी भी उत्पाद की बिक्री व प्रयोग पर पूरी तौर से रोक लगी हुई है यहाँ भी समग्र रूप से ऐसा ही प्रयास करना होगा |ऐसे नहीं कि चोर से कहें कि चोरी करो और शरीफ से कहें कि जागते रहों | २०० रूपयें कि फाइन से लोग २०० रूपयें दे कर आपके मुंह पर धुवां फूँक कर हँसेगें ऐसे लोगों कि कमी नहीं है इस देश में .... देख लीजियेगा सिगरेट बनने वाली कंपनियों के आगामी तिमाहीं परिणाम, उसमे पहले से वृद्धि ही नजर आने वाली है

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

चंद्रयान में एक चीज छूट गई

शीर्षक पढ़ कर चौंकिए नहीं , सही बात बता रहा हूँ हमारे देश में ऐसी गलतिया हो जाती हैं कि बाद में पछतावा होता है अभी अभी जब स्पेस अभियानों का इतिहास पढ़ रहा था तो पता चला कि रूस ने स्पेस कि शुरुवात की थी तो लाइका नामक कुतिया को भेजा था पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए
इतना बड़ा देश , इतना बड़ा अभियान , ४०० करोड़ का बजट , चाँद की यात्रा और एक कुत्ता भी नहीं मिला इन वैगयानिकों को यही तो फर्क हो जाता है देश व विदेश का , इतना सुनहरा मौका था एक कुत्ता जो बॉम्बे में अपने साथियों के साथ भौंक रहा है लोगो पर भूंक रहा है दौडा रहा है सरकार सोच रही है कि अपनी गली का आमची मुम्बई का कुत्ता है खुल्ला घुमण दो कार्तिक में तो कुत्ते ऐसे भी भूंकते और काट लेते हैं किंतु अब तो हद हो गयी कुत्ते ने चैलेन्ज कर दिया चेन में बाँधोगे तो चैन से रहने नहीं दूँगा

क्या इस चंद्र अभियान में मुंबई के इस कुत्ते को सरकार नहीं भेज सकती थी बाद में कहना मत कि याद नहीं दिलाया था इतिहास कभी इस ग़लती को माफ़ नहीं करेगा

कहाँ गए पुराने प्रधान मंत्री

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि देश कि राज नीति से तो हमारे गों कि राजनीति लाख गुने अच्छी है
कम से कम हर अच्छे बुरे काम कि प्रतिक्रिया पुराना प्रधान करता तो रहता है
पर बेडा गर्क हो देश कि राजनीति का यहाँ तो पुराना प्रधान मंत्री कुछ बोलता ही नहीं ,एक अरसा हो गया किसी पुराने प्रधान मंत्री का किसी भी विषय पर अपनी टिप्पणी दिए हुए वो तो भला हो यमराज का जो कुछ पुराने नेताओं का यमलोक का टिकेट कंफिर्म करतें रहतें है तो फार्मेलिटी के तौर पर कोई कोई भूतपूर्व प्रधानमंत्री दिख जाता है बोलते हुए सुन लिया जाता है कि अमुक जनसेवक नेता जी के चले जाने से राष्ट्र कि हानि हुई है इतना कहने के बाद वे पुराने लोगों के सामने ऐसे खरे रहतें है जैसे कह रहे हों "कभी तनहाइयों में भी हमारी याद आयेगी " कभी कभी किसी दिवंगत नेता की मूर्ती अनावरण या पुण्य तिथि को समाधिस्थल पर ये भूतपूर्व प्रधानमंत्री दिख जाते हैं तो ऐसा लगता है कि ये अपनी समाधी स्थल का ले आउट कल्पना में बना रहे हैं
ऐसा लोक तंत्र मुझे कहीं नहीं दिखता जहाँ भूतपूर्व प्रधान मंत्री जो अपने कार्य काल में इतनी बहुमुखी प्रतिभा को हो इतना सक्रिय हो कि १५-२० घंटे तक काम करता रहता हो फ़िर भी उसके गाल गुलाबी हों आँख शराबी हों ( अपवाद मनमोहन सिंह जी ही हैं जो प्रधान मंत्री बनने के बाद केवल मारीगोल्ड बिस्किट खा खा कर अपनी सेहत का और प्रोस्टेट ग्लैंड दोनों का सत्यानाश करा बैठे हैं पता नहीं भूतपूर्व हो जाने पर कसे दिखेगें और क्या बयां देंगे ,भविष्य ही जानता है )
अचानक भूतपूर्व होते ही राजनीति से थका हारा एक कोने पर पड़ा रहता है न तो कोई जिंदाबाद न कोई मुर्दाबाद ही सुने कैसे जिंदगी कटती है शोध का विषय है परमाणू डील के मुद्दे पर आदरणीय मनमोहन जी ने अटल जी को भीष्म पितामह कि संज्ञा देते हुए यह अपील कर डाली कि वही कुछ करें और पार्टी को समर्थन करें किंतु माननीय अटल जी ने भीष्म पितामह कि उपाधि पाते ही ऐसी चुप्पी साध ली है कि असली भीष्म भी शर्मा जाएँ जिन्होंने कौरवों का साथ दे कर शर सैया पर लेटना मुनासिब समझा ,यह भी नहीं कहा कि "मनमोहनजी ये अच्छी ... बात ... नहीं माना कि मैं कुंवारा हूँ लेकिन भीष्म कहना ये अच्छी ......बात नहीं
देवेगौडा , गुजराल अटलजी सभी मौन साधे बैठे विधवा ब्राह्मणी कि तरह चुप चाप बैठे हैं एक भूतपूर्व प्रधान मंत्री हैं जो बयान दे सकतें है लेकिन उनको कोई पूछता ही नही वो वी पी सिंह जी है जो अपना और अपने परिवार समेत किसी भी सरकार के समर्थन में रहतें है लेकिन उन्हें जीते जी लोगों ने जिन्दा फकीर ही बना डाला , राजा नहीं फ़कीर है , देश कि तकदीर है , इन मीडिया के लोगों ने उन्हें फ़कीर ही बना डाला तलाश है उन्हें अपने मकबरे की ....
चाहे चंद्रयान जाए या अश्वयान इन भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों का इस तरह से अचानक मौन हो जाना लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है इसके लिए जनादेश लाना ही होगा अटल जी ...कुल मिला कर आत्म निर्वासन का दंश भोग रहे इन बहादुर शाह जाफरों को चिरायु और जटायु होने की प्राथना इश्वर से करता हूँ की जैसे जटायु राज ने अपनी भूमिका निभाई इसी तरह से ये भी अपने पुराने मेधा का उपयोग राष्ट्र की आगामी पीढ़ी को मार्गदर्शन देनें में करें नहीं तो ये माना जाएगा की ये लोग केवल प्लेबैक सिंगर की तरह दूसरे के लिखे बयानों से ही अपने को सर्वज्ञानी के रूप में पेश करते रहे इसमे देवेगौडा जी अपवाद हैं .....

दोस्तों के नाम शायरी

मित्र या दोस्त जब तक आस्तीन के सौंप नहीं हो जाते तब तक बड़े ही प्यारे व हरदिल अजीज होते हैं कतिपय लाइनें जो मुझे गद्दार व बेवफा दोस्तों की याद दिला देती है उन लफ्जों का आनंद लें
मैंने पूछा सौंप से दोस्त बनोगे आप,
नहीं महाशय जहर में आप हमारे बाप|

हजारों मुश्किलें है दोस्तों से दूर रहने में ,
मगर एक फायदा है पीठ में खंजर नहीं लगता |
कहीं कच्चे फलों को संगबारी तोड़ लेतें है ,
कहीं फल सूख जातें है , कोई पत्थर नहीं लगता |

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

शाबास चिदंबरम जी

जब पुरा विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा है तथा शेयर बाजार की हालत पतली हो चली है | तभी हमारे आदरणीय वित्त मंत्री जी जो मुद्रास्फीति की बढ़ती रफ़्तार को वैश्विक बताते हैं किंतु वैश्विक मंदी से भारतीय बाजार को उतना खतरा नहीं मानते हैं |उनका कल एक बयां आया कि भारतीय अर्थव्यस्था बहुत मजबूत है तथा निवेशकों को घबराने कि जरूरत नहीं है इसका परिणाम यह निकला कि आज सेंसेक्स ८०० अंक लुढ़क कर १०८७५ पर पहुँच गया लगता है वित्त मंत्री जी को यह गुमान हो गया था कि उनके बयानों से मार्केट गिरता उठता है |
साधो शेयर कि गति न्यारी , यहाँ का हाल विचित्र है जब अमेरिका कि संसद ने बैंकों कि मदद करने वाला प्रस्ताव ठुकराया था और अनिश्चतता का वातावरण बना हुआ था तब हमारे यहाँ शेयर बढ़ रहे थे जब आर्थिक पैकेज कि घोषणा हुई तब मार्केट गिर गया | फ़िर फिटे मुंह ऐसे वैसे बयां क्यों देते हो , मुद्रा स्फीति को संभालो शेयर मार्केट के जुआरियों को झुलाने दो इनसे जनता का भला नहीं होने वाला , विश्वास न हो तो इंडिया शाइनिंग का हश्र याद कर लीजिये | अच्छा यही होगा कि महंगी हो रही कीमतों पर ध्यान देंवे वित्त मंत्री जी इस पर आपके बयानों का उल्टा असर होता रहा है तो शेयर पर कैसे सीधा हो जाएगा , फ़िर भी आप बहादुर हैं जो बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे हैं इतनी हिम्मत तो जार्ज बुश साहेब में भी नहीं है जो यह बयां देते हैं कि हाँ वितीय संकट है यदि आप होते तो कहते कि नहीं घबराने कि जरूरत नहीं है ये संकट चुटकियों में हल हो जायेगी क्यों कि सरकार इस पर नजर रखे हुए है , नजर न हो गई इश्क में डूबे हुए आशिक कि नीयत हो गई जिसे सब कुछ सुहाना लगता है अतः हे वित्त मंत्री जी बयां बंद कर कुछ काम करें यहाँ जो हो रहा है उस पर किसी का कोई वश नहीं है फ़िर आप कौन तुर्रम खान हो ....

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

अमेरिका के ऊपर भारत


अमेरिका ने कहा है कि परमाणु डील से भारत से सम्बन्ध और बेहतर हो गयें है क्यों न हो मनमोहन जी ने कह दिया है कि पूरा भारत आपसे प्यार करता है पता नहीं कौन करता है कौन नहीं वैसे भी और भी गम है ज़माने में मुहब्बत के सिवा
आप चढ़े रहो बुश पर आगे देखा जाएगा

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

संत बड़ा की आश्रम

आए दिन किसी न किसी संत महाराज की चर्चा अख़बारों के माध्यम से होती रहती है कुछ भव्य तो कुछ जघन्य ,हाल के दिनों में पंजाब यू । पी व गुजरात के संतों के आश्रमों की गतिविधियाँ सुर्खियों में हैं वस्तुतः ये आश्रम इन संतों के दौलतखाने हैं जिन्हें हम सब आश्रम व कुतिया समझाने की भूल कर बैठते हैं जिसका जितना बड़ा आश्रम जितने शहरों में आश्रम विदेशों में आश्रम वह उतने बड़े आशाराम यानि भक्तों की आश जगाने उन्हें लुभाने का कार्य आसानी से कर सकतें है | अब तो एक योगी जो आए दिन एक चीवर और एक लंगोटी तथा ५० रुपये की पादुका पहन कर लोगों को योगः चित वृति निरोधः का संदेश देते अनुलोम विलोम करते हैं मात्र १०० करोड़ की लागत से आश्रम तथा शोध संस्थान खोलने के लिए अलख जगाये हैं जिस दिन उनकी यह आशा पूरी हो जायेगी हनुमान जी को लड्डू चढाना पडेगा |ऐसे ऐसे वीतरागी संत जो पैसे को हाथ तक नहीं लगाते सिर्फ़ सोने व चांदी के सिंहासनों पर बैठ कर धवल धोती ओढ़ कर प्रवचन करतें है यदि उनके भव्य आश्रम न होते तो क्या उनकी कोई पहचान होती शायद नहीं , आज कल संत की पहचान उसके आश्रम व भंडारे तथा मालदार भक्तों के द्वारा ही होती है इसलिए आश्रम तो भव्य होना ही चाहिए ......
इसी बात पर मुझे एक कथा स्मरण आ रही है किसी राज्य में एक राजा ने सोचा की वह किसी संत से
दीक्षा ले फ़िर राजा के मन में ख्याल आया कि राजा को दीक्षा देने वाला संत का आश्रम भी भव्य होना चाहिए ताकि जनता को भी रश्क हो सके की राजा के गुरु काश्रम कितना भव्य है सो राजाने यह घोषणा कर दी की जो कोई संत आश्रम बनाना चाहे उसे राज्य की तरफ़ से सहायता दी जायेगी वह जितना जमीन चाहे उतना कब्जा कर ले व बता दे राज्य की तरफ़ से उसे आवश्यक मूलभूत सुबिधायें (infrastructure) प्रदान की जायेंगी फ़िर उसके बाद राजा उनमे से किसी भव्य आश्रम वाले संत से गुरुदीक्षा लेगें |जाहिर है माले मुफ्त दिले बेरहम की तर्ज पर तत्कालीन संतो के चेलों ने जमीं हथियाना शुरू कर दिया ऊँचे ऊँचे झंडे डंडे लगा कर राजा के लोग प्रगति की दैनिक समीक्षा उसी प्रकार कर रहे थे जैसे आज कल राज्य सरकार कानून व्यस्था की दैनिक समीक्षा करती हैं खैर ,राजा एक दिन बिना बताये गुप्त रूप से आश्रमों की भव्यता को ख़ुद जांचने जाता है तो पाता है कि एक पेड़ के नीचे एक संत ध्यान लगाये बैठा है राजा उनसे बोलता है कि हे महात्मन! आप ने आश्रम का निर्माण शुरू नहीं किया कहीं दिखाई नहीं दे रहा है ?
संत ने कहा मेरा आश्रम तो पहले से ही काफी भव्य बन कर तैयार है | राजा आश्चर्य में पड़ जाता है और कहता है कि जमीं तो आपने एलाट ही नहीं कराई फ़िर निर्माण कैसे हो गया नक्शा कहाँ पास हुआ !!!! इतने प्रश्नों को सुन कर संत बोले महाराज क्या जमीं एलाट करा कर दीवार खींचू, सारी दुनिया मेरा आश्रम है इसमे दीवार चला कर मैं इसे और छोटा कर दूँ इसमे कहाँ कि बुधिमानी है वैसे भी संत का काम बंधनों को काटना है न कि बंधनों में बंध जाना | शायद संत का इशारा वसुधैव कुटुम्बकं की और था |राजा को एहसास हो गया कि इस गुरु कि भव्यता तथा सोच कि विशालता अन्य गुरुओं से कहीं बहुत आगे है जो जमीन घेर कर बड़े आश्रमों को तैयार कराने में लगे है
क्या हमारी व आप कि सोच कभी इस तथ्य पर जायेगी कि इन बाबाओं महामंदालाधिशों के आश्रम अन्यायोपार्जित धन से बने हुएं है तथा इसमे अनाचार ही उपजेगा सदाचार कभी नहीं क्यों कि इन आश्रमों कि बुनियाद ही अन्यायोपार्जित धन व पूंजी से निर्मित है तथा इस में निवास कर रहे संत मंचों पर कुछ और हैं तथा असली में आश्रम के साम्राज्यवादी साशक मात्र हैं न कि साधक जो हम लोगों को तुच्छ साबित कर ग्लानि भर कर अपना उल्लू सीधा कर हमें मूंड रहे हैं
( सुधी पाठकों से क्षमा याचना सहित यदि संकेतों में उनके किसी गुरु का अपमान उन्हें प्रतीत हुआ हो लेख का आशय किसी व्यक्ति विशेष का अपमान करना कदापि नहीं है )

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

लोक तंत्र के इन गुनाहगारों को कौन सजा दी जाए

एक ख़बर के मुताबिक दिल्ली के चुनाव के लिए मतदाताओं की सूची और फोटो तैयार कराने में ९ लाख मतदाताओं केनाम या फोटो में गडबडी मिली है साल भर से काम कर रहे इन नाकारा कर्मचारियों के कारण हो सकता है ये गडबडी अंत तक ठीक न होपाये , और लोग मताधिकार से वंचित हो जायें
अधिकारियों ने बड़े ही मासूमियत से उत्तर दिया है कि प्रतिशत के हिसाब से ये गडबडियां बहुत कम हैं अधिकारियों को हर काम में प्रतिशत की दृष्टी की आदत पड़ी हुई है चूँकि कमीशन का प्रतिशत पहले से ही फिक्स होगा इन फोटो कंपनियों और डाटा एंट्री करने वाले लोगों से, इस लिए इन गड़बडियों की इतनी बड़ी संख्या ९ लाख इन्हे प्रतिशत में २ या ३ % दिखाई दे रहा है चुनाव आयोग जो समय समय पर तुगलकी नीतियाँ बना कर यह आभास करना चाहता है की जैसे लोकतंत्र का वही पहरेदार हो ( खैर इस पर अलग से किसी पोस्ट पर चर्चा करूंगा ) उसी के नाक के नीचे इतनी गलती हो रही है और वह खामोश है
ताज्जुब की बात ये है की जो काम कराने के लिए साल भर का समय था उसे प्रति कर्मचारी मात्र १५०० मतदाता के आंकडो को फोटो को दुरुस्त कराने का औसत कार्य्य सौंपा गया था पर क्या वर्क कल्चर है या कहें एग्रीकल्चर है कि इन नालायकों ने इतने लोगों को वोट जैसे अधिकार से वंचित करने का कार्य कर डाला
क्या सरकारी कर्मचारियों की एक लापरवाह और निष्ठाहीन फौज इन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को जटिल और दुर्लभ नहीं बना रही है?

इस देश में वोटर लिस्ट की गड़बड़ी या फोटो आईडी कार्ड की अनुपलब्धता की वजह से एक भी नागरिक को मतदान के अधिकार से क्यों वंचित होना चाहिए? वह अपने इस बुनियादी अधिकार का इस्तेमाल कर सके, इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस पर है? यदि कोई कर्मचारी, अधिकारी और विभाग इसके लिए नामजद है, तो ऐसी चूकों के लिए उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र को सिर्फ अशिक्षित नागरिकों, बूथ लूटने वालों और धनपतियों से ही खतरा नहीं है, इधर से भी है।

मोटी मलाई पतली कर दी सरकार ने


सरकार ने आज क्रीमी लेयर की वार्षिक आय -सीमा २.५० लाख रु से बढ़ा कर ४.५० लाख रु कर दिया ओ बी सी के एक बड़े प्रभावशाली वर्ग को खुश कर वोट बैंक बढ़ने की इस कवायद में असली गरीब शोषित पिछडे जातियों का कितना नुक्सान होगा इसकी गणना शायद ऊँची पहुँच वाले ओ बी सी ने नहीं की होगी और न ही इस पर कोई पार्टी बयान ही देने वाली क्यों कि सामाजिक न्याय की बात करने वाले धृतराष्ट्र अपने सगे सम्बन्धियों का हित पहले देखेंगे | तथा शकुनी ही सियासत कर रहे हैं
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा क्रीमी लेयर को आरक्षण की सुविधा न दिए जाने से वंचित लोगों को पीछे के रास्ते से आजीवन लाभ दिलाने के नापाक इरादों की
नाजायज औलाद है यह आय सीमा में वृद्धि ...
यह तर्क दिया जा सकता है की छठे वेतनमान के कारन हुई वृद्धि के फलस्वरूप इसमे वृद्धि होनी थी लेकिन सरकार को समझाना होगा की ४.५ लाख वार्षिक की सीमा में कितने वास्तविक जरूरतमंद (needy ) लोग हैं और कितने लालची (greedy ) ४.५ लाख वाली सीमा का व्यक्ति जो शायद अपनी जाति सूचक विशेषण या उपमान को भी अपने नाम के साथ प्रयुक्त न कर रहा हो लेकिन क्रीमी लेअर का लाभ उस गंगू तेली के लड़के से अवश्य छीनना चाहेगा क्योंकि वह क्रीमी लेअर का नहीं है कोई मुकाबला है गंगू तेली के लड़के तथा सरोज और भारद्वाज (राजभर जाति ) के उपमानों वाले इन तथाकथित ओ बी सी महाजनों से .....
एक कहावत है बिल्ली कभी गाय भैंस नहीं पालती लेकिन खाती मलाई ही है सरकार की इस घोषणा ने उसी तरह इन पिज्जा बर्गर परजीवी मलाईदार ओ बी सी ने मलाई की परत को ही पतला कर दिया है और शोषितों वंचितों के हिस्से का दूध डकारने का काम कर रहें है यह सामाजिक न्याय नहीं, मत्स्य न्याय है
आख़िर क्यों नहीं सरकार एग्जिट पालिसी बनाती है जिसके द्वारा तथाकथित पिछडों दलितों को आरक्षण की एक बार सुविधा ले लेने के बाद बाहर का रास्ता दिखाया जाय ताकि लाइन में लगा पप्पू और गंगू भी पास हो जायें और इन चेहरों पर भी मुस्कराहट आ सके